मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

मेरा बचपन

कोई लौटा दे मेरा बचपन 
जब मैं छोटा था बुनता था ख्याब बड़े 
उन ख्वाबों के ताने बाने में बना लेता था एक रंगीन दुनिया
जहां सिर्फ और सिर्फ खुशियां ही होंगी 
सोचा करता था मां की गोद से निकल
उड़ूंगा तोड़ लाऊंगा हसीं सितारे ... बस बड़ा हो जाऊं...
दिन भर ढेरों सपने बुनता ....

समय बीता वक्त बीता..साल महीने दिन रात और ऋतुएं बीती...
और हुआ मेरा भी मन चाहा...
 एक दिन भगवान के द्वार पर  हुई मेरी सुनवाई 
मैं बड़ा हो गया....
अच्छा लगा ...लगा सोचने  अब मैं उड़ सकता हूं 
ना कोई बंधन ... ना कोई पाबंदी खुद का राजा खुद..…
बस जीने लगा अपनी सपनों की रंगीन दुनिया में.. मैं खुश था मगन था खुद में..

पर...फिर समय बीता वक्त बीता...साल महीने दिन रात  और ऋतुएं बीती...
अब में था... यथार्थ के धरातल में...
रूबरू हुआ दुनिया से... फिर मिला जिम्मेदारियों से... यारों से ..अपनों से बेगानों  से...तब 
लगा किसी ने पटक दिया आसमान से जमीं पर..तब देखी  सपनों की दुनिया की काली तस्वीर...कांप उठा मेरा रोम रोम..
मै चिल्लाया ... मां कहां है ...छिपा ले अपने आंचल में... छांव दे दे अपने आंचल की ..सहला दे मेरे उलझे बालों को... एक चपत तो लगा दे मेरे गालों में... डांट ले मार ले मां .. मैं चुप चाप बस तेरे आंचल में लिपटा रहूंगा.... 
बस एक बार मेरा बचपन लौटा दे कोई...
मैं बिलखता रहा पर कौन सुनता मेरी...
क्योंकि....

वो समय बीत गया वक्त बीत गया साल महीने दिन राल ऋतुएं  सब बीत गए..... सब बीत गए... 
और जो बीत गया वो लौट कर नहीं आता...कभी नहीं 

डॉ नीलम गुप्ता  "नीरा"

पेड़ की प्रेम कथा

* पेड़  की  प्रेमकथा *
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देख रहे हो इस पेड़ को शान्त ..बिलकुल. शान्त..देखो बिलकुल हमारी तरह बनावट है इसकी ...
नीचे देखो एक साथ. ..ना तुम ...ना मैं ..."हम"...
कुछ समय साथ-साथ चलते रहे ...फिर अचानक से दो भागों में  बंट गये ....एक "तुम"... एक "मैं "....
फिर समय ..परिस्थिति ...जिम्मेदारी में उलझ कर...कुछ फासले हुए...
अगर मैं  ये कहूं बिलकुल इसी पेड़ की तरह ....तो अतिशयोक्ति ना होगी ...
एक अन्तराल बाद फिर कुछ पास आये...देखिए इस पेड़ को एक टहनी  को... ना जाने  कहाँ से आकर जोड़ रही है उन दोनों को....
एक डोर में दूरी बनाए हुए ...जुड़ से रहे हैं एक अनजान रिश्ते में .....और साथ-साथ चलने का सुखद एहसास...सीमा रेखाओं की परिधि में .....
पर कब तक...देखिए ना इस वृक्ष को... कुछ समय बाद .....समय ने पिर करवट ली.....नियति का फेर...
एक शाखा करीब आते आते दूर बहुत दूर हो गयी ...और.. फिर से ठूंठ बन गयी...
पर दूसरी  अनवरत एकाकी सी..  मूक...किन्तु  शान्त...अपनी धुन में आगे बढ़ती गयी  ..बढ़ती गयी ...
अन्त में हरा भरा खुशनुमा..माहौल बना कर...दूर क्षितिज मे समा गयी  ...छोड़ गयी  अपने निशां ....
देखो ना ध्यान से देखो....
क्या  मैं झूठ कह रही  हूं...या ये मेरी कोरी  कल्पना मात्र है...
ये  सच है...
और हां एक बात और बता दूं...जिससे फिर ये ना कहो बताया  नहीं  तुमने .....
ये कटु सत्य है...  पर यथार्थ है...इसे तो स्वीकारना ही पड़ेगा...
 वो ठूंठ मै हूं... जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा सानिन्ध्य पाने के लिए बार-बार तुम्हारे करीब आ रही है...और अन्त में यूं ही खाली हाथ... अस्तित्व को समाप्त कर विलीन हो जाती है नीले आसमान में ...
 और वृक्ष का दूसरी डाली ..तुम हो...अनेक झंझावतो को सहते...उसमें  रमते ...शान्त...सीधे ...अपने कार्यों में लिप्त ...अपनी अमिट छाप ..अपने  अस्तित्व की गरिमा को बनाए हुए ..विलीन हो जाते हो दूर क्षितिज में .....
कह रही  हूं ना मैं सच ....अब तुम ही बताओ क्या ये मेरी  कोरी कल्पना है....इसे तुमसे बेहतर कौन. जान सकता है...
ये यथार्थ है...कटु सत्य है...बस फिर ना कहना बताया  नहीं ....
इसके आगे और कुछ बचा ही नहीं  कहने को....और क्या कहूं... कुछ जुड़ाव सा... कुछ. लगाव सा हो गया है इस पेड़ से....जितनी बार देखती हूं...कुछ अपनत्व सा लगता है....
बस तुम देखो ना एक बार.....इस पेड़ को ध्यान से ...."मान लो ना मेरी  बात" 

    डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"