शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

राही

राही 

राही 
राह पर चलते एक राही से पूछा मैने..
क्यों चलते हो इस कंकरीले रास्ते पर
निरे कांटों से अटा पड़ा है ये रास्ता
हर तरफ़ विरानगी छाई हुई है...
दूर तलक कोई मंजिल भी दिखाई देती नहीं...
वो मुसाफिर कुछ ठिठका...मुस्कुराया 
एक उड़ती सी नजर मुझ पर डाली
और सहज हो बोला...
माना कि ...तुम सही हो
पर ये तो बतलाओ...जरा सी ठोकर से
मंजिल की इन बाधाओं से...
 घबराकर
क्यों बदलूं पथ अपना...
मै ना चलूंगा तो कोई तो चलेगा
कोई तो करेगा ...एक नई पहल 
जो मिटा कर राह की वधाओ को
करेगा पथ प्रस्स्त ..
फिर मै क्यों  नहीं....??
चुभेंगे नहीं कंकर पत्थर तो ..
आगे बड़ने  की   ललक कैसे जागे..
मिल गई जो मंजिल सहज 
फिर वो मंजिल क्या....?
वो राह ही क्या ...जो नीरस हो
कुछ कह पाती मै....
उससे पहले वो ... राही 
 यूं बोल  फिर चल दिया ...
अपनी मंजिल की ओर....
और.... मै
देखती रही ...उसे अपनी घुन में जाते हुए
एकटक.....

# Dr Neelam Gupta "नीरा"


मंगलवार, 20 सितंबर 2022

एक कप चाय

आज सुबह सुबह 
चाय का प्याला लेकर बालकनी में आई
 भोर वेला ....... सुहाना मौसम ...
एक आध पंछी चहक रहे थे ...
अब बची ही कहां है जगह उनके 
 नीड़ बनाने के लिए .... 
पेड़ तो बस नाम के ही रह गए हैं....
हर तरफ तो बहुमंजिल इमारतें....
आज गर्मी से कुछ राहत थी ....
कुछ कल  की बारिश की हल्की फुहार का असर था ....
और कुछ आज भी घटा सी थी...
कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था....
 और मै....मौसम का आनंद लेते हुए...
बालकनी में खड़ी देख रही थी ....आने जाने वालों को...
 वो शायद वक्त को मात देकर आगे जाना चाहते थे....
    पर मै... 
  हाथ में चाय का प्याला थामे वहीं की वहीं...
 मेरा मन  ऐसे में कहां रुकता...
उसे तो बस  हल्की सी आहट चाहिए....
  और ...
आंखें चुप चाप वहीं से लम्बा सफर तय कर लेती हैं....
             ....................

     चारों तरफ  हरी घास कुछ बड़े पेड़... रंगीन फूल
लगता था सबके जीवन में रंग भर देंगे....
     वहीं पर  तुम संग जीए वो पल
 बेतुकी सी बातें ... बिना बात हंसना... दीन दुनिया से बेखबर

सारी रस्मों तो ताक पर रख...अपनी एक अलग दुनिया....
      कभी नोक - झोंक तो कभी मान मनुहार...तेरा मेरा नहीं बस हमारा संसार....
       सब कुछ पॉपकॉर्न और सौंधी आंच पर भुने भुट्टे में ही पूरा हो जाता था....
  बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी अपनी...
जहां भविष्य  से कोई वास्ता नहीं...बस जो है वो आज ही है....
       पर वक्त के पंख होते हैं तब सुना था.... फिर देखा भी...
      सपनों की दीवार शायद वक्त से कुछ कच्ची थी...
 हल्की सी ठसक लगी और ढह गई... 
 फैली हुई बाहों को यूं इंतजार का ढाढस दे चले गए... 
    आंखों के सपने नमी में धुंधले हो गए....
  तब जाना कसमें वादे तो बने ही होते हैं ...टूटने के लिए
 आंखों का सारा काजल बह गया...
तब तो अपने ही हाथ पराए से हो गए....काजल की रेखा को साफ करने की हिम्मत ना जुटा पाए....
   पर वक्त कब किसका हुआ है....
सच वक्त के पंख होते हैं....

     ........................
 
       तभी अंदर से आवाज आई...
अरे भई आज कहां हो.....
  मै बालकनी में खड़े खड़े ही लौट आई... गालों पर लुढ़क आई बूंदों को फटाफट साफ किया 
कहीं इतने बरसों बाद चोरी ना पकड़ी जाए...
  सच यादें तो राख में दबी चिंगारी सी होती हैं...
जो कभी बुझती नहीं ...सुलगती रहती है धीरे धीरे...
  अच्छा अब ठंडी हुई चाय का प्याला मेज पर रख....
लगती हूं सुबह के कामों में....
मिलती हूं फिर....एक प्याला गरम चाय के साथ...

#  नीलम गुप्ता  "नीरा"

इक पाती तेरे नाम

आज वर्षों बाद ...
मै फिर से लिखने बैठी "इक पाती तेरे नाम"
 वो तेरी यादें...
 वो तेरी बातें 
 वो सुनहरी धूप 
 वो शीतल छांव 
 वो मंद बयार 
वो उन्मुक्त हंसी
वो  नीला आसमान
कुछ भी तो नहीं बदला....
..............

सब कुछ आज फिर से  जीवंत सा हो उठा....
एक अंतराल बाद जब तुम मिले 
तब समझ आया कि ...
वो ख्वाब जो बचपन में सखी सहेलियों संग साझा किए थे....
कि....
 आएगा सफेद घोड़े में एक राजकुमार
 मेरे सपनों को जो देगा नई उड़ान 
 कराएगा मुझे वो सैर परियों के देश की
वो तुम हो...
...............

सच में.... 
 वो राजकुमार तो किस्से कहानियों का था...
पर हकीकत में ....
स्नेह, सम्मान ,परवाह और  अनकहे मनोभावों को जो पढ़े
 वही तो राजकुमार है....सफेद घोड़े वाला 
.............

सुनो ...
मन करता है अब ....
फिर से लौट जाऊं ... उन हंसी पलों में....
फिर से अठखेलियां करूं....
 झूमूं खुले आसमान तले....

.............

तुम संग फिर से....
ख्याबों में फिर से रंग भरने लगी मैं....
जीने लगी उन लम्हों को  एक बार फिर से....
बस....
लापरवाह सी मैं....
सपनों के पन्नों में ख्यावों की स्याही से ....
लिखने बैठी ....आज फिर से..
"इक पाती तेरे नाम "

Dr नीलम गुप्ता। " नीरा "


चाय

उम्र के हर मोड़ पर एक चाय ही तो है
जो रंग भर देती है जिन्दगी में....
चाय फीकी हो या मीठी क्या फर्क पड़ता है
पर इसकी हर एक चुस्की जिन्दगी में मिठास भर देती है...
ये वो सांवली सलोनी चाय ही तो है..
जो यादों से चेहरे गुलाबी कर देती है...
सुबह की हो या शाम की चाय....
दोस्ती का हर जज्बा हर वक्त सलामत जो रखती है
वो चाय ही तो है....


ललना

एक नारी, स्त्री, ललना.... ना जाने कितने ही नामों से जाने जानी वाली एक औरत का जब नाम आता है ...... तब एक खाका उभर कर सामने आता है.... दुबली पतली मांग को चटख सिन्दूर से सजाए , माथे पर लाल बिंदी लगाए , होठों पर मधुर मुस्कान लिए , कजरारी आंखों वाली  , कानों को बालियों से सजाए ,  बालों को करीने से बांधे  और एक लापरवाह सी लट गालों को चूमती , गले में  मंगल सूत्र डाल कर इतराती .... ... ओर.....पैरो पर पायल - बिछुए  और महावर से स्वयं को  संवारती ...  करीने से बंधी साड़ी में खुद को समेटे हुए.... यही तो है वो   
 स्त्री.... 
               यही स्त्री जो सबकी आकर्षण का केंद्र है.... रूक जाती हैं  चलते चलते निगाहें उसके  उभारों पर... यही नहीं निगाह रखी जाती है उसके एक एक पल पर.... उसका उठना बैठना सभी तो दायरे तय कर दिए जाते हैं....जैसे कोई ठेकेदार हो उसका...
      पर क्या सोचा है कभी... उसमें भी जान है एक दिल है जो धड़कता है...कुछ भावनाएं हैं, अहसास है ,उसका भी वजूद है....  शायद नहीं ना...अगर सोचा होता तो वो यूं मजबूर ना होती निगाहें झुका कर चलने को....
      सच तो ये है ...कोई ये भी नहीं सोचता कि ये वही नारी है..... जो ना जाने अपने अंदर कितनी वेदना , दर्द और मान - अपमान , तिरस्कार का अथाह समुंदर समेटे हुए है अपने अंदर.... कितनी की अपनी इच्छाओं का गला घोटाती है ....परिवार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए.... हर रोज सौ दफा मरती है...एक परिवार को बचाने के लिए... हजार बार वो चुप होती है दूसरों को बोलने का मौका देने के लिए ... कभी स्वयं चुप होती है तो ....कभी जबरन चुप कराई जाती है...वो चीत्कार नहीं करती बस पी लेती है विष का घूंट मीरा की तरह.... वो  सींचती है रिश्तों को अपने आंख के पानी से... तभी तो वो बनती है त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति....
            ये स्त्री ही है..... जहां जाती है वहां महका देती है घर आंगन .... ईट मिट्टी गारे जैसी  बेजान चीजों में जान डाल देती है..... ईट मिट्टी गारे से बने मकान को अपने शुभ कदम रखते ही घर और अपनी तपस्या से घर को मन्दिर बना देती है .... जिसके चहकने से  किलकारी गूंजती हैं घर में....
      सच में स्त्री तुम इस धरा का मान हो 💕

# नीलम "नीरा"