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सोमवार, 25 मई 2020

क्या पूजन-महादेवी वर्मा

क्या पूजन,
क्या पूजन क्या अर्चन रे!

उस असीम का सुंदर मंदिर,
मेरा लघुतम जीवन रे,
मेरी श्वासें करती रहतीं,
नित प्रिय का अभिनंदन रे!

पद रज को धोने उमड़े,
आते लोचन में जल कण रे,
अक्षत पुलकित रोम मधुर,
मेरी पीड़ा का चंदन रे!

स्नेह भरा जलता है झिलमिल,
मेरा यह दीपक मन रे,
मेरे दृग के तारक में,
नव उत्पल का उन्मीलन रे!

                            महादेवी वर्मा 

धूप बने उड़ते जाते हैं, 
प्रतिपल मेरे स्पंदन रे,
प्रिय प्रिय जपते अधर ताल,
देता पलकों का नर्तन रे! 

क्यों इन तारों को उलझाते?-महादेवी वर्मा

क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों,
आ आ कर फिर जाते?

पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर,
क्या यह अस्फुट गाते?

लय में मेरा चिर करुणा-धन,
कम्पन में सपनों का स्पन्दन,
गीतों में भर चिर सुख, चिर दुख,
कण कण में बिखराते!

मेरे शैशव के मधु में घुल,
मेरे यौवन के मद में ढुल,
मेरे आँसू स्मित में हिल मिल,
मेरे क्यों न कहाते? 

                        महादेवी वर्मा 
                                 

मैं अनंत पथ में लिखती जो -महादेवी वर्मा

मै अनंत पथ में लिखती जो
 सस्मित सपनों की बाते
 उनको कभी न धो पायेंगी
 अपने आँसू से रातें!

उड़् उड़ कर जो धूल करेगी
 मेघों का नभ में अभिषेक
 अमिट रहेगी उसके अंचल-
में मेरी पीड़ा की रेख!

तारों में प्रतिबिम्बित हो
 मुस्कायेंगी अनंत आँखें,
हो कर सीमाहीन, शून्य में
 मँडरायेगी अभिलाषें!

वीणा होगी मूक बजाने-
वाला होगा अंतर्धान,
विस्मृति के चरणों पर आ कर
 लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!

जब असीम से हो जायेगा
 मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता
 खेलेगी मिटने का खेल! 
        महादेवी वर्मा 

अलि! मैं कण-कण को जान चली -महादेवी वर्मा

अलि, मैं कण-कण को जान चली,
सबका क्रन्दन पहचान चली।

 जो दृग में हीरक-जल भरते,
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनको से,
जो सुखे अधरों पर झरते।

 जिस मुक्ताहल में मेघ भरे,
जो तारो के तृण में उतरे,
मै नभ के रज के रस-विष के,
आँसू के सब रँग जान चली।

 जिसका मीठा-तीखा दंश न,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता,
जर्जर मानस, चिर आहत मन।

 जो मृदु फूलो के स्पन्दन से,
जो पैना एकाकीपन से,
मै उपवन निर्जन पथ के हर,
कंटक का मृदु मन जान चली।

 गति का दे चिर वरदान चली,
जो जल में विद्युत-प्यास भरा,
जो आतप मे जल-जल निखरा,

              महादेवी वर्मा 

मैं बनी मधुमास आली!-महादेवी वर्मा

मैं बनी मधुमास आली!

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चाँदनी
 उमड़ आई री, दृगों में
 सजनि, कालिन्दी निराली!

रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
 वात मलय-निकुंज-वाली!

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
 मुरलिका मधुराग वाली? 

शून्य से टकरा कर सुकुमार-महादेवी वर्मा

Google celebrates Jnanpith awardee Mahadevi Varma
शून्य से टकरा कर सुकुमार
 करेगी पीड़ा हाहाकार,
बिखर कर कन कन में हो व्याप्त
 मेघ बन छा लेगी संसार!

पिघलते होंगे यह नक्षत्र
 अनिल की जब छू कर नि:श्वास
 निशा के आँसू में प्रतिबिम्ब
 देख निज काँपेगा आकाश!
Great Women of India - Other Great Women Subhadra Kumari Chauhan

             विश्व होगा पीड़ा का राग
          निराशा जब होगी वरदान
       साथ ले कर मुरझाई साध
  बिखर जायेंगे प्यासे प्राण!

                उदधि नभ को कर लेगा प्यार
                मिलेंगे सीमा और अनंत
                  उपासक ही होगा आराध्य
                  एक होंगे पतझड वसंत!

बुझेगा जल कर आशा-दीप
 सुला देगा आकर उन्माद,
कहाँ कब देखा था वह देश?
अतल में डूबेगी यह याद!

                  प्रतीक्षा में मतवाले नयन
                      उड़ेंगे जब सौरभ के साथ,
                        हृदय होगा नीरव आह्वान
                              मिलोगे क्या तब हे अज्ञात
Google Dedicates Google Doodle to Hindi Poet Mahadevi Varma ...
                                              महादेवी वर्मा 

उर तिमिरमय घर तिमिरमय-महादेवी वर्मा

About The Mahadevi Verma - Maha Dev - Medium
                    उर तिमिरमय घर तिमिरमय,
                चल सजनि दीपक बार ले!

               राह में रो रो गये हैं,
          रात और विहान तेरे,
          काँच से टूटे पड़े यह,
             स्वप्न, भूलें, मान तेरे;
           फूलप्रिय पथ शूलमय,
         पलकें बिछा सुकुमार ले!
Mahadevi Verma (27 April 1907-11... - Multiple Action Research ...
तृषित जीवन में घिर घन-
 ; उड़े जो श्वास उर से;
     पलक-सीपी में हुए मुक्ता
       सुकोमल और बरसे;
           मिट रहे नित धूलि में
                   तू गूँथ इनका हार ले !

               मिलन बेला में अलस तू
                सो गयी कुछ जाग कर जब,
Mahadevi Verma: A Feminist Writer And Humanitarian ...
महादेवी वर्मा