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गुरुवार, 2 मार्च 2023

सफर

सुना था ....
 "सफर"  हमेशा सुहाना होता है...
पर वो...

 कैसा "सफर" था  जो....
 मैं आज तक "सफर" कर रही हूँ
एक "सफर" से दूसरे "सफर" का  "सफर"  
ऐसा "सफर" होता है जो मैं ही नहीं 
वल्कि
स्वंय "सफर" को भी "सफर" तय करना पड़ता है....

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

मैं तन्हा हूं

( मेरे परम् मित्रों... ये केवल एक पोस्ट है...
मैं  शब्द का संबोधन किसी व्यक्ति विशेष या मेरे अपने लिए नहीं है..... धन्यवाद )

 मैं...टूट रही हूँ.. बिखर रही हूँ.. 
आहिस्ता आहिस्ता 
डूब रही हूँ.. और..धीरे धीरे 
खुद ही खुद में विलीन हो रही हूँ..
पर...कहाँ.. और ..क्यों...??
शायद  मुझको भी पता नहीं..
असमंजस में हूं.....
ये ऊँचे ऊँचे मकान..जहाँ चार दीवारी और छत तो है..
पर...घर नहीं
लोग की भीड़ तो बहुत है...
पर....इंसान नहीं
रिश्ते और उनके नाम बहुत हैं...
पर...अपना कोई नहीं
औरत भी है आदमी भी हैं..
पर...माँ-पिता  नहीं 
खाना पानी..सब कुछ तो है..
पर...भोजन का स्वाद नहीं
सब कुछ तो है... ऐसो आराम का सामान..
हर चीज मुहैया है..
पर..फिर भी 
मैं...टूट रही हूँ... बिखर रही हूँ..
समेट नहीं पा रही खुद को..
पर क्यों...
शायद कोई बजह ...
वजह कोई नहीं .....
पर कोई तो वजह होगी...
मुझे भी पता नहीं..

#  नीलम " नीरा "

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

एक पहेली

सूर्य की रक्तिम आभा..
अलसायी सी धूप..
चिड़ियों का मधुर कलरव..
भास करा रही थी एक..
नये उल्लास उमंग से भरे दिन का..
सब कुछ वही ..पर फिर भी नूतन सा...

मैं देखती हूँ एक दिवास्वप्न की तरह..
और रत हो जाती हूं नित्य कलाप में..
लगता है मेरी अंगुली थामें कोई ..
रोज मुझे ले जाता है मेरे गन्तव्य तक...

दिन चढ़ा...सूर्य तपा...
खो जाती हूं दिनभर कहीं ...
चक्रवत मैं ...
दिनभर अपने-आप को खोजती हूं इधर उधर...
और बनी रहती हूं अनबूझ पहेली सी मैं ....

फिर बुनकर ताना बाना सांझ को....
वापस लौट आती हूं मैं ...
सूर्य की लालिमा की तरह...
पक्षियों की तरह अपनी नीढ़  में ...
एक सुकून के साथ ...
चिर आनन्द के साथ ...
और करती हूं पुन: इन्तजार ...
सूर्य की उस रक्तिम आभा का...
जो फिर से एक नया सवेरा...
नया उल्लास लिए...
मेरी अंगुली थामने फिर आयेगा....

शनिवार, 28 जनवरी 2023

कुनकुनी धूप



वक्त कब और कैसे आगे खिसकता जाता है कुछ पता नहीं चलता ....आज से ठीक 20 साल पहले बिलकुल ऐसी ही सर्द सुबह ....हर तरफ चांदनी सी बिखरी जिधर तक निगाह जाती बर्फ ही बर्फ .... पहाड़ों में ऐसा ही होता है सर्दियों में दिनभर ठीक ठाक मौसम और सुबह उठो तो बर्फ की सफेद चादर.... हल्की ठिठुरन तो थी ही.....पर सूरज अपनी ड्यूटी पर मुस्कुराता हुआ आ गया...
   सूरज की वो गुलाबी  पीली सोने जैसी किरने  उस बर्फ पर पड़ अलग ही तरह से चमक रही थी.... उस सर्दी में भी सुकून दे रही थी...
     मैं अपनी बालकनी में बैठी उस  सर्दीली सुबह में कुनकुनी धूप का आनंद ले रही थी.... बहुत सुकून भरा था वो पल.... जैसे मेरे मन और मौसम का सही तालमेल था.... आंखें बन्द किए सोचने लगी...काश सब कुछ इतना ही सुनहरा होता ....ये तपता सूरज यूं ही माध्यम होता... ताप तो देता पर सुकून भरा... 
       सच कहूं ... पर ऐसा होता कहां है ... जो हम सोचते हैं.... पर यदि कुछ मन चाहा मिल भी जाए तो ... हमें सब्र कहां होता है...हम भूल जाते हैं उसकी कीमत....
        यही तो हुआ था पूर्वी के साथ ... पूर्वी मेरे घर के पास ही रहती थी हम उम्र थे ....एक साथ खेलते एक साथ बतियाते...
 बचपन के स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ साथ पढ़े ....मेरी अच्छी दोस्त थी ... हर बात मुझसे साझा करना उसकी आदत में शुमार था... कॉलेज क्या घर में भी कुछ बात हो वो तुरंत ही मुझसे साझा करती....
 घर पर पहले मां और बाबूजी की खुसुर फुसुर..... फिर खुले आम हमारी शादी की चर्चा होने लगी...
 पर वक्त के साथ तो चलना ही पड़ता है... फिर मां और बाबू जी को अपनी जिम्मेदारी पूरी भी करनी थी....हमारे दोनो के लिए उचित जीवन साथी की तलाश होने लगी...मेरी शादी जैसे ही तय हुई पूर्वी खुश तो बहुत थी पर उदास भी थी...हमारा साथ जो छूटने वाला था...  
लेकिन पूर्वी के लिए अभी जीवन साथी की तलाश जारी थी...एक दिन मुझे पता चला कि... पूर्वी ने 
 अपने ही सहकर्मी विपुल  का परिचय अपने घर पर करवाया... 
उसके घर वालों के लिए ये बात बहुत चौंकाने वाली थी...
 ये मेरे लिए कुछ नया तो नहीं था पर अजीब जरूर था ...क्योंकि पूर्वी ने एक बार जब मै मायके आई थी तो विपुल से मिलवाया तो था .....पर कभी ये जिक्र नहीं किया कि वो उसको अपना जीवन साथी बनाएगी... 
उसके घर में नाराजगी का माहौल था पर पूर्वी थी कि अपनी जिद्द पर अड़ी रही कि शादी करेगी तो विपुल से.... आखिरकार बच्चों की जिद्द के आगे माता पिता को हारना ही पड़ता है.... वही हुआ अंकल आंटी ने पूर्वी की शादी विपुल से कर दी...
       उस वक्त मुझे बुरा लगा कि उसने इतनी बड़ी बात मुझसे छिपाई ....खैर उसकी जिंदगी का अहम फैसला था ...उसको ही लेना था.... पर अपने मन की कहूं तो मुझे विपुल जरा भी अच्छा नहीं लगा.... देखने भालने में स्मार्ट रंग गेहुआ सधी हुई कद काठी... सब कुछ अच्छा था ... फिर पता नहीं क्यों...वो मुझे सही नहीं लगा.... पर मैं क्या ही बोलती एक लड़की तो आकर्षिक करने के लिए विपुल में सब कुछ था....
     खैर पूर्वी की शादी हुई... मैं उसकी शादी में आ ना सकी....
वक्त बीतता गया ...  मैं भी अपनी  गृहस्थी में व्यस्त हो गई... और पूर्वी भी... जब भी मैं मायके जाती उसके घर जरूर जाती ...उसके समाचार मिल जाते....अब धीरे धीरे समय बीतता गया.... जिम्मेदारियां बढ़ती गईं ... और मेरा मायके जाना कम हो गया....
        पर एक बात मुझे हमेशा कचोटती कि पूर्वी जब भी बात करती उधर की ही बात करती ... घर परिवार की बात होती तो टालमटोल कर बात का रुख बदल देती.... धीरे धीरे मेरी और पूर्वी की बातचीत का सिलसिला भी कम हो चला... जब भी कभी हम मिलते तो मायके में ही मिलते .... और घर गृहस्थी में रमते हुए समय के साथ मायके आना ही कम हो गया... मायके में रुकना तो अब हो ही नही पाता....कभी बच्चों के एग्जाम कभी टेस्ट... बस यूं कहूं कि जिन्दगी अपने ढर्रे पर चल रही थी... बचपन की बातें बचपन के सपने सब सपने हो गए थे....अपने लिए तो वक्त अब चुराना पड़ता है... तब भी बमुश्किल वक्त मिलता है....
        इस बार भतीजे की शादी  गई तब पता चला पूर्वी भी आई है.... मैं उससे मिलने गई...
    उसने मुझे देखा झट से गले लगा लिया... और बहुत देर तक  यूं ही मुझसे चिपकी रही... मैने ही कहा..... अरे पूर्वी अब छोड़ तो...तुझे देख तो लूं... हम दोनों की आंखों में आसूं थे... अपने को संयत कर मै बोली पूर्वी ये क्या हाल बना रखा है...हमेशा टिपटॉप रहने वाली और मुझे भी टोकने वाली ... और अक्सर मेरी ड्रेस को ये कहकर बदलवाने वाली की तुझे तो कपड़ों की मैचिंग की भी अकल नहीं है.... फिर तूने अपना क्या हाल बना रखा है.... ना ठीक से बिंदी , ना हाथ में चूड़ी बस एक कड़ा डाल रखा है...
     उससे मिलने के बाद  मैं   अपने घर आ गई बेमनी सी...
पर मैं रातभर सो नहीं पाई....
      एक बात तो थी इस बार जब पूर्वी मिली  कुछ उखड़ी उखड़ी थी ... मेरे बहुत पूछने पर भी बात टाल दी.... विपुल के बारे में पूछने पर...धीरे से बोली ...ठीक हैं.... मुझे  अपने अंदर कुछ खटका तो पर मैंने नजरंदाज कर दिया....
        एक बार जब मै फिर करीब दो साल पहले  मायके गई तब उड़ती हुई खबर सुनी कि पूर्वी अब अकेली ही रहती है.... एक धक्का सा लगा...  आंखें नम हुईं ... सोचा पूर्वी को कॉल करूं...  पर पूछूंगी क्या.... आख़िर उसकी जिंदगी है.... फिर मन में सवाल उठा मेरी सहेली है पूछ सकती हूं.... इसी तरह स्वयं से ही तर्क वितर्क करते हुए.... एक दिन मैने पूर्वी को कॉल कर ही दिया....
      पूर्वी अपने को संयत करती रही... और बोलती रही... फिर मैंने ही विपुल की बात छेड़ी तो.... पहले वो टालमटोल करती रही..... पर मैंने भी ठान लिया था कि.... सच तो मुझे जानना ही है ......जो कभी मुझसे अपने घर की एक एक बात बताती थी वो आज कैसे कोई बात छुपा सकती है....मेरे कुछ कुरेदने पर आखिर उसके सब्र का बांध टूट ही गया...
 वो अपने को रोक नहीं पाई और फूट फूट कर रोने लगी.... 
      कुछ पल मै शांत रही ... सोचा पता नहीं कितने दिन का गुब्बार मन में दबाए बैठी है निकल जाने दो.... फिर कुछ देर बाद वो खुद ही अपने को संयमित करने के बाद बोली.... पीहू तू सच कहती थी  कि.... विपुल से शादी करने में जल्दी मत कर..... पर उस वक्त मैं तो दीवानी थी....किसी की नहीं सुनी... विपुल मेरी जिद्द था..
  शादी हुई  शुरू के कुछ महीने हंसी खुशी बीते ....कुछ समय सब कुछ सही चला...... फिर विपुल अपने रंग में आने लगे...  उनके लिए लड़कियां ही  जरूरी थी... मै तो सिर्फ़ घर और बच्चों की देखभाल के लिए ही.... मैने देखा विपुल को समझाया और कई बार उसकी हरकतों को अनदेखा किया..... पर... हर बार यही कहते अब नहीं करूंगा... और मै बेबकुफ हर बार विश्वास कर उनको माफ करती ... शायद अब सुधर जाए..... पर यही मेरी गलतफहमी थी.....आख़िर कहती भी तो किससे ...वो मेरी पसंद थे और मेरी ही जिद्द....           वक्त गुजरता ही गया....बच्चे बड़े हो रहे थे....कुछ समाज और कुछ बच्चों की खातिर सब चुपचाप सहती रही.... अब मैंने भी मान लिया था कि विपुल से कुछ कहना मतलब दीवार से सिर मारना... सब कुछ यंत्र वत चल रहा था... एक दिन विपुल अपनी एक सहकर्मी को ले आए और बोले ये कुछ दिन हमारे साथ रहेगी.... मै चुप थी एक ही बात मुझे विपुल से जोड़े हुए थी कि वो बच्चों का ध्यान रखते लेकिन मुझसे मतलब नहीं रखते...
मेरे लिए इतना ही काफी था आख़िर मेरे बच्चों को पिता का प्यार तो मिल ही रहा है..... परन्तु एक दिन मैंने विपुल को रंगे हाथों पकड़ लिया.... और उसी दिन अपना सामान बांध कर घर से आ गई...
    मायके तो जा नहीं सकती थी क्योंकि मां बाबू जी तो अब रहे नहीं...कुछ दिन अपनी मौसी के घर रही ... फिर एक स्कूल में बार्डन की जॉब का विज्ञापन देखा ...बस फार्म भर दिया... रहने की सुविधा थी मैं वहीं बच्चों को लेकर रहने लगी....
       मेरी रुकी हुई जिंदगी जैसे वक्त के साथ कदम ताल मिलाने लगी...एक बेटी की शादी की कर दी यहीं स्कूल में एक मेम हैं उनका बेटा इंजीनियर है उससे...दूसरी की भी हो ही जाएगी....
     फिर मैंने बातों ही बातों में पूछ लिया विपुल शादी में आए थे बोली.... हां केवल कन्यादान की रस्म निभाने....
    सच कहूं पीहू...विपुल को मैंने इतनी शिद्दत से चाहा था ...तभी उनकी माफ करने वाली और ना माफ करने वाली सारी गलतियां माफ़ की... पर वो शायद मेरे नसीब में नहीं थे... पीहू जिन्दगी बहुत डगमगाई पर... मै संभल गई.... जिन्दगी ने मुझे कदम दर कदम कठिन से कठिन इम्तेहान लिए .... पर मैं गिरी नहीं वल्कि मजबूत से मजबूत होती गई...
 आज मैं बहुत खुश हूं...सच कहूं आज तुझे बात कर मन का सारा गुब्बार निकल गया.... बहुत हल्का सा लग रहा है....
    मुझे भी पता नहीं चला उससे बातें करते हुए कब मेरी आंखे उसके साथ सरीक हो गईं....
 फिर पूर्वी ही बोली ...अच्छा पीहू कुछ बच्चे आए हैं उनको पढ़ा लूं ...मेरा खाली वक्त भी कट जाता है... फिर कॉल करूंगी....मैने बस इतना ही कहा पूर्वी अपना ध्यान रखना...
        आज मुझे लगा सच में सूरज की वो गुलाबी पीली सी सोने जैसी किरने.... उस बर्फ पर पड़ कर बिलकुल पहले की तरह चमक रही है....
जैसे ही मैंने आंखे खोली...मुझे लगा ठिठुरती ठंड में वो कुनकुनी धूप  मुझे सहला कर अपनी गर्माहट का सुकून भरा अहसास करा रही है.... मैं मंद मुस्कान के साथ आंखे खोल कर उठ जाती हूं...अपनी दिनचर्या की शुरुआत करने.....

# नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

अनजाना सफर

अनजाना सफर

तुमसे होकर गुजरी है हर बात मेरी ...
फिर भी महफिल में कुछ यूं मुस्कुराते हो...
जैसे जानते नहीं ....
हर कमी को मेरी यूं छिपा जाते हो....
जैसे देखा ही नहीं .....
हर नाकामी पर मेरी यूं ढांढस बंधाते हो....
जैसे कुछ हुआ ही नहीं .....
आँख के मेरी आँसू यूं इस तरह पोछते हो.....
जैसे तिनका-तिनका गिरा हो.....
बात जब भी किसी की चुभी हो मुझे .....
कुछ इस तरह युं समझाते हो....
जैसे हम उम्र सखी हो मेरी.....
उलझ जाती हूं जब भी किसी उलझन में .....
पास बैठ कुछ यूं बहलाते हो ....
जैसे माँ हो मेरी ....
जब भी महसूस करती हूं उदासियों को अपने करीब.....
तुम दूर होकर भी पास आ जाते हो...
बन प्रियतम स्नेह जताते हो....
कहाँ कहाँ ...क्या क्या कहूं तेरे बारे में ...
जब भी पड़ती हूं अकेली मैं...
संग मेरे खड़े हो एक और एक ग्यारह बन जाते हो...
सच कहूं....
थकती नहीं कलम मेरी ....अल्फाजों की खलती है कमी  मुझको....
हर एक पन्ना कोरा है पर... उसमें लिखा भी तेरा नाम ही है 
तू धड़कन है मेरे दिल की...सांसों की गरमी है.....
बसती है मेरे रग -रग में ...
नाता नहीं तेरा मुझसे ज्यादा पुराना...
पर लगता है बांधा है तूने मुझे जन्म जन्मान्तर से....
मानती हूं कोई नाम नहीं इस रिश्ते का...
पर बेनाम रिश्ते में रंगने लगी हूं खुद को....

******************************
** कौन कहता है बरसों की पहचान बनाती है दोस्ती ....
दोस्ती तो जब दिल मिल जाएं तब हो जाती  है...**

#  नीलम " नीरा "

सोमवार, 23 जनवरी 2023

तुम्हारा मौन

तुम्हारा मौन

सच
तुम्हारा मौन....सर्द. व बर्फीली  हवाओं सा चीरता....
अंदर तक झकझोरता है...
पर ये मौन कोई साधारण सा मौन नहीं  .......
ये मौन उसका मौन था.....
शायद मैं समझ नहीं पायी  उसके मौन का मतलब.......
पर वो इस बात से नाबाफिक है....
कि उसका मौन आहत कर जाता है...मेरे अन्तर्मन को ...
. मैं स्वयं से ही प्रश्न उत्तर करती 
 और स्वयं ही अन्तर्द्वन्द्व को झेलती हूं....
पर शायद...
 तुम मौन को ढाल बना कर बचना चाहते  हो...
और मैं जानबूझ कर फिर फिर इन्तजार करती हूं....
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे प्रहार का.....
पता नहीं क्यों तुम अनजान बन
सब कुछ तिरोहित करते हो
खामोशी से....
मौन रहकर....
....................

शायद वक्त के साथ अब मैं समझने लगी हूं 
और 
अब स्वीकारती हूं तुम्हारा मौन....
सिर्फ इसलिए ...
कि ये मौन..तुम्हारा है...
तुम से होकर आया है.....
 तुम्हारी हर वो चीज मुझे पसन्द है....
जो तुम से होकर गुजरती है....
इसलिए मै तुम्हारे मौन को......
स्वीकारती हूं.....
समर्पित भाव से......
पूर्णसमर्पित...भाव....से....

#  नीलम गुप्ता. " नीरा "

पुरूष



अकसर सुना जाता है .....और ....जाता रहा है..... और.... शायद सुना जाता रहेगा... कि वो पुरूष है कठोर तो होगा ही... सब कुछ संभाल लेगा... हर बडी से बड़ी और छोटी से छोटी जिम्मेदारियों से लाद दिया जाता है उसका कंधा... और बना दिया है सुकुमार से कठोर....
       सच कहूं तो पुरूष कठोर नहीं होता बल्कि उसे बना दिया जाता है.... अमूमन देखा जाए तो बचपन से किशोर और किशोर से युवा और प्रोढ़ावस्था तक उसे सिर्फ और सिर्फ दायित्व ही मिलता है...प्रेम तो मिलता ही नहीं... यदि प्रेम मिलता भी है तो दायित्व की चाशनी में लिपटा हुआ....
         जबकि पुरूष के दिल में भी होते हैं सुकोमल भाव सुमधुर अहसास... धड़कता है उसका भी दिल... टूटता और बिखरता है वो भी.... चाहता है वो भी एक सुकोमल कंधा जहां खो सके वो स्वयं को... जुड़ जाए वो एक अहसास से .... वो भी संजोता है सपने ...देखता है ख्वाब....
   पर सारे भाव खो से जाते हैं कहीं... विलीन हो जाते हैं अंतर्मन के उदगार... कभी दायित्वों का वास्ता देकर तो कभी जिम्मेदारियों को गिना कर ....और बना देते हैं पुरुष को गंभीर पुरूष... अश्रु विहीन आंखों का मालिक 
         पर एक बात अक्षरत: ये भी सच है पुरुष को समर्पित भाव से  प्रेम करने वाली स्त्री जानती है....
पुरूष अथाह प्यार सरलता कोमलता का कोष होता है...बिलकुल निर्मल जल का अथाह सागर सा....
ऐसी स्त्री के आगोश मे वह पिघलता है रो तक लेता है...
खोल देता है अपनी जिन्दगी की किताब के हर पन्ने को... 
        सच पुरूष कठोर नहीं होता वो भी जीना चाहता है उन्मुक्त प्रेम में गोते लगाना चाहता है...प्रेम के अथाह समुद्र में  डूबकर जीना चाहता है...

# नीलम गुप्ता "नीरा"

रविवार, 20 नवंबर 2022

कर्म फल



 आज दिनभर के काम निबटा कर सोचा कुछ पल आराम करूं ... जैसे ही हल्की सी आंख लगी ही थी कि...बाहर से कुछ आवाजें आ रही थी जोर जोर से...पहले तो इग्नोर किया और करवट बदल कर फिर से सोने का प्रयास करने लगी परंतु  आवाजें और भी तेज होने लगी.... मैं बेमन से उठकर बाहर गई ...तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गईं...नींद तो जैसे  पता नहीं कहां चली गई....
        मेरे घर के सामने वाले घर से लगे हुए घर पर एक ट्रक खड़ा था .. उस पर पटक पटक कर समान रखा जा रहा था .... वहीं पर आंटी खड़ी अपने आंचल से मुंह ढके रो रही थी और अंकल जी भी चुपचाप नम आंखों से ये नजारा देख रहे थे....
       बात को समझते मुझे वक्त नहीं लगा....वही किस्से घर घर के...वही कहानी ....रोज पुरानी होती नई सी....
        पर मैं सोचने पर विवश हो गई कि ....आखिर दोष किसका है...माता पिता का या फिर बच्चों का... क्यों हम अपने बच्चों को जरूर से ज्यादा सुविधा देते हैं...हमारी परवरिश में पैसे की बू क्यों आती है...क्यों नहीं हम बच्चों को ये सिखाते कि... सीमित संसाधनों  में कैसे जीते हैं....शायद उस वक्त हमें अपने कमाए पैसे और अपने रुतबे का घमंड होता है... हम आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं...आगे कुछ भी नहीं सोचते कि...इसके परिणाम क्या होंगे...
     आज उन्हीं सब का नतीजा अंकल और आंटी जी भुगत रहे हैं....अंकल जी कस्टम विभाग में आफिसर की पोस्ट पर कार्यरत थे  घर और ऑफिस दोनों जगह रुतबा था कमाई भी अंधाधुंध थी...आंटी भी बड़ी अफसरी में रहती...दो बेटे थे... पूरी कालोनी में सबसे पहले उन बच्चों के पास ही कोई भी नई चीज आती...पहले खिलौने फिर साइकिल और फिर बाइक... 
मेरा तो आंटी जी से केवल नमस्ते तक ही सीमित था ... पर कालोनी में बातें तो आ ही जाती हैं घूम फिर कर...
      ऐसे ही एक दिन सुना अंकल जी के बेटे कॉलेज जाने वाले हैं तो अंकल जी ने उन्हें गाड़ी दिलवा दी...
       बस इसी तरह वक्त बीतता गया .... दोनों बेटों को जॉब लगी..... आलीशान शादियां हुई .. आधुनिक बहुएं आईं...अंकल जी ने एक मकान और बनाया पुणे में ... उस मकान में बड़े बहू और बेटे रहने लगे... फिर अंकल जी रिटायर हो गए और अपने छोटे बेटे के पास लखनऊ में ही रहने लगे....
       सब कुछ सामान्य सा चल रहा था...अंकल आंटी कभी कभार पुणे चले जाते ... पर धीरे धीरे उनका पुणे जाना भी कम और फिर बंद ही हो गया...
           अंकल आंटी अब दिनभर घर पर ही रहते.. आंटी तो घर के कामों में और बच्चों को संभालने में व्यस्त रहती और अंकल जी बाहर के कामों में और छोटी  बहू किट्टी पार्टी और पार्लर में.... 
  एक दो दिन  से अड़ोस पडौस से कुछ सुबुगाहट तो थी ... पर मैने ध्यान नहीं दिया और आज इतना सब कुछ देखकर...समझ ही नहीं आया ...
    मै छत पर खड़ी ये सब देख ही रही थी कि मेरी पढ़ौसन ने बताया ....अंकल आंटी अपने गांव वाले घर जा रहे हैं....छोटी बहू ने अभी 15 दिन पहले ही जबरदस्ती ये मकान अपने नाम करा लिया ...अब उसका कहना है कि मेरे घर से जाओ...उनका बेटा मूक दर्शक बना मौन सहमति दे रहा था अपनी पत्नी को....
        वैसे तो ये कोई नया किस्सा नहीं है ...घर घर की कहानी है कहीं कम तो कहीं ज्यादा.... पर मैं सोच रही थी कि हम एक उम्र में अंधाधुंध पैसा तो कमा लेते हैं आधुनिकता की दौड़ में आंख बन्द कर भागने के लिए.... तब हम ये नहीं सोचते कि जो पैसा हम गलत तरीके से अपने परिवार को सुख सुविधा देने के लिए कमा रहे हैं..... उसमें ना जाने कितनों की बददुआ और हाय लगी है.... हम ये भूल जाते हैं कि हमारे कर्मो को..... स्वयं हमें यहीं और इसी जन्म में भुगतना पड़ता है....सारा हिसाब यहीं चुकता करना पड़ता है.... और हम भूल जाते हैं कि इसके परिणाम क्या होंगे...
        पर अंकल आंटी की दशा देख  मेरी आंखें नम थीं.... मैं सोच रही थी हम क्यों करते हैं ये सब .... क्यों अनजान बने रहते हैं जन बूझ कर.... क्यों हम संतोष नहीं कर पाते...यही सोचते सोचते दो गर्म बूंद मेरे गालों पर से गुजर गई.....
और देखते ही देखते अंकल आंटी चल दिए अपने गांव एक बार फिर से अपना घरौंदा बनाने..अब शायद  उनके पास कोई तथकथित कोई अपना नहीं होगा....बस होंगे तो एक दूसरे की लाठी बने झुर्रियों भरे  दो जोड़ी मजबूत हाथ....

Dr Neelam Gupta "नीरा"

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

l LOVE U

पापा से हमेशा कम बोलने बाली ...उनकी हर बात को आदेश समझ कर मानने वाली ...कभी कदास ही पापा के पास बैठने वाली...पर आज जब पापा के पास बैठी तो मुझे फायदा हुआ.... बातों ही  बातों में उन्होने बताया ...प्यार कैसे जताया जाता है.... बोले मेरे प्यार जताने का तरीका जुदा  है तेरी मां से.... मै I Love You नही बोलता  तेरी मां से.... जब वो पूछती है सब्जी क्या बनाऊं...तो कहना आज तुम्हारी पसंद की....कोई डोरवेल बजाए तो... झट दरवाजे पर जाकर दरवाजा खोलना...कभी बाजार से आए तो एक गिलास पानी का देना....कभी कभी एक प्याली चाय अपने हाथो से बना कर पिला देना... जब वो गुमसुम सी हो उसको हंसा देना ... और हां कभी कभी चार बातें सुना उसको छेड़ना....सामने रखी चीज को अनदेखा कर उसको पुकारना....पापा बोले जा रहे थे हर एक बात और मै सुने जा रही थी....
         तब मैंने सोचा ... सच में प्यार ऐसा होता है...क्या हम भी ऐसा ही प्यार करते हैं  ...हम भी क्या इसी प्यार को जीते हैं ....अंदर से एक आवाज  आई.... नहीं 
  हम  तो  बस वेलेंटाइन डे को ही प्यार मानकर मना लेते है प्यार को केवल I Love U में ही जी लेते हैं.. ...अब सोच लिया मैने  जिस दिन मां पापा जितना प्यार करना सीख जाऊंगी..... अपने प्यार को परवाह से जता पाऊंगी ...उसी दिन से हर रोज असली वेलेंटाइन डे  मनाऊंगी.... 💕

शनिवार, 5 नवंबर 2022

कड़वा सच

जीवन की सच्चाई 

हम जिन्दगी भर स्वयं ही परेशान रहते हैं... सच में देखा जाए तो जिंदगी बहुत सीधी सरल और सहज हैं ...लेकिन हम बिना बात जिन्दगी को इतना जटिल और भयावह बना देते हैं कि वो हमें पहाड़ सी लगने लगती है.... 
मानती हूं कुछ सपने कुछ इच्छाएं कुछ लालसाएं होती हैं एक उम्र पर  और ये भी सच है कि एक उम्र के बाद सब खत्म भी हो जाती है...पर पता नही कब एक अलग  दुनिया बना लेते हैं  और सब कुछ जानकर अनजान बने रहते हैं....
हम जिन्दगी भर बड़ा छोटा अपना पराया में उलझे रहते हैं जबकि एक वक्त पर हम सभी एक से होते हैं....बस 
मत परेशान हो, क्योंकि आमतौर पर...

 1. चालीस साल की अवस्था में "उच्च शिक्षित" और "अल्प शिक्षित" एक जैसे ही होते हैं। (क्योंकि अब कहीं इंटरव्यू नहीं देना, डिग्री नहीं दिखानी).

2. पचास साल की अवस्था में "रूप" और "कुरूप" एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते).

3. साठ साल की अवस्था में "उच्च पद" और "निम्न पद" एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है).

4. सत्तर साल की अवस्था में "बड़ा घर" और "छोटा घर" एक जैसे ही होते हैं। (बीमारियाँ और खालीपन आपको एक जगह बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, और आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं).

5. अस्सी साल की अवस्था में आपके पास धन का "कम होना" या "ज्यादा होना" एक जैसे ही होते हैं। (अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है).

6. नब्बे साल की अवस्था में "सोना" और "जागना" एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है).

जीवन को सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें.

आगे चल कर एक दिन सब की यही स्थिति होनी है, यही जीवन की सच्चाई है...

चैन से जीने के लिए चार रोटी और दो कपड़े काफ़ी हैं... पर ,बेचैनी से जीने के लिए चार गाड़ी, दो बंगले और तीन प्लॉट भी कम हैं !!

ये जीवन की  कड़वी सच्चाई है जिसने भी इसको स्वीकार कर लिया उसे परमानंद ही प्राप्ति हो जायेगी  इसलिए  चैन से रहिए खुश और मस्त रहिए....
और हां बच्चों को वक्त और संस्कार दीजिए .... यही हम सभी की जमा पूंजी है 💕

(इस पोस्ट को मैं मिश्रित पोस्ट का नाम दूंगी क्योंकि इसमें कुछ मेरा और कुछ किसी और का लिखा है फर्क क्या पड़ता है जीवन की कड़वी सच्चाई  लिखी है जिसे हम स्वीकारते ही नहीं  अंत सब का एक ही है....कितने भी ऐशो आराम में जी लो पर शमशान में सबका बिस्तर एक सा ही है )

नफा नुकसान

नफा नुकसान

रविवार का दिन था.... ऑफिस की छुट्टी थी.... फिर नवंबर में हल्की सर्दी भी होने लगी थी... मैं आराम से बिस्तर पर बैठ कर फुर्सत में अखबार पढ़ रहा था... साथ में पत्नी चाय देकर गई थी वह मैं पी रहा था..... वैसे तो फुर्सत ही कहां मिलती है.... सुबह उठो तैयार होओ... बच्चों को स्कूल छोड़ो और ऑफिस जाओ...... बच्चों का स्कूल ऑफिस के रास्ते में ही पड़ता था...... इसलिए उनको छोड़ता हुआ ऑफिस निकल जाता हूं.... यही क्रम पूरे हफ्ते चलता है..... संडे के अतिरिक्त किसी भी दिन फुर्सत नहीं मिलती इसलिए सारे  काम संडे को ही फुर्सत में होते हैं...।
      अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि.....डोर बेल बजी मैं अलसाया सा नहीं उठा ....सोचा पत्नी ही दरवाजा खोल देगी.... शायद पत्नी किसी काम में व्यस्त थी ....या फिर उसने डोरबेल नहीं सुनी .....तभी दोबारा डोर बेल बजी तो मैं अपने आप से बोला...... कौन है भाई इतनी सुबह सुबह संडे के दिन तो फुर्सत से रहने दो....।
 मैंने  अनमने मन से उठकर..... जैसे ही दरवाजा खोला.....सामने  एक स्मार्ट सा युवक खड़ा था.... मैं अभी उसे ऊपर से नीचे तक निहार ही रहा था.... तभी उसने बड़ी शालीनता भरे अंदाज से कहा.... नमस्ते अंकल जी और मेरे पैर छुए......मैंने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते बेटा कहा .....पर मैं असमंजस में था और पहचानने की कोशिश कर रहा था...... कि इतना अदबदार शालीन युवक कौन है ......मेरे दिमाग की घड़ी वक्त से भी तेज चल रही थी उस वक्त.....मैं पहचानने की कोशिश कर ही रहा था पर असफल ही रहा....
          शायद वह मेरी मन: स्थिति समझ गया था .....बोला.... अंकल जी आपने शायद मुझे पहचाना नहीं ....... मैं कुछ झेंप सा गया ......जैसे कि मेरी चोरी पकड़ी गई हो.....मैंने जल्दी से कहा पहले अंदर आओ ....तब बात करते हैं..... वह बिना कुछ बोले मेरे पीछे पीछे ड्राइंग रूम में आ गया ......मैंने बैठने का इशारा किया तो ..... वो बैठ गया..... इतने में पत्नी भी अंदर से कौन है ....??   कहते हुए आ गई ......साथ ही पानी का गिलास  भी लाई...।
      वह युवक सोफे पर बैठ गया और ड्राइंग रूम का उड़ती नजर से मुआयना करने लगा और मैं उसका......वो शायद सोच रहा हो कहां से बात शुरू करे....     मैं कुछ कहता  इससे पहले ही वो बोल पड़ा .....लगता है अंकल जी  आपने मुझे पहचाना नहीं..... मैंने कुछ झेंपते हुए कहा..... शायद उम्र हो हो चली है मेरी .....इसलिए याददाश्त साथ नहीं दे रही..... युवक सधी हुई आवाज में बोला .....मैं वही हूं..... जो अपने पापा के साथ आया था..... 5 साल पहले आपका स्कूटर लेने के लिए आया था तब हमारे पास पैसे कम थे ...लेकिन आपने अपना स्कूटर हमारी मजबूरी समझते हुए हमें ....... नुकसान में बेच दिया ......और साथ ही मिठाई और पेट्रोल के  ₹500 भी दिए..... वह युवक धाराप्रवाह बोले जा रहा था .....उस दिन बहुत दिनों बाद हमने खरीद कर मिठाई खाई थी....... मैंने तभी सोच लिया था कि कुछ बन जाने पर आप जैसे देवता आदमी से मिलने जरूर आऊंगा .....
          आपके स्कूटर ने मेरी  क्या पूरे परिवार की स्थिति ही बदल डाली ......आपको पता है..... अंकल जी वह स्कूटर आज भी मेरे घर पर है .....आपसे स्कूटर लेकर मेरा आने जाने का समय बच जाता था..... तब मैंने ट्यूशन पढ़ाने शुरू कर दीए.....जिससे पापा को कुछ मदद मिल जाए..... फिर मैंने बीटेक ऑनर्स में पास किया...... 1 साल छोटी मोटी नौकरी की साथ ही ट्यूशन भी पढ़ाता रहा .....घर की स्थिति सुधरने लगी थी..... फिर पुणे की एक कंपनी में अच्छी जॉब मिल गई ......आज जैसे ही मैं घर आया ......तो आपसे मिलने चला आया ...।   आपको कुछ देने लायक तो नहीं हूं पर आपके एहसान का बदला कभी भी नहीं चुका सकता...... मैं दिल से आपका शुक्रिया करता हूं...... सच में आपके स्कूटर ने हमारी जिंदगी बदल दी .....वह लगातार एक सुर में बोलता ही जा रहा था .....और.... मैं ....कभी पत्नी को कभी उस युवक को देख रहा था...... मेरे पास कुछ शब्द भी नहीं ही नहीं थे...... मैं सिर्फ इतना ही बोल पाया ......बेटा नफा नुकसान तो चलता ही रहता है .....उस वक्त मुझे लगा तुमको स्कूटर की ज्यादा जरूरत है...... तभी मेरी पत्नी चाय ले आई बोली...... बेटा नाश्ता करोगे ......उसने केवल चाय पी और फिर से धन्यवाद कहते हुए  मेरे और पत्नी के पैर छू कर चला गया.....।
 मैं वहीं सोफे पर धंसा रहा .....मेरे सामने आज से 5 साल पहले का  पूरा घटनाक्रम घूम गया ..... स्कूटर पुराना हो गया था..... घर में बेकार पड़ा था सो  OLX  में   30,000  पर डाल दिया ......बहुत से कॉल आए 27000 , 25000 , 24000 , 28000 के .....बस एक कॉल आया 29000 का ..... मैंने मन बना लिया कि 29000 में बेच ही दूंगा.....।
     अगले दिन सुबह एक कॉल आई....साहब आपने OLX  पर स्कूटर के लिए डाला है..... मैंने संचित सा जवाब दिया .....हां
   उधर से एक दबी सी आवाज आई साहब मैं जोड़ तोड़ कर  ₹24000  ही कर पाऊंगा  ....जो कम पड़ेंगे तो मैं कहीं से इंतजाम कर लूंगा ......अगर संभव हो तो वह स्कूटर मुझे ही देना.....  मेरे बेटे को बहुत जरूरत है .....उसका समय बच जाएगा साहब..... वह पढ़ाई में बहुत अच्छा है....।
            मुझे  लगा जैसे सच में उसको जरूरत हो .....उसकी आवाज में कुछ ऐसी मजबूरी की कसक थी कि..... लगा जैसे सच में उसको जरूरत है ....मैंने कहा...... ठीक है तुम कल आ जाओ....।
      फिर शाम को दो तीन बार उसका फिर कॉल आया साहब.... कल जरूर आऊंगा.... पैसों का इंतजाम कल तक हो ही जाएगा..... कल दूसरा शनिवार था मेरी छुट्टी भी थी ...।
         वह शायद रात को सो भी नहीं पाया होगा..... सुबह 10:00 बजे ही आ गया .....अपने बेटे के साथ ....हाथ जोड़कर खड़ा था....उसने  कहा ....साहब बड़ी मुश्किल से इंतजाम हो पाया ... और नोट मेरे हाथ में थमा दिए
फिर मुझसे बोला .....साहब गिन लीजिए ...... उनमें मुड़े पुराने ...500 के , 100  और 50  के बहुत से नोट थे...... मैं समझ गया उसने कैसे इंतजाम किया होगा ....मैंने कहा.... तुमने गिन लिए तो पूरे ही होंगे.... उसका बेटा हाथ से स्कूटर साफ कर रहा था.... उसकी आंखों में चमक थी ..... उस वक्त मुझे लगा कुछ नुकसान तो हुआ पर किसी का भला हो गया...... वास्तव में ये जरूर मंद है .....हाथ जोड़कर बार-बार धन्यवाद देते हुए .....वह जैसे ही जाने के लिए मुड़ा..... मैंने उसको आवाज दी.... और ....पांच सौ का नोट देते  हुए मैं बोला...... घर जा रहे हो तो.... बच्चों के लिए मिठाई लेते जाना और हां जरूरत पड़े तो पेट्रोल भी डलवा लेना .....मिठाई और पेट्रोल दोनों इसमें आ जाएंगे....।
             उसके जाने के बाद मैंने सोचा..... मुझे नुकसान तो ज्यादा नहीं हुआ .....पर अगर किसी का भला हो जाए तो क्या बुराई है..... मेरा स्कूटर किसी के काम आए इससे ज्यादा और क्या चाहिए .....नफा नुकसान तो चलता ही रहता है....।
          मेरी तंद्रा तब टूटी जब..... पत्नी ने आकर कहा.... देखिए 12:00 बज रहे हैं फटाफट नहा कर आइए.... मैं नाश्ता लगाती हूं .....और मैं.... पत्नी के आदेशानुसार प्रसन्न मन से नहाने चला गया....।

 # Dr नीलम गुप्ता  "नीरा"

बुधवार, 2 नवंबर 2022

मेरे सखा

आज बरसों बाद भी
तुमको पढ़ रही हूं....
सोचती हूं कभी इस तरह मिले थे हम
 शायद हर रोज ही...
 जब भी मैने पुकारा तुम हमेशा 
मेरे साथ थे....
ना वादे ना कसमें ...
पर हर रोज मेरी शिकवे शिकायतें...
तुम सुनते फिर हौले से मुस्कुराते 
जैसे मेरी सारी उलझनों को सुलझाने का 
दारोमदार तुम पर हो...
और मैं बेफिक्र सी...
 कभी मां बन जाते तो कभी पिता 
तो कभी बड़ा या छोटा भाई
तो कभी सखा तो कभी सहेली...
 और .... मैं हर मसले का हल 
तुम मै ढूढती...जैसे तुम 
कोई अलाउद्दीन का चिराग हो...
सच कहूं तो ...
तुम मेरे लिए चिराग ही तो थे...
ना कोई इजहार था ना इकरार 
ना तुम्हारी कोई चाहत थी
ना मेरी...बस एक अलबेला रिश्ता 
पर कोई तो नेह डोर से बंधे थे हम...
 तभी तो तुम ....
आज भी मेरे उतने ही करीब हो
जितने तब....
मिलने ना मिलने का सवाल ही कहां था
तुम मुझे पढ़ते गए और मैं तुमको लिखती गई...
पर आज.... बरसों बाद
हर रोज पढ़ लेती हूं तुम्हें...
और बांच लेती हूं ख्यालों में...
  तुम आज भी मेरे अलाउद्दीन के चिराग हो 
 पता नहीं क्या रिश्ता है मेरा 
तुमसे.....
प्यार इश्क मोहब्ब्त चाहत का ...
अरे नहीं...
हमारा तो रूहानी रिश्ता है...
जिसका कोई नाम नहीं ...
बेनाम सा... सबसे कोसों दूर
मेरे सखा


 # नीलम "नीरा"

प्रेम

किसी ने कहा मुझसे.....
तुम बड़ा प्रेम लिखती हो...
:
:
मैं हौले से मुस्कुराई...
फिर आहिस्ता से बोली... 
चलो तुम्हारी बात मानती हूं....
:
;
आज से क्या...
 अभी से प्रेम लिखना छोड़ती हूं....
नफरत लिखना शुरू करती हूं...
:
 इसका शुभारंभ मै...
अभी से तुमसे करती हूं...
बोलो मंजूर है...
फिर दोनो खिलखिलाए....

# नीलम "नीरा"

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

कतार



आज मेरे रिटायरमेंट को पूरे 3 साल हो गए... पता ही नहीं  चला कि.... ये वक्त कब निकल गया  ... सच ही तो है... वक्त कब और कहां ठहरा है किसी के लिए....बस मुट्ठी में बंद रेत की तरह चुपचाप फिसल जाता है...पीछे मुड़कर देखो तो ....कुछ भी हासिल नहीं होता... हथेली पर कुछ रेत के कण चिपके रहते हैं....वो भी धीरे धीरे आखिरकार गिर ही जाते हैं.....
        बस इसी उधेड़ बुन में लगा मै... बचपन में पिताजी की  हिदायतों भरे ....
और ...फिर भी दोस्तों संग मस्ती भरे और शरारतों के गलियारे से निकल ..... किशोरावस्था की सीढ़ी चढ़ने लगा ...  पढ़ने में मध्यम था फिर भी सामाजिक होने के कारण..... शिक्षको का प्रिय था ... मेरा स्वभाव हमेशा से ही संकोची और शर्मिला रहा... 
              यूं ही समय बीतता गया वक्त के साथ कदम ताल मिलाते हुए....जवानी के पायदान पर कदम रखा कालेज गया ... वहीं मित्र मंडली में मेरी एक मित्र बनी....कसमें वादे सब कुछ तो किए ....एक मुस्कान चेहरे पर ठहर गई....
                पर सच कहूं तो वादे करना बहुत आसान है ....निभाना उतना ही कठिन ...कितना ही आत्मवल चाहिए ...जिसकी शायद मुझमें कमी थी....
     पिताजी का डर ,पढ़ाई के बाद नौकरी की जद्दोजहद, मनचाही नौकरी ना मिलने के कारण..... कुंठा और भी बहुत सी बातें... उस वक्त लगा एक युवक होना कितनी जिम्मेदारियों भरा होता है....
       वक्त का सफर बदस्तूर जारी था ...वक्त बीता लम्बे इंतजार के बाद मनचाही नौकरी भी लगी पर .......कुछ बातें कहां इंतजार की मोहताज होती है...
            फिर समझो तो परिवार की जिम्मेदारियां ही सर्वोपरी होती हैं... मां पिता की उम्मीद भरी निगाहें .....
      कहां मुंह मोड़ा जाता है इन सब से... नालायक बनने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए...
           इन सब के बीच मैने स्वयं ही सरेंडर  करके ....अपने मां पिताजी के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर सौंप दी...
      करीब एक साल बाद  मां की खुशी का ठिकाना नहीं था उनकी मन पसंद बहू जो आ रही थी...
         मां  खुश थी पिताजी खुश थे .....घर में चहल-पहल और  रौनक का वातावरण ....पर मैं ज्यों का त्यों दूर होते तमाशे को मूकदर्शक बना देखता .....आखिर वह घड़ी भी आ ही गई ....मेरे सर सेहरा बंधा और ले आया मै अपने साथ  घर को लक्ष्मी बनाने वाली गृह लक्ष्मी ...…
           ढोल ,मंगल - गीत , रीति रिवाज, रस्में ,हंसी - ठिठोली सब कुछ तो था..... पर मैं फिर भी अकेला का अकेला
        शाम ढली रात हुई रस्मों की रस्म निभाने या कहूं मां की पसंद का सामना करने जा पहुंचा कमरे में हल्की सी चूड़ी खनकी ,पायल की आवाज हुई लाल जोड़े में लिपटी वो मेरी आहट से और भी सिमट गई ..... घूंघट उठाया तो मां की पसंद मेरी पसंद से बिल्कुल अलग थी ..... 
        खैर जो होना था सो तो हो ही गया .....जब सौप दी अपने सपनो की बागडोर दूसरों के हाथ तो फिर नाराजगी या गुस्से का अधिकार कहां...फिर उसका भी दोष कहां....वो भी तो मेरे साथ ही बंधी है अग्नि के इर्द गिर्द सात फेरे लेकर....
         अब तो दूसरों की खुशी के लिए सब कुछ निभाना ही था....... मैं जिम्मेदारी निभाता रहा मूकदर्शक बन.... वह हुकुम की बादशाह  बनी घर संभालती रही.... और पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालती .... 
         जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में दो नन्ही फूल सी बेटियों की किलकारी से  मेरा घर आंगन चहकने लगा 
     अब वक्त के साथ लगभग मेरे सपनों में  धुंध सी जमने लगी थी कभी-कभी धुंध  हटती भी तो परिवार और समाज की जिम्मेदारियों की चादर सब ढाप देती ......सच कहूं तो फुर्सत ही कहां मिलती है ......पीछे मुड़कर देखने की..... बेटियां चंदा सी बढ़ने लगी .....उचित घर वर देखकर उनकी पसंद से उनको भरे मन से विदा किया ......
        कब मैं समय के पायदान पर चढ़ते चढ़ते जिम्मेदारियों की गठरी लादे इतना आगे बढ़ गया कि कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं .....
            आज इतने बरसों बाद .... मै  अनमना सा पीछे मुड़कर जो देखता हूं ....मेरे चेहरे पर अनगिनत रंग आते जाते रहे... 
     आज मै बालकनी में खड़े देखता हूं ....स्कूटर ,मोटरसाइकिल पर आते जाते हुए लोगों को .....तो सोचता हूं....इतनी भगदौड़ , इतनी आपाधापी....आखिर किसलिए....जब कभी मुड़कर पीछे देखना ही नहीं.... और मै ख्यालों में खोया  सबको खड़ा कर देता हूं .....एक समय के बाद एक कतार में..... जहां आज मै स्वयं खड़ा हूं....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

हार की जीत




 
       काली अंधेरी रात .....खुला आसमान और तारे टिमटिमा रहे हैं बेफिक्र से... हर तरफ सन्नाटा.... हो भी क्यों ना ........लोग दिन भर की थकान से थक कर सो जो गए ..... भला रात के 2:00 बजे वैसे भी कौन जागता है.....।
    पर मेरी नींद मुझ से कोसों दूर ......सच कहूं तो ......अब तो रात भर जागने की एक आदत सी हो गई थी...... एक नियम सा बन गया था ......पर आज कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही थी .......
इसी कारण मैं उठकर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई....... दूर तलक फैला सन्नाटा और अंधेरा .......और ......उस स्याह अंधेरे में कुछ खोजती सी.....मेरी आंखें 
        पहुंच गई आज से 20 वर्ष पहले जब ना अंधेरा था और ना ही सन्नाटा.... हर तरफ चहकता सा मधुर संगीत था....
          तब मैं 20 वर्ष की थी... जब लाल सुर्ख रंग का लहंगा पहने , भरे हाथ चूड़ियों के ....मांग में चटक सिंदूर लगाएं.... दुल्हन बन अपने बांके सजीले सपनों के राजकुमार के साथ इस घर में आई थी..... तब गूंज रहा था पूरा घर मेरी पायल की  झंकार से .....उस वक्त मुझे खुद से ही रश्क हो रहा था .....इतना स्मार्ट गोरा और सधी हुई कद - काठी का हमसफर पाकर ....।   तब मैं ही तो थी दुनिया की सबसे भाग्यशाली  युवती ......
      सभी कुछ सामान्य से बेहतर चल रहा था ....और चाहिए भी क्या एक युवती को प्यार करने वाला  .....उसकी हर ख्वाहिश को हाथों हाथ लेने वाला पति.... दिन तो मानो पंख लगा कर उड़ रहे थे ...
       पर हम तो इंसान हैं ना..... कब तक उड़ते पंख लगा कर.... यथार्थ को तो जीना ही पड़ता है... हर वक्त एक सा नहीं रहता....परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.... कभी तो नया भी पुराना होता है.... कलई तो उतरती ही है ना.....
          सच ही तो है वक्त कहां रुकता है .....और अच्छा वक्त तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है.... शादी को यही कोई सात - आठ  महीने ही बीते होंगे ......एक दिन घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे...…बातों ही बातों में उन्होंने मेरी सुघड़ता और सुंदरता के पुल बांधने शुरू कर कर दिए .....मेरे साथी के चेहरे पर अनेकों रंग आते जाते रहे..... बात आई गई हो गई उस वक्त तो.....
       पर रात को जैसे ही सारी कलई खुल गई...... लगा जैसे किसी परी के पंख काट कर उसे जमीन पर बेरहमी से पटक दिया हो .....तभी यथार्थ से सामना हुआ दरवाजा खोला तो देखा..... नशे में धुत मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा था वमुश्किल उसे अंदर कर दरवाजा बंद किया तो .....उन्होंने गाली और न जाने क्या-क्या बोलना शुरु कर दिया ......ये सब मेरे लिए इतना अप्रत्याशित था जैसे किसी ने मेरे कानों में तो जैसे गरम शीशा उड़ेल दिया हो..... कुछ भी समझ में नहीं आया..... मैने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी..... मैं कुछ समझ पाती या कुछ बोल पाती.... उससे पहले ही एक मजबूत हाथ मेरे गाल पर पड़ा.... मैंने अपने आप को गिरते गिरते बचाया.... मैं कुछ माजरा  समझ पाती उससे पहले ही वह बिस्तर पर गिर कर सो गए .....और मैं भी पता नहीं गीली आंखों से नींद में समा गई...।
     सुबह उठी तो सब कुछ सामान्य था अपने पास बुला कर बोले..... यार कल कुछ दोस्तों के साथ ज्यादा हो गई थी और पता नहीं तुम्हें क्या - क्या बोल दिया....सच में सॉरी यार सॉरी....
     आखिर मैं तो स्त्री ही हूं भूल गई रात की बात को .....कर लिया उनकी बात पर विश्वास ....।   पर यह क्या अब तो आए दिन यह क्रम सा बन गया .....रात को नशे में धुत और सुबह माफी का नाटक ....।             शादी को भी  साल भर से ज्यादा हो गया था..... कहो तो किससे कहूं ..... मायके में बुजुर्ग मां पिताजी और भाई की अपनी  गृहस्थी ... गरम खून 
मैं चुपचाप सब सहती रही .....पर समझ ही नहीं पाती कि .....जो आदमी दिन में इतना लाड़ प्यार जताता है ....रात में हैवानियत कहां से आती है....।
     बस  इसी चक्र के चलते मैं दो बेटों की मां बन गई .....शायद इसी उम्मीद से कि कभी तो यह सुधरेंगे ही..... हो सकता है बेटों का मुंह देख कर ही यह सुधर जाए.....पर हालात और भी बदतर होते गए..... मैं स्वयं से और यथार्थ से  लड़ती रही लगता था..... जितना उजला मेरा रंग था उतनी ही काली मेरी किस्मत....।
         धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं भी मशीन सी बन गई ...। एक लगाव था.... वह भी तार-तार हो गया .....मैंने अपना समय अपने बच्चों को देना शुरू कर दिया ....।
   पर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था.... एक दिन पता चला मेरे पति की दोनों किडनी की हालत नशे के कारण बहुत खराब है .....पर आखिर पत्नी ही हूं ना ....मन से ना सही बेमन से ही उनके जीवन की दुआ मांगने लगी और उनकी जी जान से सेवा करती ......बदले में दुत्कार और गालियों के सिवा कभी कुछ नहीं मिला ....।
          पर कुदरत का लिखा कौन टाल सकता है...। एक दिन वह दोनों बच्चों को और मुझे छोड़कर चले गए....!
      मैं टूट कर पहले ही बिखर गई थी...... पर जो भी थोड़ा बहुत मेरे अंदर था..... वह भी तार-तार हो गया...... पर ऐसे कब तक चलता मुझे बच्चों के मासूम चेहरे देखकर संभलना ही था..... कब तक यूं मातम बनाए  रखती....।
      मुझे वक्त लगा कुछ महीनों का .......संभालने में खुद को..... मजबूत किया खुद को......दिन भर स्वयं को कोसते हुए मरने की बातें सोचने वाली .....मैं .......फिर से नए आत्मवल से खड़ी होने के लिए स्वयं को संभालती रही .......आखिर जीत मेरी हुई....।    
           मैंने धीरे धीरे कारोबार संभाला और बच्चों को मां पिता दोनों की तरह परवरिश की....।            आज उसी का नतीजा है कि मेरे दोनों बेटे मुकाम हासिल कर करके अपने पैरों पर खड़े हैं....।
          दुनिया , समाज और स्वयं से लड़ते हुए आखिरकार ....मैं... हार कर भी जीत गई ......इस स्याह रात में जब सारी दुनिया सो रही है..... मुझसे नींद कोसों दूर है .....मैं बालकनी में खड़ी .....आसमान में बेफिक्र से तारे को  टिमटिमाते हुए  देखकर सोचती हूं ......जहां  जंग में खुद से हार कर....!!

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

राही

राही 

राही 
राह पर चलते एक राही से पूछा मैने..
क्यों चलते हो इस कंकरीले रास्ते पर
निरे कांटों से अटा पड़ा है ये रास्ता
हर तरफ़ विरानगी छाई हुई है...
दूर तलक कोई मंजिल भी दिखाई देती नहीं...
वो मुसाफिर कुछ ठिठका...मुस्कुराया 
एक उड़ती सी नजर मुझ पर डाली
और सहज हो बोला...
माना कि ...तुम सही हो
पर ये तो बतलाओ...जरा सी ठोकर से
मंजिल की इन बाधाओं से...
 घबराकर
क्यों बदलूं पथ अपना...
मै ना चलूंगा तो कोई तो चलेगा
कोई तो करेगा ...एक नई पहल 
जो मिटा कर राह की वधाओ को
करेगा पथ प्रस्स्त ..
फिर मै क्यों  नहीं....??
चुभेंगे नहीं कंकर पत्थर तो ..
आगे बड़ने  की   ललक कैसे जागे..
मिल गई जो मंजिल सहज 
फिर वो मंजिल क्या....?
वो राह ही क्या ...जो नीरस हो
कुछ कह पाती मै....
उससे पहले वो ... राही 
 यूं बोल  फिर चल दिया ...
अपनी मंजिल की ओर....
और.... मै
देखती रही ...उसे अपनी घुन में जाते हुए
एकटक.....

# Dr Neelam Gupta "नीरा"


मंगलवार, 20 सितंबर 2022

एक कप चाय

आज सुबह सुबह 
चाय का प्याला लेकर बालकनी में आई
 भोर वेला ....... सुहाना मौसम ...
एक आध पंछी चहक रहे थे ...
अब बची ही कहां है जगह उनके 
 नीड़ बनाने के लिए .... 
पेड़ तो बस नाम के ही रह गए हैं....
हर तरफ तो बहुमंजिल इमारतें....
आज गर्मी से कुछ राहत थी ....
कुछ कल  की बारिश की हल्की फुहार का असर था ....
और कुछ आज भी घटा सी थी...
कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था....
 और मै....मौसम का आनंद लेते हुए...
बालकनी में खड़ी देख रही थी ....आने जाने वालों को...
 वो शायद वक्त को मात देकर आगे जाना चाहते थे....
    पर मै... 
  हाथ में चाय का प्याला थामे वहीं की वहीं...
 मेरा मन  ऐसे में कहां रुकता...
उसे तो बस  हल्की सी आहट चाहिए....
  और ...
आंखें चुप चाप वहीं से लम्बा सफर तय कर लेती हैं....
             ....................

     चारों तरफ  हरी घास कुछ बड़े पेड़... रंगीन फूल
लगता था सबके जीवन में रंग भर देंगे....
     वहीं पर  तुम संग जीए वो पल
 बेतुकी सी बातें ... बिना बात हंसना... दीन दुनिया से बेखबर

सारी रस्मों तो ताक पर रख...अपनी एक अलग दुनिया....
      कभी नोक - झोंक तो कभी मान मनुहार...तेरा मेरा नहीं बस हमारा संसार....
       सब कुछ पॉपकॉर्न और सौंधी आंच पर भुने भुट्टे में ही पूरा हो जाता था....
  बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी अपनी...
जहां भविष्य  से कोई वास्ता नहीं...बस जो है वो आज ही है....
       पर वक्त के पंख होते हैं तब सुना था.... फिर देखा भी...
      सपनों की दीवार शायद वक्त से कुछ कच्ची थी...
 हल्की सी ठसक लगी और ढह गई... 
 फैली हुई बाहों को यूं इंतजार का ढाढस दे चले गए... 
    आंखों के सपने नमी में धुंधले हो गए....
  तब जाना कसमें वादे तो बने ही होते हैं ...टूटने के लिए
 आंखों का सारा काजल बह गया...
तब तो अपने ही हाथ पराए से हो गए....काजल की रेखा को साफ करने की हिम्मत ना जुटा पाए....
   पर वक्त कब किसका हुआ है....
सच वक्त के पंख होते हैं....

     ........................
 
       तभी अंदर से आवाज आई...
अरे भई आज कहां हो.....
  मै बालकनी में खड़े खड़े ही लौट आई... गालों पर लुढ़क आई बूंदों को फटाफट साफ किया 
कहीं इतने बरसों बाद चोरी ना पकड़ी जाए...
  सच यादें तो राख में दबी चिंगारी सी होती हैं...
जो कभी बुझती नहीं ...सुलगती रहती है धीरे धीरे...
  अच्छा अब ठंडी हुई चाय का प्याला मेज पर रख....
लगती हूं सुबह के कामों में....
मिलती हूं फिर....एक प्याला गरम चाय के साथ...

#  नीलम गुप्ता  "नीरा"

इक पाती तेरे नाम

आज वर्षों बाद ...
मै फिर से लिखने बैठी "इक पाती तेरे नाम"
 वो तेरी यादें...
 वो तेरी बातें 
 वो सुनहरी धूप 
 वो शीतल छांव 
 वो मंद बयार 
वो उन्मुक्त हंसी
वो  नीला आसमान
कुछ भी तो नहीं बदला....
..............

सब कुछ आज फिर से  जीवंत सा हो उठा....
एक अंतराल बाद जब तुम मिले 
तब समझ आया कि ...
वो ख्वाब जो बचपन में सखी सहेलियों संग साझा किए थे....
कि....
 आएगा सफेद घोड़े में एक राजकुमार
 मेरे सपनों को जो देगा नई उड़ान 
 कराएगा मुझे वो सैर परियों के देश की
वो तुम हो...
...............

सच में.... 
 वो राजकुमार तो किस्से कहानियों का था...
पर हकीकत में ....
स्नेह, सम्मान ,परवाह और  अनकहे मनोभावों को जो पढ़े
 वही तो राजकुमार है....सफेद घोड़े वाला 
.............

सुनो ...
मन करता है अब ....
फिर से लौट जाऊं ... उन हंसी पलों में....
फिर से अठखेलियां करूं....
 झूमूं खुले आसमान तले....

.............

तुम संग फिर से....
ख्याबों में फिर से रंग भरने लगी मैं....
जीने लगी उन लम्हों को  एक बार फिर से....
बस....
लापरवाह सी मैं....
सपनों के पन्नों में ख्यावों की स्याही से ....
लिखने बैठी ....आज फिर से..
"इक पाती तेरे नाम "

Dr नीलम गुप्ता। " नीरा "


चाय

उम्र के हर मोड़ पर एक चाय ही तो है
जो रंग भर देती है जिन्दगी में....
चाय फीकी हो या मीठी क्या फर्क पड़ता है
पर इसकी हर एक चुस्की जिन्दगी में मिठास भर देती है...
ये वो सांवली सलोनी चाय ही तो है..
जो यादों से चेहरे गुलाबी कर देती है...
सुबह की हो या शाम की चाय....
दोस्ती का हर जज्बा हर वक्त सलामत जो रखती है
वो चाय ही तो है....


ललना

एक नारी, स्त्री, ललना.... ना जाने कितने ही नामों से जाने जानी वाली एक औरत का जब नाम आता है ...... तब एक खाका उभर कर सामने आता है.... दुबली पतली मांग को चटख सिन्दूर से सजाए , माथे पर लाल बिंदी लगाए , होठों पर मधुर मुस्कान लिए , कजरारी आंखों वाली  , कानों को बालियों से सजाए ,  बालों को करीने से बांधे  और एक लापरवाह सी लट गालों को चूमती , गले में  मंगल सूत्र डाल कर इतराती .... ... ओर.....पैरो पर पायल - बिछुए  और महावर से स्वयं को  संवारती ...  करीने से बंधी साड़ी में खुद को समेटे हुए.... यही तो है वो   
 स्त्री.... 
               यही स्त्री जो सबकी आकर्षण का केंद्र है.... रूक जाती हैं  चलते चलते निगाहें उसके  उभारों पर... यही नहीं निगाह रखी जाती है उसके एक एक पल पर.... उसका उठना बैठना सभी तो दायरे तय कर दिए जाते हैं....जैसे कोई ठेकेदार हो उसका...
      पर क्या सोचा है कभी... उसमें भी जान है एक दिल है जो धड़कता है...कुछ भावनाएं हैं, अहसास है ,उसका भी वजूद है....  शायद नहीं ना...अगर सोचा होता तो वो यूं मजबूर ना होती निगाहें झुका कर चलने को....
      सच तो ये है ...कोई ये भी नहीं सोचता कि ये वही नारी है..... जो ना जाने अपने अंदर कितनी वेदना , दर्द और मान - अपमान , तिरस्कार का अथाह समुंदर समेटे हुए है अपने अंदर.... कितनी की अपनी इच्छाओं का गला घोटाती है ....परिवार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए.... हर रोज सौ दफा मरती है...एक परिवार को बचाने के लिए... हजार बार वो चुप होती है दूसरों को बोलने का मौका देने के लिए ... कभी स्वयं चुप होती है तो ....कभी जबरन चुप कराई जाती है...वो चीत्कार नहीं करती बस पी लेती है विष का घूंट मीरा की तरह.... वो  सींचती है रिश्तों को अपने आंख के पानी से... तभी तो वो बनती है त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति....
            ये स्त्री ही है..... जहां जाती है वहां महका देती है घर आंगन .... ईट मिट्टी गारे जैसी  बेजान चीजों में जान डाल देती है..... ईट मिट्टी गारे से बने मकान को अपने शुभ कदम रखते ही घर और अपनी तपस्या से घर को मन्दिर बना देती है .... जिसके चहकने से  किलकारी गूंजती हैं घर में....
      सच में स्त्री तुम इस धरा का मान हो 💕

# नीलम "नीरा"