मैं उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग ...
बिखरा पड़ा था आसमान में स्याह रंग...
पर मेरी आँखों में छाया था वो लाल रंग...
उमड़ते घुमड़ते बादलों में हो रही थी कुछ गहमा गहमी..
पर आँखों में लगी थी झड़ी बरसात की...
हर तरफ फैल रही थी धूप की तपस..
पर दिल की तपन का कोई छोर ना था...
तेरी यादों का सफर इतना लंबा तो ना था..
कि हौले हौले तन्हा कर जाए...
यूँ तो वक्त गुजर कर अपने आगोश में ले रहा था...
पर वक्त के फासले मुझे दूरियां गिना रहे थे...
फिर भी...
उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग...
क्योकि ...
तुम्हारी बेरंग यादों के रंग में " रंगने " का मजा ही कुछ औऱ है...
# नीलम " नीरा "