मंगलवार, 26 नवंबर 2024

मैं उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग ...
बिखरा पड़ा था आसमान में स्याह रंग...
पर मेरी आँखों में छाया था वो लाल रंग...
उमड़ते घुमड़ते बादलों में हो रही थी कुछ गहमा गहमी..
पर आँखों में लगी थी झड़ी बरसात की...
हर तरफ फैल रही थी धूप की तपस..
पर दिल की तपन का कोई छोर ना था...
तेरी यादों का सफर इतना लंबा तो ना था..
कि हौले हौले तन्हा कर जाए...
यूँ तो वक्त गुजर कर अपने आगोश में ले रहा था...
पर  वक्त के फासले मुझे दूरियां गिना रहे थे...
फिर भी...
 उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग...
क्योकि ...
तुम्हारी बेरंग यादों के रंग में " रंगने " का मजा ही कुछ औऱ है...

#   नीलम " नीरा "

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

मेरी अभिलाषा

अभिलाषा मन की

उम्र की दहलीज पर आकर 
मन करता है ....आज
कुछ लम्हे ,कुछ पल जिऊं...
 अपने लिए...
दिल में एक कोना ऐसा रखूं
अपने लिए...
 जहां राज हो मेरा खुद का
जहां चले बादशाहत मेरी...
बेगम मैं तो बादशाह भी में ही...
मैं ही चाकर तो खानसामा भी में ही...
रखूं बंद पट उनके लिए जो...
लगाए मुखौटा अपनेपन का ....
चले आते हैं बिन दस्तक दिए....
..............
सच....
मन करता है मेरा आज...
रखूं दिल में एक कोना ऐसा अपने लिए....
जहां बैठ मैं राज करूं...
बैठ सुकून से .....
बात करूं में खुद से खुद की..
ना कोई बंदश, ना कोई रोक हो
झूमती फिरूं मैं....
अपने दिल के आंगन में....
चलाऊं अपनी मन मर्जियां...
उस कोने के हर दरो दीवार पर..
नाम अंकित हो मेरा...
 ...........
सच...
बड़ी ख्वाहिश है मेरी...
उम्र की दहलीज पर आकर...
दिल का एक कोना अपने नाम करूं....
भुला कर शिकवे गिले पुराने..
फिर से एक नयी शुरुआत करूं....
 
 नीलम गुप्ता " नीरा"

शनिवार, 25 मई 2024

वो काली रात.... कैसे भूलूँ उसे...
बेगानों में कितनी अपनी सी है ....
वो काली रात...
कुछ इस तरह आयी मेरे पास...
बैठ सिरहाने मेरे ...चुपके से..
मेरी ख्वाहिशों को...ओढ़ा गयी ..
अपनी स्याह चादर....

यूँ देख उसको दंग रह गयी मैं ...
उसने हौले से मुस्कुराकर जो.....
गले लगाया मुझको ....
उलझा कर अपने आँचल में मुझको ...
चुपचाप सुला गयी ...अपनी स्याह ..
चादर ओढ़ा कर मुझको...

सब्र कर लेती इतने से...गर वो ....
वादा ना करती दुबारा आने का...
पर वो हर रोज आकर...
समीप बैठ मेरे सपनों को ...
ओढ़ा जाती है अपनी स्याह चादर...

पूछती है हाल मेरा ...नम आँखों के कोरों  से....
पोछ गालों की स्याही को..आहिस्ता से..
आगोश में भर मुझको ....सुला जाती है...
अपनी स्याह चादर ओढ़ा....

उसकी मन्द मुस्कान भाने लगी है मुझको ...
अब हर रोज रहता है इन्तजार मुझको ....
उस स्याह काली रात का....
कैसे भूलूँ उस काली रात को....
जो हर रोज बड़े प्यार से.....
अपना बना कर मुझसे मिलने आती है....
मेरे सपनों को...मेरी ख्वाहिशों को...
ढक जाती है अपनी स्याह चादर से....

#   नीलम. " नीरा "

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

सोच रही हूँ....
क्या हूँ " मैं "...
" मैं "
शायद एक अनगढ़ सा  पत्थर हूँ
शान्त और सपाट..निर्विकार सा....

दोस्तों अब ...
मैं ये तुम पर छोड़ती हूँ कि...
कि तुम किस स्वरूप में
मुझे ढालोगे....
तुम चाहो तो मुझे उछालो..
और फेंक दो दूसरे के शीशे के
घरों को तोड़ने के लिए...

या फिर....
मुझे तराश कर...
आकार दे..सुसज्जित कर..
देवता बना पूज लो...

ये सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी मर्जी है...
कि तुम्हारे लिए मैं क्या हूँ....
एक व्यर्थ का पत्थर या देवता..
सब तुम पर छोड़ती हूँ....

और हाँ दोस्तों .....
यदि तुम सोचते हो कि....
मैं तुम्हारे रास्ते की वाधा हूँ...
तो तुम मुझे ठोकर मार कर....
अपने रास्ते से हटा देना...
मुझ से बच कर किनारा कर लेना...
एक पल के लिए भी तुम....
विचलित मत होना...

दोस्तों ...
सब कुछ तुम पर छोड़ती हूँ....
अब देखना है....
मेरी नियति क्या है ....??

#  नीलम. " नीरा "