शनिवार, 18 जुलाई 2026

कुछ यादें...

रोज की तरह आज फिर खोल बैठी हूँ...
वो अल्मारी ...
जिसमें रखे हैं मेरी बेटी के...
कुछ कपड़े ....
पुरानी किताबें  कापियां...
कुछ खास नहीं ...बस
कपड़े उलट पुलट किये ...
किताबों के पन्ने पलटे...
ऐसा नहीं उसमें कुछ नया था  
पर शायद ये मेरी दिनचर्या में शुमार सा हो गया था...
मेरा बेटा चुपचाप कनखियों से मुझे देखता ...
और नजरें गड़ा लेता किताबों में ...
पर एक दिन बोल ही पड़ा ...
माँ आप क्या देखती हो.....
मैं चुप...आँखें सजल
अन्तर्मन मेरा...जार जार रो रहा था...
असमंजस कि क्या कहूँ....
हौले से कहा....बस यूँ ही..
पर उसे कैसे बताती ....
उसका सामान देखने भर से...
मुझे उसके... 
घर में होने का एहसास हो जाता है...
माँ  जो हूँ ना.....

लाख बेटी सुखी हो पर " माँ " को कैसे  तसल्ली 
..

#  नीलम " नीरा "

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

चूड़ियाँ

चूड़ियां 

वाह वो भी क्या दिन थे...क्या आपने देखा है ये सब ..अपनी माँ  दादी ,नानी को ऐसे मनिहारिन से चूड़ी पहनते हुए...मैंने तो पहनी  ही हैं.... बचपन में..

इससे एक वाकया याद आया  नैनीताल से कुछ दूरी पर है एक जगह रामगढ़ ...हम लोग तल्ला रामगढ़ में रहते थे तब वो इतना विकसित नहीं था आज तो सारी सुविधाएं हैं वहाँ.... 
रामगढ़ के विषय में अगर वहाँ के फलों का जिक्र नहीं किया तो  ये नाइंसाफी होगी...फलों के मामले में रामगढ़ को हम कुमाऊँ का कश्मीर कह सकते हैं ...सेब तो इतने तरह का कि हम सोच नहीं सकते...सेव ,आड़ू ,खुबानी, पुलम (आलू बुखारा) नाशपाती, काफल ... और भी बहुत से फल कोई सोच भी नही सकता कि कितनी वैरायटी ...
 हाँ तो मैं चूड़ियों की बात कर रही थी  तो ज्यादा विकसित ना होने के कारण बस जरूरी रोजमर्रा के समान ही मिल पाता था...वहीं पर कभी 15 दिन में कभी 1 महीने में  रहमान चाचा आते थे  चूड़ियाँ पहनाने... और जब भी आते सारी महिलाएं उनसे चूड़ियाँ जरूर पहनती ...तब में 5 साल की रही होंगी ..बस मेरा काम था रहमान चाचा के बगल में बैठना  और उनसे बातें करना....और चाचा अपने काम के साथ साथ मेरी बातों का जबाब भी देते ... और जाते समय  चाचा मुझे बोलते मुन्नी ला चूड़ियाँ पहना दूँ... मैं मना भी करती तब  भिवो मुझे दोनों हाथों में हाथ भर चूड़ियाँ पहना जाते....मम्मी के लाख पैसे देने पर भी ...मेरी मुन्नी है कहकर इनकार कर देते...
फिर हम लोग नैनीताल शिफ्ट हो गए तो बहुत सालों बाद जब  मैं कॉलेज में आ गयी तब फिर रहमान चाचा मिले ...मुझे तो देखते ही पहचान गए  वोले मुन्नी इतनी बड़ी हो गयी ...ला हाथ कर चूड़ी पहना दूँ.... मैं झेंप कर बोली चाचा अब कॉलेज जाने लगी हूँ वहाँ चूड़ियाँ नही पहनते...फिर कुछ देर मुझे देखते रहे ...फिर जैसे कुछ समझ आया हो ..बोले चल आ ये कड़ा पहना दूँ... और मेरा हाथ खिंचकर कड़ा पहना ही दिया... 
पता नहीं क्या रिश्ता था मेरा उनसे....अब तो वो रहे ही नहीं होंगे....पर जब भी मैं कांच की चूड़ियाँ देखती हूँ... इतने सालों बाद भी चाचा का चेहरा याद आ जाता है... पतले दुबले छोटे से  एक गठरी लिए और एक बॉक्स लिए वो रहमान चाचा और मैं उनकी मुन्नी....
पर मैं आज भी उनको बहुत miss करती हूँ... तभी तो चूड़ियों की बात आई और में अपने को रोक ना पाई...
सच कुछ लोग जिन्दगी का इतना अहम हिस्सा बन जाते हैं कि जब भी याद करो  तब ही आँखों के कोर नम हो जाते हैं.... रहमान चाचा के साथ मेरी अमिट यादें💐

   सच कहूं तो चूड़ियों को खनक में अलग ही किस्म का संगीत है जो हमारे संस्कार  और हमारे सुहाग का प्रतीक है... और हमारे भारतीयता का गौरव भी.... पर आज की युवा पीढ़ी चकाचौंध की दुनिया में इस अलबेली खनक से दूर होती जा रही है....

डॉ नीलम गुप्ता  " नीरा"

सोमवार, 13 जुलाई 2026

मेरा सफरनामा 💕

ए सुनो...

चलो मिलवाती हूँ.. आज मैं अपनेआप से आपको..
(1986... से....2026 )
 वो भी क्या दिन थे अल्हड़ से गुस्ताखियां थीं... नादानियां थीं... वो बांकपन... उन्मुक्त... बेपरवाह सी..... मैं 
    सच कहूं बड़े ही मस्त अजब गजब दिन थे ... वो वेपाक बातें...बिल्कुल निश्चिंत...बचपन वाले दिन .... 
     कब और कहां फिसल गए ...कहां खो गए.... वो बचपन वाले हंसी पल....
     समय के साथ कुछ नए बंधन बंधे ... फिर हौले से  जिम्मेदारियों ने हाथ थामा... पता ही नहीं चला ....कब जिम्मेदारियां   बड़े हक से लिपट गई....   और वक्त धीरे धीरे फिसलता गया....
      समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए चलती गई ...बस चलती गई....आइने के सामने एक दिन निगाह पड़ी खुद पर.... जिम्मेदारियों के कुछ निशाँ चेहरे पर  दिखे .... आँखे मिचमिचाते हुए फिर से एक बार ठीक से देखा खुद को .... कहां से कहां तक का सफर तय हो गया ...पता ही नहीं चला....
      जब जिन्दगी के सफर में वो मुकाम आया जब अपने लिए कुछ वक्त मिला ... शायद वो भी इसलिए कि सभी  अपने अपने सफर में चल दिए .....अपनी मंजिल के लिए...
     तब याद आया कहां गए वो दिन....कहां खो गए या फिर मैं ही कही रखकर भूल गई....आज भी ढूँढ रही हूं ....वो बीते लम्हे...वो खिलखिलाती हंसी.... वो अल्हड़ बचपन....उम्र की उस दहलीज पर आकर  भी जीना चाहती हूं वो बीते पल... करना चाहती हूं वो गुस्ताखियां.... एकबार फिर से निश्चिंतता से दौड़ना चाहती हूं.... इसी उधेड़ बुन में आँखों का काजल हल्का सा फैल कर गालों तक आ गया ... एक रेखा सी खिच गई 
    अरे ये क्या.... तुरंत काजल ठीक किया ... और खुद की खुद ही नानी बन बोली.... पागल हूं क्या.... इतना लंबा सफर पार किया ...वो भी हंसी खुशी ...बहुत से रिश्ते बांधे और निभाए  बड़ी सहजता से.... सच कहूं तो जब सभी मेरे इर्द गिर्द घूमते थे अपनी जरूरतों के लिए तो मैं ही तो बड़े गर्व का अनुभव करती थी.... और खुद को किसी बेताज बादशाह से कम नहीं समझती थी.....सब कुछ तो अच्छा ही था उतार चढ़ाव का नाम ही जिन्दगी है.....
      फिर भी ....बचपन जीना चाहती हूं 
अब तो सोचती हूं....मेरे बाद मेरी आंखे भी शायद खुली रहें.... उन नादानियों भरे अल्हड़ दिनों के इन्तजार में...
  ये भी एक सफ़रनामा है... मेरा ही नहीं शायद सभी का.... वक्त के साथ समझौता करना ही जिंदगी है.....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा "

शनिवार, 11 जुलाई 2026

वक्त

सुनो....
एक लंबे अंतराल बाद 
घर का वो कोना देखा जिसमें दबी हुई थी बहुत सी यादों की कब्र... बहुत बार चाहा ... और सोचा भी ... पर कुछ जिम्मेदारी और कुछ बेफिक्री.... पर सच कहूं तो 
        ना तो चाहने से कुछ होता है और ना ही सोचने   से.... पर वक्त तो वक्त है ना...चलता ही चला जाता है अपनी रफ्तार से... हमें ही लगता है कि कभी वक्त बहुत तेजी से गुजरता है तो कभी धीमी रफ्तार से....
       पर एक बात तो है वक्त कैसे भी गुजरे पर बहुत कुछ सिखा जाता है कभी कभी तो हिम्मत और हौसले बुलंद कर जाता है.... बस वक्त के साथ चलते चलते कुछ पल जवान हुए तो कौतूहल वश  घर के कोने  में रखी गठरी खोल ही ली.... या यूं कहूं कि जब जिम्मेदारी का बोझ कम हुआ तो कुछ पल अपने लिए जीने का मन कर गया....इसी में 
   परत दर परत  यादें रंगीन होने लगी बचपन की अठखेलियाँ  लुका छिपी  युवा मन की तरंगे  मन में उठते अनेक सवाल जवाब .. अपनी नादानियां.. कुछ कोर नम हुए ...  वो तुम्हारा स्नेहपत्र  कांपते हाथों से जैसे ही उठाया ... एक पल लगा वक्त पीछे बहुत पीछे चला गया.... होठों पर एक स्निग्ध मुस्कान आई अपनी नादानियों पर और दो बूंद गालों पर बेफिक्र सी चल दीं .....इनको कहां जरूरत होती है किसी से इजाजत की
      आज मैं सोचती हूं हमने कितना अच्छा वक्त गुजारा... निश्लता का वो दौर था स्नेह पत्रों का जिसे हम कभी भी खोल कर पढ़ लेते हैं जी लेते हैं गुजरे वक्त को  और हँस लेते हैं अपनी ही नादानियों पर....
    पर आज कहां है वो यादों के जीवंत रंगीन पन्ने  ..  आज तो बस मोबाइल है जरा सा हैंग हुआ और अब डिलीट....एक दुनिया सिमट गई जरा सी मशीन में.....
    आज  पुरानी किताबों में रखे वो गुलाब जवाँ नहीं होते.....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"