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शनिवार, 1 अगस्त 2020

उपेक्षा -सुभद्रा कुमारी चौहान

इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥

 विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
 निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥

 मेरी साँसों की लू से,
कुछ आँच न उनमें आए।
 मेरे अंतर की ज्वाला,
उनको न कभी झुलसाए॥

 कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने,
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥

 इस भांति उपेक्षा मेरी,
करके मेरी अवहेला,
तुमने आशा की कलियाँ
 मसलीं खिलने की बेला॥

कलह-कारण -सुभद्रा कुमारी चौहान

कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
 पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥
 तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने।
 पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी॥

 उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया।
 मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं॥
 कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में सोच हो आया।
 वही कुछ बोल दें पहले, प्रतीक्षा में रुकी थी मैं॥

 अचानक ध्यान पूजा का हुआ, झट आँख जो खोली।
 नहीं देखा उन्हें, बस सामने सूनी कुटी दीखी॥
 हृदयधन चल दिए, मैं लाज से उनसे नहीं बोली।
 गया सर्वस्व, अपने आपको दूनी लुटी दीखी॥

इसका रोना -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।
 मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है॥
 सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे।
 बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे॥1॥

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो।
 यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो॥
 कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है।
 छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है॥2॥

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है।
 पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है॥
 जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है।
 छूटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है॥3॥

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है।
 जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है॥
 मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में।
 जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में॥4॥

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ।
 वह मेरी प्यारी बिटिया है, मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ॥
 तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान।
 जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान॥5॥

चलते समय -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा...’ कहते रुकती है जबान,
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!

सेवा करना था, जहाँ मुझे
 कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
 उन कृपा-कटाक्षों का बदला,
बलि होकर जहाँ चुकाना था॥

 मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
 वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना॥

चिंता -सुभद्रा कुमारी चौहान

लगे आने, हृदय धन से
 कहा मैंने कि मत आओ।
 कहीं हो प्रेम में पागल
 न पथ में ही मचल जाओ॥

 कठिन है मार्ग, मुझको
 मंजिलें वे पार करनीं हैं।
 उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें
 शायद फिसल जाओ॥

 तुम्हें कुछ चोट आ जाए
 कहीं लाचार लौटूँ मैं।
 हठीले प्यार से व्रत-भंग
 की घड़ियाँ निकट लाओ॥

जीवन-फूल-सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरे भोले मूर्ख हृदय ने
 कभी न इस पर किया विचार।
 विधि ने लिखी भाल पर मेरे
 सुख की घड़ियाँ दो ही चार॥

 छलती रही सदा ही
 मृगतृष्णा सी आशा मतवाली।
 सदा लुभाया जीवन साकी ने
 दिखला रीती प्याली॥

 मेरी कलित कामनाओं की
 ललित लालसाओं की धूल।
 आँखों के आगे उड़-उड़ करती है
 व्यथित हृदय में शूल॥

 उन चरणों की भक्ति-भावना
 मेरे लिए हुई अपराध।
 कभी न पूरी हुई अभागे
 जीवन की भोली सी साध॥

 मेरी एक-एक अभिलाषा
 का कैसा ह्रास हुआ।
 मेरे प्रखर पवित्र प्रेम का
 किस प्रकार उपहास हुआ॥

 मुझे न दुख है
 जो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।
 निठुर निराशा के झोंकों को
 मनमानी कर जाने दो॥

 हे विधि इतनी दया दिखाना
 मेरी इच्छा के अनुकूल।
 उनके ही चरणों पर
 बिखरा देना मेरा जीवन-फूल॥

खिलौनेवाला -सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
 खिलौनेवाला फिर से आया है।
 कई तरह के सुंदर-सुंदर
 नए खिलौने लाया है।

 हरा-हरा तोता पिंजड़े में,
गेंद एक पैसे वाली,
छोटी सी मोटर गाड़ी है,
सर-सर-सर चलने वाली।

 सीटी भी है कई तरह की,
कई तरह के सुंदर खेल,
चाभी भर देने से भक-भक,
करती चलने वाली रेल।

 गुड़िया भी है बहुत भली-सी,
पहने कानों में बाली,
छोटा-सा 'टी सेट' है,
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

 छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं,
हैं छोटी-छोटी तलवार,
नए खिलौने ले लो भैया,
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

 मुन्‍नू ने गुड़िया ले ली है,
मोहन ने मोटर गाड़ी
 मचल-मचल सरला करती है,
माँ ने लेने को साड़ी,

तुम -सुभद्रा कुमारी चौहान

जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो,
है जीवन में जीवन।
 कोई नहीं छीन सकता
 तुमको मुझसे मेरे धन॥

 आओ मेरे हृदय-कुंज में
 निर्भय करो विहार।
 सदा बंद रखूँगी
 मैं अपने अंतर का द्वार॥

 नहीं लांछना की लपटें
 प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं।
 पीड़ित करने तुम्हें
 वेदनाएं न वहाँ आएँगीं॥

 अपने उच्छ्वासों से मिश्रित
 कर आँसू की बूँद।
 शीतल कर दूँगी तुम प्रियतम
 सोना आँखें मूँद॥

 जगने पर पीना छक-छककर
 मेरी मदिरा की प्याली।
 एक बूँद भी शेष
 न रहने देना करना ख़ाली॥

 नशा उतर जाए फिर भी
 बाकी रह जाए खुमारी।
 रह जाए लाली आँखों में
 स्मृतियाँ प्यारी-प्यारी॥

अनोखा दान -सुभद्रा कुमारी चौहान

अपने बिखरे भावों का मैं,
गूँथ अटपटा सा यह हार।
 चली चढ़ाने उन चरणों पर,
अपने हिय का संचित प्यार॥

 डर था कहीं उपस्थिति मेरी,
उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य।
 नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा,
मेरे इन भावों का मूल्य?

संकोचों में डूबी मैं जब,
पहुँची उनके आँगन में।
 कहीं उपेक्षा करें न मेरी,
अकुलाई सी थी मन में।

 किंतु अरे यह क्या,
इतना आदर, इतनी करुणा, सम्मान?
प्रथम दृष्टि में ही दे डाला,
तुमने मुझे अहो मतिमान!

मैं अपने झीने आँचल में,
इस अपार करुणा का भार।
 कैसे भला सँभाल सकूँगी,
उनका वह स्नेह अपार।

 लख महानता उनकी पल-पल,
देख रही हूँ अपनी ओर।
 मेरे लिए बहुत थी केवल,
उनकी तो करुणा की को

झाँसी की रानी की समाधि पर-सुभद्रा कुमारी चौहान

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

ठुकरा दो या प्यार करो -सुभद्रा कुमारी चौहान

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
 सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

 धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
 मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

 मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
 फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

 धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं
 हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

 कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
 मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

 नहीं दान है, नहीं दक्षिणा ख़ाली हाथ चली आयी
 पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

 पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
 दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

 मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
 जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ

 चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
 यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

झिलमिल तारे -सुभद्रा कुमारी चौहान

कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
 झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम
 चमक रहे मन मारे।।

 अपलक आँखों से कह दो
 किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी
 मुक्तावलि वारा करते?

करते हो अमिट प्रतीक्षा,
तुम कभी न विचलित होते।
 नीरव रजनी अंचल में
 तुम कभी न छिप कर सोते।।

 जब निशा प्रिया से मिलने,
दिनकर निवेश में जाते।
 नभ के सूने आँगन में
 तुम धीरे-धीरे आते।।

 विधुरा से कह दो मन की,
लज्जा की जाली खोलो।
 क्या तुम भी विरह विकल हो,
हे तारे कुछ तो बोलो।

 मैं भी वियोगिनी मुझसे
 फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को
 हे झिलमिल-झिलमिल तारे!

परिचय -सुभद्रा कुमारी चौहान

क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं
 ललित-कलित कविताएं।
 चाहो तो चित्रित कर दूँ
 जीवन की करुण कथाएं॥

 सूना कवि-हृदय पड़ा है,
इसमें साहित्य नहीं है।
 इस लुटे हुए जीवन में,
अब तो लालित्य नहीं है॥

 मेरे प्राणों का सौदा,
करती अंतर की ज्वाला।
 बेसुध-सी करती जाती,
क्षण-क्षण वियोग की हाला॥

 नीरस-सा होता जाता,
जाने क्यों मेरा जीवन।
 भूली-भूली सी फिरती,
लेकर यह खोया-सा मन॥

 कैसे जीवन की प्याली टूटी,
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
 मेरा मतवाला साकी??

सुध में मेरे आते ही
 मेरा छिप गया सुनहला सपना।
 खो गया कहाँ पर जाने?
जीवन का वैभव अपना॥

 क्यों कहते हो लिखने को,
पढ़ लो आँखों में सहृदय।
 मेरी सब मौन व्यथाएं,
मेरी पीड़ा का परिचय॥

पानी और धूप-सुभद्रा कुमारी चौहान

अभी अभी थी धूप, बरसने
 लगा कहाँ से यह पानी
 किसने फोड़ घड़े बादल के
 की है इतनी शैतानी।

 सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया
 अपने घर का दरवाजा़
 उसकी माँ ने भी क्‍या उसको
 बुला लिया कहकर आजा।

 ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं
 बादल हैं किसके काका
 किसको डाँट रहे हैं, किसने
 कहना नहीं सुना माँ का।

 बिजली के आँगन में अम्‍माँ
 चलती है कितनी तलवार
 कैसी चमक रही है फिर भी
 क्‍यों ख़ाली जाते हैं वार।

 क्‍या अब तक तलवार चलाना
 माँ वे सीख नहीं पाए
 इसीलिए क्‍या आज सीखने
 आसमान पर हैं आए।

 एक बार भी माँ यदि मुझको
 बिजली के घर जाने दो
 उसके बच्‍चों को तलवार
 चलाना सिखला आने दो।

 खुश होकर तब बिजली देगी
 मुझे चमकती सी तलवार
 तब माँ कर न कोई सकेगा
 अपने ऊपर अत्‍याचार।

 पुलिसमैन अपने काका को
 फिर न पकड़ने आएँगे
 देखेंगे तलवार दूर से ही
 वे सब डर जाएँगे।

 अगर चाहती हो माँ काका
 जाएँ अब न जेलखाना
 तो फिर बिजली के घर मुझको
 तुम जल्‍दी से पहुँचाना।

 काका जेल न जाएँगे अब
 तूझे मँगा दूँगी तलवार
 पर बिजली के घर जाने का
 अब मत करना कभी विचार।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो-सुभद्रा कुमारी चौहान

विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
 अरे न पूछो, कह न सकूँगी,
तुमसे मैं अपनी बीती॥

 नहीं मानते हो तो जा
 उन मुकुलित कलियों से पूछो।
 अथवा विरह विकल घायल सी
 भ्रमरावलियों से पूछो॥

 जो माली के निठुर करों से
 असमय में दी गईं मरोड़।
 जिनका जर्जर हृदय विकल है,
प्रेमी मधुप-वृंद को छोड़॥

 सिंधु-प्रेयसी सरिता से तुम
 जाके पूछो मेरा हाल।
 जिसे मिलन-पथ पर रोका हो,
कहीं किसी ने बाधा डाल॥

नीम-सुभद्रा कुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
 तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥
 ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं।
 निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥
 हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
 उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥
 नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
 कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली॥
 तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
 तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी॥
 है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा।
 ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा॥
 तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा॥
 तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै।
 इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै॥
 प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो।
 जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो॥
 तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
 निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो॥

प्रथम दर्शन-सुभद्रा कुमारी चौहान

प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
 बिना परिचय के एकाएक
 हृदय में उलझन पड़ ही गई॥

 मूँदने पर भी दोनों नेत्र,
खड़े दिखते सम्मुख साकार।
 पुतलियों में उनकी छवि श्याम
 मोहिनी, जीवित जड़ ही गई॥

 भूल जाने को उनकी याद,
किए कितने ही तो उपचार।
 किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति
 छाप-सी दिल पर पड़ ही गई॥

प्रभु तुम मेरे मन की जानो -सुभद्रा कुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
 प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
 यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

 इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
 तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
 तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
 जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

 मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
 और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥
 मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
 मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

 तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
 बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

 कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
 दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥
 मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
 यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

 यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
 यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥
 ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

 मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
 जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥
 वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
 और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

 तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
 छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥

प्रतीक्षा-सुभद्रा कुमारी चौहान

बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
 नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
 उनमें जाने कितनी ही
 अभिलाषाओं के पल्लव पाल॥

 बिता दिए मैंने कितने ही
 व्याकुल दिन, अकुलाई रात।
 नीरस नैन हुए कब करके
 उमड़े आँसू की बरसात॥

 मैं सुदूर पथ के कलरव में,
सुन लेने को प्रिय की बात।
 फिरती विकल बावली-सी
 सहती अपवादों के आघात॥

 किंतु न देखा उन्हें अभी तक
 इन ललचाई आँखों ने।
 संकोचों में लुटा दिया
 सब कुछ, सकुचाई आँखों ने॥

 अब मोती के जाल बिछाकर,
गिनतीं हैं नभ के तारे।
 इनकी प्यास बुझाने को सखि!
आएंगे क्या फिर प्यारे?

प्रियतम से -सुभद्रा कुमारी चौहान

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
 अब रूखा व्यवहार न हो।
 अजी, बोल तो लिया करो तुम
 चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

 जरा जरा सी बातों पर
 मत रूठो मेरे अभिमानी।
 लो प्रसन्न हो जाओ
 ग़लती मैंने अपनी सब मानी॥

 मैं भूलों की भरी पिटारी
 और दया के तुम आगार।
 सदा दिखाई दो तुम हँसते
 चाहे मुझ से करो न प्यार॥