गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों-गोपालदास "नीरज"

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,   
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!

- गोपालदास "नीरज"

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए

- गोपालदास "नीरज" मेंेेछिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,    
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है! 

- गोपालदास "नीरज"
है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये
है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए

- गोपालदास "नीरज"
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा 
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा । 
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में, 
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा । 

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में, 
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा । 

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की, 
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा । 

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में, 
उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।

- गोपालदास "नीरज"

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ-रामावतार त्यागी

मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।
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गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।

स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।

सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



रामावतार त्यागी

मैं ऐसे मन बहलाता हूँ!-हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
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आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
Image result for harivansh rai bachchanऐसे मैं मन बहलाता हूँ!





राही चल अकेला-प्रदीप

चल अकेला चल अकेला चल अकेला 
 तेरा मेल पीछे छूटा राही चल अकेला 
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 हजारों मील लम्बे रस्ते तुझको बुलाते 
 यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते 
 है कौन सा वो इन्सान यहाँ पे
 जिसने दुःख ना झेला 
 चल अकेला चल अकेला चल अकेला...

तेरा कोई साथ न दे तो Image result for kavi pradeep
 तू खुद से प्रीत जोड़ ले 
 बिचौना धरती को करके 
 अरे आकाश ओढ़ ले 
 पूरा खेल अभी जीवन का
 तूने कहाँ है खेला 
 चल अकेला चल अकेला चल अकेला
 तेरा मेल पीछे छूटा राही चल अकेला
      Image result for kavi pradeepकविवर प्रदीप

तो क्या यहीं? -अशोक_चक्रधर

तलब होती है बावली,
क्योंकि रहती है उतावली।
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बौड़म जी ने
सिगरेट ख़रीदी
एक जनरल स्टोर से,
और फ़ौरन लगा ली
मुँह के छोर से।
ख़ुशी में गुनगुनाने लगे,
और वहीं सुलगाने लगे।
दुकानदार ने टोका,
सिगरेट जलाने से रोका-
श्रीमान जी!मेहरबानी कीजिए,
पीनी है तो बाहर पीजिए।
बौड़म जी बोले-कमाल है,
ये तो बड़ा गोलमाल है।
पीने नहीं देते
तो बेचते क्यों हैं?
दुकानदार बोला-
इसका जवाब यों है
कि बेचते तो हम लोटा भी हैं,
और बेचते जमालगोटा भी हैं,
अगर इन्हें ख़रीदकर
आप हमें निहाल करेंगे,
तो क्या यहीं
उनका इस्तेमाल करेंगे?
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ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप

ऐ मेरे वतन के लोगों
 तुम खूब लगा लो नारा
 ये शुभ दिन है हम सब का
 लहरा लो तिरंगा प्यारा
 पर मत भूलो सीमा पर
 वीरों ने हैं प्राण गँवाए
 कुछ याद उन्हें भी कर लो -२
 जो लौट के घर न आये -२

 ऐ मेरे वतन के लोगों
 ज़रा आँख में भर लो पानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 जब घायल हुआ हिमालय
 खतरे में पड़ी आज़ादी
 जब तक थी साँस लड़े वो
 फिर अपनी लाश बिछा दी
 संगीन पे धर कर माथा
 सो गये अमर बलिदानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 जब देश में थी दीवाली
 वो खेल रहे थे होली
 जब हम बैठे थे घरों में
 वो झेल रहे थे गोली
 थे धन्य जवान वो अपने 
 थी धन्य वो उनकी जवानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 कोई सिख कोई जाट मराठा
 कोई गुरखा कोई मदरासी
 सरहद पर मरनेवाला
 हर वीर था भारतवासी
 जो खून गिरा पर्वत पर
 वो खून था हिंदुस्तानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 थी खून से लथ-पथ काया
 फिर भी बन्दूक उठाके
 दस-दस को एक ने मारा
 फिर गिर गये होश गँवा के
 जब अन्त-समय आया तो
 कह गये के अब मरते हैं
 खुश रहना देश के प्यारों
 अब हम तो सफ़र करते हैं
 क्या लोग थे वो दीवाने
 क्या लोग थे वो अभिमानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 तुम भूल न जाओ उनको
 इसलिये कही ये कहानी
 जो शहीद हुए हैं उनकी
 ज़रा याद करो क़ुरबानी

 जय हिन्द...
जय हिन्द की सेना -२
 जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द-----------Image result for kavi pradeep
                             प्रदीप

हम तो करेंगे- अशोक_चक्रधर

गुनह करेंगे 

 हम तो करेंगे

गुनह करेंगे
पुनह करेंगे।
वजह नहीं
बेवजह करेंगे।

कल से ही लो
कलह करेंगे।
जज़्बातों को
जिबह करेंगे
निर्लज्जों से
निबह करेंगे
सुलगाने को
सुलह करेंगे।
हम ज़ालिम क्यों
जिरह करेंगे

संबंधों में
गिरह करेंगे
रस विशेष में
विरह करेंगे
जो हो, अपनी
तरह करेंगे
रात में चूके
सुबह करेंगे

गुनह करेंगे
पुनह करेंगे    \
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         अशोक_चक्रधर


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तेरा है- अशोक_चक्रधर

तू गर दरिन्दा है तो ये मसान तेरा है,
अगर परिन्दा है तो आसमान तेरा है।

तबाहियां तो किसी और की तलाश में थीं
कहां पता था उन्हें ये मकान तेरा है।

छलकने मत दे अभी अपने सब्र का प्याला,
ये सब्र ही तो असल इम्तेहान तेरा है।

भुला दे अब तो भुला दे कि भूल किसकी थी
न भूल प्यारे कि हिन्दोस्तान तेरा है।

न बोलना है तो मत बोल ये तेरी मरज़ी
है, चुप्पियों में मुकम्मिल बयान तेरा है।

तू अपने देश के दर्पण में ख़ुद को देख ज़रा
सरापा जिस्म ही देदीप्यमान तेरा है।
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हर एक चीज़ यहां की, तेरी है, तेरी है,
तेरी है क्योंकि सभी पर निशान तेरा है।

हो चाहे कोई भी तू, हो खड़ा सलीक़े से
ये फ़िल्मी गीत नहीं, राष्ट्रगान तेरा है/                                        
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अशोक चक्रधर


आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख -दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

-दुष्यंत कुमार
Today on the streets - Dushyant Kumar - Amazing Hindi poems
मुझे उनकी महान कविता के कारण मुझेदुष्यंत कुमार से प्यार है और मैं उनका आदर करता हूं

आ रही रवि की सवारी।-हरिवंशराय बच्चन

आ रही रवि की सवारी।
नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।

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-हरिवंशराय बच्चन

भिक्षुक -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

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वह आता--
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,

भिक्षुक : सूर्य कान्त त्रिपाठी ...
मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?--
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं-गोपालदास नीरज

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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते.
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते.
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं.
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते.
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे.
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं.
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है.
पग में गती आती है, छाले छिलने से.
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

फूलों से जग आसान नहीं होता है.
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है.
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी.
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है.
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे.
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता.
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता.
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर.
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता.
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे.
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये -गोपालदास नीरज

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
 जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

 रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
 अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

 अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
 ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

 फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
 जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

 छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
 आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

 दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
 तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहि


मानव कवि बन जाता है -गोपालदास नीरज

तब मानव कवि बन जाता है !
जब उसको संसार रुलाता,
वह अपनों के समीप जाता,
पर जब वे भी ठुकरा देते
 वह निज मन के सम्मुख आता,
पर उसकी दुर्बलता पर जब मन भी उसका मुस्काता है !
तब मानव कवि बन जाता है !

मेरा गीत दिया बन जाए -गोपालदास नीरज

अंधियारा जिससे शरमाये,
उजियारा जिसको ललचाये,
ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!

इतने छलको अश्रु थके हर
 राहगीर के चरण धो सकूं,
इतना निर्धन करो कि हर
 दरवाज़े पर सर्वस्व खो सकूं

 ऎसी पीर भरो प्राणों में
 नींद न आये जनम-जनम तक,
इतनी सुध-बुध हरो कि
 सांवरिया खुद बांसुरिया बन जायें!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

घटे न जब अंधियार, करे
 तब जलकर मेरी चिता उजेला,
पहला शव मेरा हो जब
 निकले मिटने वालों का मेला

 पहले मेरा कफ़न पताका
 बन फहरे जब क्रान्ति पुकारे,
पहले मेरा प्यार उठे जब
 असमय मृत्यु प्रिया बन जाये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

मुरझा न पाये फसल न कोई
 ऎसी खाद बने इस तन की,
किसी न घर दीपक बुझ पाये
 ऎसी जलन जले इस मन की

 भूखी सोये रात न कोई
 प्यासी जागे सुबह न कोई,
स्वर बरसे सावन आ जाये
 रक्त गिरे, गेहूं उग आये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

बहे पसीना जहां, वहां
 हरयाने लगे नई हरियाली,
गीत जहां गा आय, वहां
 छा जाय सूरज की उजियाली

 हंस दे मेरा प्यार जहां
 मुसका दे मेरी मानव-ममता
 चन्दन हर मिट्टी हो जाय
 नन्दन हर बगिया बन जाये।

 ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

उनकी लाठी बने लेखनी
 जो डगमगा रहे राहों पर,
हृदय बने उनका सिंघासन
 देश उठाये जो बाहों पर

 श्रम के कारण चूम आई
 वह धूल करे मस्तक का टीका,
काव्य बने वह कर्म, कल्पना-
से जो पूर्व क्रिया बन जाये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

मुझे श्राप लग जाये, न दौङूं
 जो असहाय पुकारों पर मैं,
आंखे ही बुझ जायें, बेबेसी
 देखूं अगर बहारों पर मैं

 टूटे मेरे हांथ न यदि यह
 उठा सकें गिरने वालों को
 मेरा गाना पाप अगर
 मेरे होते मानव मर जाय!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

आदमी को प्यार दो -गोपालदास नीरज

सूनी-सूनी ज़िंदगी की राह है,
भटकी-भटकी हर नज़र-निगाह है,
राह को सँवार दो,
निगाह को निखार दो,

आदमी हो तुम कि उठा आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।
 रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो।

 तुम हो एक फूल कल जो धूल बनके जाएगा,
आज है हवा में कल ज़मीन पर ही आएगा,
चलते व़क्त बाग़ बहुत रोएगा-रुलाएगा,
ख़ाक के सिवा मगर न कुछ भी हाथ आएगा,

ज़िंदगी की ख़ाक लिए हाथ में,
बुझते-बुझते सपने लिए साथ में,
रुक रहा हो जो उसे बयार दो,
चल रहा हो उसका पथ बुहार दो।
 आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

 ज़िंदगी यह क्या है- बस सुबह का एक नाम है,
पीछे जिसके रात है और आगे जिसके शाम है,
एक ओर छाँह सघन, एक ओर घाम है,
जलना-बुझना, बुझना-जलना सिर्फ़ जिसका काम है,
न कोई रोक-थाम है,

ख़ौफनाक-ग़ारो-बियाबान में,
मरघटों के मुरदा सुनसान में,
बुझ रहा हो जो उसे अंगार दो,
जल रहा हो जो उसे उभार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

खग ! उडते रहना जीवन भर!--गोपालदास नीरज

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खग ! उडते रहना जीवन भर!
भूल गया है तू अपना पथ,
और नहीं पंखों में भी गति,
किंतु लौटना पीछे पथ पर अरे, मौत से भी है बदतर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर!
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मत डर प्रलय झकोरों से तू,
बढ़ आशा हलकोरों से तू,
क्षण में यह अरि-दल मिट जायेगा तेरे पंखों से पिस कर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर !

यदि तू लौट पडेगा थक कर,
अंधड़ काल बवंडर से डर,
प्यार तुझे करने वाले ही देखेंगे तुझको हँस-हँस कर।
 खग ! उडते रेहना जीवन भर !

और मिट गया चलते चलते,
मंजिल पथ तय करते करते,
तेरी खाक चढाएगा जग उन्नत भाल और आखों पर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर !
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                                                                     -गोपालदास नीरज 

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना -गोपालदास नीरज

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,Image result for gopal das neeraj
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
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                                                               -गोपालदास नीरज