शनिवार, 22 जनवरी 2022

तुम बिन अधूरा हूँ ....

( ये उन पुरूषों की व्यथा है...जिनकी पत्नी किसी भी कारण से उनसे दूर है....वह सभी परिस्थितियों का निर्वाह कुशलतापूर्वक कर तो रहे है पर....उस रिक्त स्थान की कमी यथावत् बनी रहती है उनके  जीवन में ......)

कुछ आधा -आधा...कुछ पूरा हूं मैं ...
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं ......
हो रहे हर काम वक्त पर....
बना भी रहा दाना - पानी भी.....
पर हर कदम पर कमी तेरी है सालती.....
जी भी रहा मैं ....जिया भी रहा मैं ....
छोड़ रहा ना कोई कोर कसर बाकी ....
पर क्या कहूं किसी  से.....
तुझ बिन अधूरा  - सा हूं मैं ......

कर रहा परवरिश भी....
ढाप रहा तेरी कमी भी....
सुना रहा लोरी भी.....गीत रहा गुनगुना  भी.....
पर फिर भी तुझ -सा कुशल चितेरा ना हूं......
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .......

बात भी होती बेबाकी से...
छोड़ता ना कोई कोर-कसर मशवरे में ......
समझते सब हैं ...पर दिल रखने को...
मेरी भी कमी को करते जानबूझकर करते अनदेखा भी.....
मैं भी अनजान - सा....अनभिज्ञ -सा बना हूं.....
सच में तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .....

दे रहा मात मैं हर परिस्थिति को....
पर ठहर - सा गया हूं तुझ बिन मैं ....
क्या कहूं नित होता द्वन्द मेरे अन्तर्मन में .....
तुझ बिन अधूरा- सा हूं मै.....

बात दिल की उकेर रहा मैं .....
साथ निभा रही कलमें मेरा.....
तेरे बिन दिल का एक कोना खाली-सा है....
कर लेता हूं अंधियारे में कुछ गुपचुप बातें तुझसे....
सच कहूं...तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं .....

कुछ आधा - आधा...पूरा हूं मैं ....
तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं ....अधूरा -सा हूं मैं ......

#  डॉ नीलम गुप्ता 'नीरा"

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

दो बूँद

बहुत दिनों बाद

आज सोचा कुछ लिखूँ....
बाहर सर्द हवा ...
धुंध... 
धूप का कहीं नामोनिशान नहीं...

फिर भी...
अलसायी सी उठी...
कड़क अदरक इलायची
और कालीमिर्च लौंग डालकर बनाई मसाला चाय
और बैठ गयी कुर्सी पर...
आहिस्ता से चाय की चुस्की ली... 

बस फिर क्या....
मन को पँख लग गए ...
 उड़ चला बेलगाम सा...
उम्र के उस नादान मोड़ पर
जहाँ
खुद की सोच से समझदार सोच कोई नही होती ....
बेताज बादशाह सा....
.
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कलम और पेन मेरे हाथ में...
.
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कुछ कोरे पन्ने बेतरतीब से मेज पर...
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 खोई हुई खोजती सी आँखे..…
.
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.
आँखों के कोर नम हुए 
और
दो बूँद पानी टपका 
आँखों से ...
उस कोरे कागज पर...
बस
लिख दी अपनी  
पूरी दास्ताँ....
अनकही कहानी के रूप में...
उन दो बूँदों ने...
.
.
.
और मैं...
वहीं की वहीं
बैठी...
तय कर आई एक लम्बा सफर...
ठंडी होती हुई...
मसाला चाय के साथ...
.
.
.
सच कहूँ...
वही सब मसाला चाय
पर..
अब "वो" स्वाद कहाँ....
मसाला चाय में...
शायद वक्त के साथ 
मसाला बेरंग और 
बेस्वाद हो गया...

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

निःशब्द

नि: शब्द से ....
बैठे वो दोनों .....
एक दूसरे के सामने ....
निःशब्द
पलकें उठी...
नजरें मिली .....
और
 बात हो गयी ....
शिकवा भी था....
शिकायत भी थी....
मान भी था....
मनुहार भी था....
हौले से....
थरथराये लव...
पर निःशब्द 
और.....
बात हो गयी .....
नि:शब्द से...

#  नीलम. " नीरा "

बुधवार, 19 जनवरी 2022

मैं और तुम

कहानी 
मैं और तुम की

एक अनजान सा ...मैं
अनायास  टकरा गया ...तुम से

बस यूँ ही 
सफर जारी रहा
कुछ सामान्य सी 
हल्की मुलाकात

समय बीता
 मुलाकात गहरी हुई
 मैं और तुम  कुछ करीब आये

बस वक्त ने करवट बदली
कुछ फिजा में खुमारी ,
कुछ हंसी लम्हे.... कुछ पल
बस 
पंख लग गए सपनों को

और
मैं और तुम 
हम बन गए
उड़ने लगा वक्त 
परियो के देश 
आसमाँ  मौसम दिन रात 
सब मचलने लगे...
आगोश में आने को....

वक्त बीता
मौसम बदले 
सावन आया ,बसन्त आया 
उमस और तपाने वाली गर्मी 
फिर सर्द हवाएं  
और हर तरफ जमने लगा हिम

एक अन्तराल  

 मौसम दर मौसम बदलते गए
कौन रोक पाए है बदलते मौसम को
खुलने लगे बाहुपाश में बंधे बन्धन 
सिमट गया आसमान ,सारा जहाँ
और
बिखर गया हम 
वक्त ने फिर से  अपना रंग बदला 
रंगीन तस्वीर के रंग फीके पड़ने लगे 
बन्धन को बंधना खलने लगा 
सारे सपने सपने से हो गए ....

इसको
वक्त कहूँ या मौसम 
आहिस्ता से 
"हम "
फिर से 
"मैं" और  "तुम"  हो गया
एक रास्ते में फिर से 
एक मोड़ आ गया 
राहें एक से दो हो गयीं.....
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

रविवार, 16 जनवरी 2022

प्रेम

प्रेम

प्रेम ...क्या है...?? केवल शव्द..? केवल भाव...? या फिर... एहसास...? 

सच कहूँ तो...प्रेम ना तो कोई शब्द है... ना भाव है... और ना ही कोई एहसास है... कि मन में उठा और लिख कर व्यक्त कर दो....!!

प्रेम एक शब्द नहीं मन के वो अव्यक्त से व्यक्त भाव है ...जिनको लिखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है... मतलब प्रेम को शब्दों की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता ...सच बात तो ये है  छोटा सा प्रेम शब्द अपने  अंदर इतने गहन भावों को समेटे हुए है जो बयां की परिधि से कोसो दूर है...
और फिर जो प्रेम परिभाषित हो जाये वो प्रेम कहाँ....कहाँ चलते हैं प्रेम में दायरे , सीमाएं , नियम और कायदे  ...प्रेम तो उन्मुक्त है बाबरा है दीवानगी है  ...!!

मानती हूँ कभी जरूरत पड़ती है  प्रेम को शब्दों की ...पर रूहानी पर हमेशा से अव्यक्त ही रह है... वो तो मूक है...फिर चाहे किसी से भी हो .. चाहे पशु पक्षी हों या मनुष्य..
प्रेम की मौन भाषा सभी को समझ आती है.. जिसने समझ लिया उसका जीवन प्रफुल्लता से परिपूर्ण हो गया... उसका रोम रोम सन्त हो जाता है जब प्रेम अनन्त हो जाता है 💐

शनिवार, 8 जनवरी 2022

स्त्री

सुनो.स्त्री
मानता हूँ       मैं ..
कि तुमसे कम हूँ 
शायद कमतर भी हूँ..   पर ...
ये कोई मेरी कमजोरी नहीं...
ये तो रिश्तों को खुद से ज्यादा 
सम्भालने की मेरी कोशिश है...




सुनो ….स्त्री
ये भी मानता हूँ       मैं..
कि तुम्हारे जितना
नाजुक कोमल और स्नेहिल नहीं हूँ 
और शायद बन भी ना पाऊँ
पर ये भी मेरी कोई कमजोरी नहीं
ये तो रिश्तों को सम्भल बन
एक मजबूत नीव  बनाने की मेरी
पुरजोर कोशिश है...

सुनो.... स्त्री
मैं ये भी मानता हूँ....
जब भी मैं टूटता हूँ बिखरता हूँ
मुझे भी जरूरत होती है...
स्नेहिल सहारे की...
जो निःस्वार्थ लगा ले सीने से
एक माँ की तरह , बहन की तरह,
प्रेमिका की तरह भर ले अपने आगोश में...
जिससे मैं फिर नए जोश से
खड़ा हो सकूँ सम्भल बनने के लिए...

सुनो..…स्त्री
तुम हर तरह से आँकना मेरे वजूद को
पर ...
कभी सवाल ना खड़े करना मेरे 
पुरुषार्थ पर...मेरे पौरूष पर
कभी तुम ये दम्भ ना भरना
कि तुम सर्वस्व हो और 
मैं तिनका भी नहीं...
मेरे अस्तित्व का कुछ अस्तित्व ही नहीं...
क्योंकि..
सुनो ....स्त्री
चिन्दी सा ही वजूद है मेरा चाहे तेरी जिन्दगी में
पर ये मत भूल कि मेरे बिना तू पूरी भी नहीं है...


डॉ नीलम गुप्ता