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शनिवार, 2 मई 2020

तुम ही नहीं मिले जीवन में -गोपालदास नीरज

पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में

 हुई दोस्ती ऐसी दु:ख से
 हर मुश्किल बन गई रुबाई,
इतना प्यार जलन कर बैठी
 क्वाँरी ही मर गई जुन्हाई,
बगिया में न पपीहा बोला, द्वार न कोई उतरा डोला,
सारा दिन कट गया बीनते काँटे उलझे हुए बसन में।
 पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में
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 कहीं चुरा ले चोर न कोई
 दर्द तुम्हारा, याद तुम्हारी,
इसीलिए जगकर जीवन-भर
 आँसू ने की पहरेदारी,
बरखा गई सुने बिन वंशी औ' मधुमास रहा निरवंशी,
गुजर गई हर ऋतु ज्यों कोई भिक्षुक दम तोड़े दे विजन में।
 पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में
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 घट भरने को छलके पनघट
 सेज सजाने दौड़ी कलियाँ,
पर तेरी तलाश में पीछे
 छूट गई सब रस की गलियाँ,
सपने खेल न पाए होली, अरमानों के लगी न रोली,
बचपन झुलस गया पतझर में, यौवन भीग गया सावन में।
 पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में

 मिट्‍टी तक तो रुंदकर जग में कंकड़ से बन गई खिलौना,
पर हर चोट ब्याह करके भी
 मेरा सूना रहा बिछौना,
नहीं कहीं से पाती आई, नहीं कहीं से मिली बधाई
 सूनी ही रह गई डाल इस इतने फूलों भरे चमन में।
 पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में

 तुम ही हो वो जिसकी खातिर
 निशि-दिन घूम रही यह तकली
 तुम ही यदि न मिले तो है सब
 व्यर्थ कताई असली-नकली,
अब तो और न देर लगाओ, चाहे किसी रूप में आओ,
एक सूत-भर की दूरी है बस दामन में और कफ़न में।
 पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
 इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं-गोपालदास नीरज

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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते.
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते.
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं.
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते.
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे.
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं.
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है.
पग में गती आती है, छाले छिलने से.
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

फूलों से जग आसान नहीं होता है.
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है.
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी.
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है.
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे.
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता.
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता.
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर.
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता.
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे.
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो.
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो.

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये -गोपालदास नीरज

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
 जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

 रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
 अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

 अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
 ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

 फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
 जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

 छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
 आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

 दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
 तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहि


मानव कवि बन जाता है -गोपालदास नीरज

तब मानव कवि बन जाता है !
जब उसको संसार रुलाता,
वह अपनों के समीप जाता,
पर जब वे भी ठुकरा देते
 वह निज मन के सम्मुख आता,
पर उसकी दुर्बलता पर जब मन भी उसका मुस्काता है !
तब मानव कवि बन जाता है !

मेरा गीत दिया बन जाए -गोपालदास नीरज

अंधियारा जिससे शरमाये,
उजियारा जिसको ललचाये,
ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!

इतने छलको अश्रु थके हर
 राहगीर के चरण धो सकूं,
इतना निर्धन करो कि हर
 दरवाज़े पर सर्वस्व खो सकूं

 ऎसी पीर भरो प्राणों में
 नींद न आये जनम-जनम तक,
इतनी सुध-बुध हरो कि
 सांवरिया खुद बांसुरिया बन जायें!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

घटे न जब अंधियार, करे
 तब जलकर मेरी चिता उजेला,
पहला शव मेरा हो जब
 निकले मिटने वालों का मेला

 पहले मेरा कफ़न पताका
 बन फहरे जब क्रान्ति पुकारे,
पहले मेरा प्यार उठे जब
 असमय मृत्यु प्रिया बन जाये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

मुरझा न पाये फसल न कोई
 ऎसी खाद बने इस तन की,
किसी न घर दीपक बुझ पाये
 ऎसी जलन जले इस मन की

 भूखी सोये रात न कोई
 प्यासी जागे सुबह न कोई,
स्वर बरसे सावन आ जाये
 रक्त गिरे, गेहूं उग आये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

बहे पसीना जहां, वहां
 हरयाने लगे नई हरियाली,
गीत जहां गा आय, वहां
 छा जाय सूरज की उजियाली

 हंस दे मेरा प्यार जहां
 मुसका दे मेरी मानव-ममता
 चन्दन हर मिट्टी हो जाय
 नन्दन हर बगिया बन जाये।

 ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

उनकी लाठी बने लेखनी
 जो डगमगा रहे राहों पर,
हृदय बने उनका सिंघासन
 देश उठाये जो बाहों पर

 श्रम के कारण चूम आई
 वह धूल करे मस्तक का टीका,
काव्य बने वह कर्म, कल्पना-
से जो पूर्व क्रिया बन जाये!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

मुझे श्राप लग जाये, न दौङूं
 जो असहाय पुकारों पर मैं,
आंखे ही बुझ जायें, बेबेसी
 देखूं अगर बहारों पर मैं

 टूटे मेरे हांथ न यदि यह
 उठा सकें गिरने वालों को
 मेरा गाना पाप अगर
 मेरे होते मानव मर जाय!

ऎसा दे दो दर्द मुझे तुम
 मेरा गीत दिया बन जाये!!

आदमी को प्यार दो -गोपालदास नीरज

सूनी-सूनी ज़िंदगी की राह है,
भटकी-भटकी हर नज़र-निगाह है,
राह को सँवार दो,
निगाह को निखार दो,

आदमी हो तुम कि उठा आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।
 रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो।

 तुम हो एक फूल कल जो धूल बनके जाएगा,
आज है हवा में कल ज़मीन पर ही आएगा,
चलते व़क्त बाग़ बहुत रोएगा-रुलाएगा,
ख़ाक के सिवा मगर न कुछ भी हाथ आएगा,

ज़िंदगी की ख़ाक लिए हाथ में,
बुझते-बुझते सपने लिए साथ में,
रुक रहा हो जो उसे बयार दो,
चल रहा हो उसका पथ बुहार दो।
 आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

 ज़िंदगी यह क्या है- बस सुबह का एक नाम है,
पीछे जिसके रात है और आगे जिसके शाम है,
एक ओर छाँह सघन, एक ओर घाम है,
जलना-बुझना, बुझना-जलना सिर्फ़ जिसका काम है,
न कोई रोक-थाम है,

ख़ौफनाक-ग़ारो-बियाबान में,
मरघटों के मुरदा सुनसान में,
बुझ रहा हो जो उसे अंगार दो,
जल रहा हो जो उसे उभार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

खग ! उडते रहना जीवन भर!--गोपालदास नीरज

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खग ! उडते रहना जीवन भर!
भूल गया है तू अपना पथ,
और नहीं पंखों में भी गति,
किंतु लौटना पीछे पथ पर अरे, मौत से भी है बदतर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर!
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मत डर प्रलय झकोरों से तू,
बढ़ आशा हलकोरों से तू,
क्षण में यह अरि-दल मिट जायेगा तेरे पंखों से पिस कर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर !

यदि तू लौट पडेगा थक कर,
अंधड़ काल बवंडर से डर,
प्यार तुझे करने वाले ही देखेंगे तुझको हँस-हँस कर।
 खग ! उडते रेहना जीवन भर !

और मिट गया चलते चलते,
मंजिल पथ तय करते करते,
तेरी खाक चढाएगा जग उन्नत भाल और आखों पर।
 खग ! उडते रहना जीवन भर !
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                                                                     -गोपालदास नीरज 

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना -गोपालदास नीरज

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,Image result for gopal das neeraj
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
 जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
 अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
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                                                               -गोपालदास नीरज