गुरुवार, 25 जून 2020

पड़ोसी से / अटल बिहारी वाजपेयी

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है ।
औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?

अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं / अटल बिहारी वाजपेयी

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता,
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता।
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा।
शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा।
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास

जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी



जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें।
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें।
याद करें काला पानी को,
अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते,
सावरकर से बलिदानी को।
याद करें बहरे शासन को,
बम से थर्राते आसन को,
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू
के आत्मोत्सर्ग पावन को।
अन्यायी से लड़े,
दया की मत फरियाद करें।
उनकी याद करें।
बलिदानों की बेला आई,
लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा
जिससे कीमत गई चुकाई
मुक्ति माँगती शक्ति संगठित,
युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित,
कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी
मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत।
अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में
क्यों अवसाद करें?
उनकी याद करें

राह कौन सी जाऊँ मैं? / अटल बिहारी वाजपेयी

चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं 

दो अनुभूतियाँ -अटल बिहारी वाजपेयी

पहली अनुभूति:
गीत नहीं गाता हूँ

 बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं 
 टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ
 लगी कुछ ऐसी नज़र
 बिखरा शीशे सा शहर

 अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ

 पीठ मे छुरी सा चांद
 राहू गया रेखा फांद
 मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ

 दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ

 टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
 पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
 झरे सब पीले पात
 कोयल की कुहुक रात

 प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
 गीत नया गाता हूँ

 टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
 अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
 हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
 गीत नया गाता हूँ

हरी हरी दूब पर-अटल बिहारी वाजपेयी

हरी हरी दूब पर 
 ओस की बूंदे 
 अभी थी, 
अभी नहीं हैं| 
ऐसी खुशियाँ 
 जो हमेशा हमारा साथ दें 
 कभी नहीं थी, 
कहीं नहीं हैं| 

क्काँयर की कोख से 
 फूटा बाल सूर्य, 
जब पूरब की गोद में 
 पाँव फैलाने लगा, 
तो मेरी बगीची का 
 पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, 
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ 
 या उसके ताप से भाप बनी, 
ओस की बुँदों को ढूंढूँ? 

कौरव कौन, कौन पांडव -अटल बिहारी वाजपेयी

कौरव कौन
 कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
 का फैला
 कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
 जुए की लत है|
हर पंचायत में
 पांचाली
 अपमानित है|
बिना कृष्ण के
 आज
 महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

दूध में दरार पड़ गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
 बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई।

 खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
 सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
 वसंत से बहार झड़ गई
 दूध में दरार पड़ गई।

 अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
 बात बनाएँ, बिगड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई

क्षमा याचना-अटल बिहारी वाजपेयी

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

 जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
 चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे

अंतरद्वंद्व -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?
 
वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?

जीवन की ढलने लगी साँझ -अटल बिहारी वाजपेयी

जीवन की ढलने लगी सांझ
 उमर घट गई
 डगर कट गई
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

 बदले हैं अर्थ
 शब्द हुए व्यर्थ
 शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

 सपनों में मीत
 बिखरा संगीत
 ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

मौत से ठन गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई! 
मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था, 
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

 मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

 मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, 
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? 

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, 
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। 

 मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, 
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। 

 बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, 
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। 

 प्यार इतना परायों से मुझको मिला, 
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। 

 हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, 
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। 

 आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, 
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। 

 पार पाने का क़ायम मगर हौसला, 
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। 

 मौत से ठन गई

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ -अटल बिहारी वाजपेयी

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 सवेरा है मगर पूरब दिशा में 
 घिर रहे बादल 
 रूई से धुंधलके में 
 मील के पत्थर पड़े घायल 
 ठिठके पाँव 
 ओझल गाँव 
 जड़ता है न गतिमयता 

 स्वयं को दूसरों की दृष्टि से 
 मैं देख पाता हूं 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 समय की सदर साँसों ने 
 चिनारों को झुलस डाला, 
मगर हिमपात को देती 
 चुनौती एक दुर्ममाला, 

बिखरे नीड़, 
विहँसे चीड़, 
आँसू हैं न मुस्कानें, 
हिमानी झील के तट पर 
 अकेला गुनगुनाता हूँ। 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

एक बरस बीत गया -अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया 
 
झुलसाता जेठ मास 
 शरद चांदनी उदास 
 सिसकी भरते सावन का 
 अंतर्घट रीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
सीकचों मे सिमटा जग 
 किंतु विकल प्राण विहग 
 धरती से अम्बर तक 
 गूंज मुक्ति गीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
पथ निहारते नयन 
 गिनते दिन पल छिन 
 लौट कभी आएगा 
 मन का जो मीत गया 
 एक बरस बीत गया

अपने ही मन से कुछ बोलें -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या खोया, क्या पाया जग में
 मिलते और बिछुड़ते मग में
 मुझे किसी से नहीं शिकायत
 यद्यपि छला गया पग-पग में
 एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
 जीवन एक अनन्त कहानी
 पर तन की अपनी सीमाएँ
 यद्यपि सौ शरदों की वाणी
 इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
 जीवन बंजारों का डेरा
 आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
 कौन जानता किधर सवेरा
 अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

झुक नहीं सकते -अटल बिहारी वाजपेयी

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

 सत्य का संघर्ष सत्ता से
 न्याय लड़ता निरंकुशता से
 अंधेरे ने दी चुनौती है
 किरण अंतिम अस्त होती है

 दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
 वज्र टूटे या उठे भूकंप
 यह बराबर का नहीं है युद्ध
 हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
 हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
 और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

 किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
 अंगद ने बढ़ाया चरण
 प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
 समर्पण की माँग अस्वीकार

 दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
 टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

ऊँचाई -अटल बिहारी वाजपेयी

ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है। 

जमती है सिर्फ बर्फ, 
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 
मौत की तरह ठंडी होती है। 
खेलती, खिलखिलाती नदी, 
जिसका रूप धारण कर, 
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 

 ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 
 पानी को पत्थर कर दे, 
ऐसी ऊँचाई 
 जिसका दरस हीन भाव भर दे, 
अभिनंदन की अधिकारी है, 
आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, 

किन्तु कोई गौरैया, 
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, 
ना कोई थका-मांदा बटोही, 
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 

 सच्चाई यह है कि 
 केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, 
सबसे अलग-थलग, 
परिवेश से पृथक, 
अपनों से कटा-बँटा, 
शून्य में अकेला खड़ा होना, 
पहाड़ की महानता नहीं, 
मजबूरी है। 
 ऊँचाई और गहराई में 
 आकाश-पाताल की दूरी है। 

जो जितना ऊँचा, 

पुनः चमकेगा दिनकर -अटल बिहारी वाजपेयी

आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
 न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
 पुनः चमकेगा दिनकर।

क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी

बाधाएँ आती हैं आएँ
 घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

आओ फिर से दिया जलाएँ -अटल बिहारी वाजपेयी

आओ फिर से दिया जलाएँ
 भरी दुपहरी में अंधियारा
 सूरज परछाई से हारा
 अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ

 हम पड़ाव को समझे मंज़िल
 लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
 वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ।

 आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
 अपनों के विघ्नों ने घेरा
 अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ