शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो-सुभद्रा कुमारी चौहान

विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
 अरे न पूछो, कह न सकूँगी,
तुमसे मैं अपनी बीती॥

 नहीं मानते हो तो जा
 उन मुकुलित कलियों से पूछो।
 अथवा विरह विकल घायल सी
 भ्रमरावलियों से पूछो॥

 जो माली के निठुर करों से
 असमय में दी गईं मरोड़।
 जिनका जर्जर हृदय विकल है,
प्रेमी मधुप-वृंद को छोड़॥

 सिंधु-प्रेयसी सरिता से तुम
 जाके पूछो मेरा हाल।
 जिसे मिलन-पथ पर रोका हो,
कहीं किसी ने बाधा डाल॥

नीम-सुभद्रा कुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
 तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥
 ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं।
 निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥
 हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
 उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥
 नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
 कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली॥
 तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
 तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी॥
 है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा।
 ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा॥
 तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा॥
 तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै।
 इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै॥
 प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो।
 जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो॥
 तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
 निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो॥

प्रथम दर्शन-सुभद्रा कुमारी चौहान

प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
 बिना परिचय के एकाएक
 हृदय में उलझन पड़ ही गई॥

 मूँदने पर भी दोनों नेत्र,
खड़े दिखते सम्मुख साकार।
 पुतलियों में उनकी छवि श्याम
 मोहिनी, जीवित जड़ ही गई॥

 भूल जाने को उनकी याद,
किए कितने ही तो उपचार।
 किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति
 छाप-सी दिल पर पड़ ही गई॥

प्रभु तुम मेरे मन की जानो -सुभद्रा कुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
 प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
 यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

 इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
 तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
 तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
 जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

 मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
 और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥
 मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
 मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

 तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
 बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

 कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
 दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥
 मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
 यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

 यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
 यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥
 ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

 मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
 जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥
 वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
 और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

 तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
 छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥

प्रतीक्षा-सुभद्रा कुमारी चौहान

बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
 नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
 उनमें जाने कितनी ही
 अभिलाषाओं के पल्लव पाल॥

 बिता दिए मैंने कितने ही
 व्याकुल दिन, अकुलाई रात।
 नीरस नैन हुए कब करके
 उमड़े आँसू की बरसात॥

 मैं सुदूर पथ के कलरव में,
सुन लेने को प्रिय की बात।
 फिरती विकल बावली-सी
 सहती अपवादों के आघात॥

 किंतु न देखा उन्हें अभी तक
 इन ललचाई आँखों ने।
 संकोचों में लुटा दिया
 सब कुछ, सकुचाई आँखों ने॥

 अब मोती के जाल बिछाकर,
गिनतीं हैं नभ के तारे।
 इनकी प्यास बुझाने को सखि!
आएंगे क्या फिर प्यारे?

प्रियतम से -सुभद्रा कुमारी चौहान

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
 अब रूखा व्यवहार न हो।
 अजी, बोल तो लिया करो तुम
 चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

 जरा जरा सी बातों पर
 मत रूठो मेरे अभिमानी।
 लो प्रसन्न हो जाओ
 ग़लती मैंने अपनी सब मानी॥

 मैं भूलों की भरी पिटारी
 और दया के तुम आगार।
 सदा दिखाई दो तुम हँसते
 चाहे मुझ से करो न प्यार॥

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

उल्लास-सुभद्रा कुमारी चौहान

शैशव के सुन्दर प्रभात का
 मैंने नव विकास देखा।
 यौवन की मादक लाली में
 जीवन का हुलास देखा।।

 जग-झंझा-झकोर में
 आशा-लतिका का विलास देखा।
 आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
 क्रम-क्रम से प्रकाश देखा।।

 जीवन में न निराशा मुझको
 कभी रुलाने को आयी।
 जग झूठा है यह विरक्ति भी
 नहीं सिखाने को आयी।।

 अरिदल की पहिचान कराने
 नहीं घृणा आने पायी।
 नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
 भीषणता लाने पायी।।

आराधना -सुभद्रा कुमारी चौहान

जब मैं आँगन में पहुँची,
पूजा का थाल सजाए।
 शिव जी की तरह दिखे वे,
बैठे थे ध्यान लगाए॥

 जिन चरणों के पूजन को, 
यह हृदय विकल हो जाता।
 मैं समझ न पाई, वह भी, 
है किसका ध्यान लगाता?

मैं सन्मुख ही जा बैठी,
कुछ चिंतित सी घबराई।
 यह किसके आराधक हैं,
मन में व्याकुलता छाई॥

 मैं इन्हें पूजती निशि-दिन,
ये किसका ध्यान लगाते?
हे विधि! कैसी छलना है,
हैं कैसे दृश्य दिखाते??

टूटी समाधि इतने ही में,
नेत्र उन्होंने खोले।
 लख मुझे सामने हँस कर
 मीठे स्वर में वे बोले॥

 फल गई साधना मेरी,
तुम आईं आज यहाँ पर।
 उनकी मंजुल-छाया में
 भ्रम रहता भला कहाँ पर॥

 अपनी भूलों पर मन यह
 जाने कितना पछताया।
 संकोच सहित चरणों पर,
जो कुछ था वही चढ़ाया॥

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कोयल -सुभद्रा कुमारी चौहान

देखो कोयल काली है पर, 
मीठी है इसकी बोली,
इसने ही तो कूक कूक कर,
आमों में मिश्री घोली।

 कोयल कोयल सच बतलाना,
क्या संदेसा लायी हो?
बहुत दिनों के बाद आज फिर,
इस डाली पर आई हो।

 क्या गाती हो किसे बुलाती?
बतला दो कोयल रानी,
प्यासी धरती देख मांगती,
हो क्या मेघों से पानी?

कोयल यह मिठास क्या तुमने,
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी,
बोली यह सिखलायी है?

डाल डाल पर उड़ना गाना,
जिसने तुम्हें सिखाया है,
सबसे मीठे मीठे बोलो,
यह भी तुम्हें बताया है।

 बहुत भली हो तुमने माँ की,
बात सदा ही है मानी,
इसीलिये तो तुम कहलाती,
हो सब चिड़ियों की रानी।
               सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरा नया बचपन-सुभद्रा कुमारी चौहान

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
 गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

 चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
 कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

 किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
 किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

 रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
 बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

 मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
 झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

 दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
 धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

 वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
 लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

 लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
 तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

 दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
 मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

 मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
 अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

 सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
 प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

 माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
 आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

 किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
 चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

 आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
 व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

 वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
 क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
 नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
 कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

 पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
 मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

 मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
 उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

 मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
 मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

 जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
 भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥
सुभद्रा कुमारी चौहान 

झांसी की रानी-सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

 चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

 वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

 निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

 अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

 रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

 बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
 'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

 हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

 लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

 ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

 अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

 पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

 घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

 तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सुभद्रा कुमारी चौहान 

मापदण्ड बदलो-दुष्यंत कुमार

मेरी प्रगति या अगति का
 यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
 मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
 मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
 नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

 अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
 मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
 एक बार और
 शक्ति आज़माने को
 धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
 मचल रही होंगी ।
 एक और अवसर की प्रतीक्षा में
 मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।

 ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
 ये मुझको उकसाते हैं ।
 पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
 मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
 मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
 क़सम देती हैं ।

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये-दुष्यंत कुमार

अब अंतर में अवसाद नहीं 
 चापल्य नहीं उन्माद नहीं 
 सूना-सूना सा जीवन है 
 कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं 

 तव स्वागत हित हिलता रहता 
 अंतरवीणा का तार प्रिये ..

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी 
 आशाएं मुझसे छूट चुकी 
 सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ 
 मेरे हाथों से टूट चुकी 

 खो बैठा अपने हाथों ही 
 मैं अपना कोष अपार प्रिये 
 फिर कर लेने दो प्यार प्रिये ..

आज सडकों पर-दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

 एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

 अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

 वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

 ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

 राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

आग जलती रहे-दुष्यंत कुमार

एक तीखी आँच ने
 इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
 हाथों से गुजरता कल छुआ
 हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
 जो मुझे छूने चली
 हर उस हवा का आँचल छुआ
... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता
 आग के संपर्क से
 दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
 मैं उबलता रहा पानी-सा
 परे हर तर्क से
 एक चौथाई उमर
 यों खौलते बीती बिना अवकाश
 सुख कहाँ
 यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
 छानता आकाश
 आह! कैसा कठिन
... कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
 आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
 ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
 जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

चीथड़े में हिन्दुस्तान- दुष्यंत कुमार

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

 ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

 एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। 

 मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

 इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
 जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

 कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।

 मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

मत कहो आकाश में कोहरा घना है-दुष्यंत कुमार

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

 सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,
क्या कारोगे सूर्य का क्या देखना है।

 हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।

 दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे- दुष्यंत कुमार

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
 इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

 हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
 हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

 थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
 तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

 उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
 वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

 फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
 अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

 रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
 आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

 मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
 हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगेहम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
 इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे

 हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
 अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे

अब तो पथ यही है- दुष्यंत कुमार

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए, 
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है| 

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |

हो गई है पीर पर्वत-दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
 इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
 शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

 हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
 हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

 सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
 मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

 मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
 हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए