सोमवार, 25 मई 2020

मैं प्रिय पहचानी नहीं-महादेवी वर्मा

पथ देख बिता दी रैन
 मैं प्रिय पहचानी नहीं !

तम ने धोया नभ-पंथ
 सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप
 जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात: बुझा गया कौन
 अपरिचित, जानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

धर कनक-थाल में मेघ
 सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
 विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात:-
सुनायी कहानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

नव इन्द्रधनुष सा चीर
 महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
 -नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
 मैं बेसुध मानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

इन श्वासों का इतिहास
 आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक
 लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
 नयन से पानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

          महादेवी वर्मा 

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