डाकियाअब कहाँ हैं वो डाकिये वाले दिन .... घण्टों इंतजार रहता था....टकटकी बन्धी रहती थी देहरी पर..जरा सी आहट पर कदम चल पड़ते थे...धडकनों का संगीत सुनाई देने लगता था... गालों पर बेमौसम गुलाल बिखर जाया करता था....नजरों का काजल अधखिला कमल हो जाया करता था... हर काम बेमानी लगता था उस इंतजार में.... सच... डाकिये का इंतजार बड़ा ही रूमानी लगता था... कहाँ गए वो डाकिये वाले दिन..
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
-
मुकम्मल मेरा जहाँ है माँ यहाँ है माँ,वहाँ है माँ छोटी सी है दुनिया सारा जहाँ है माँ जहां हूँ मैं...
-
पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में हुई दोस्ती ऐसी दु:ख से हर मुश्किल बन गई रुबाई,...
-
बहुत दिनों बाद खुला आसमान! निकली है धूप, खुश हुआ जहान! दिखी दिशाएँ, झलके पेड़, चरने को चले ढोर--गाय-भैंस-भेड़, खेलने लगे लड़के छेड़-छे...