न आशायें खत्म हुई हैं,न आसमॉ खत्म हुआ है
न घोड़े मरे हैं,न मैदान खत्म हुए हैं
न दोस्त कम हुए हैं,न दुसमन खत्म हुए हैं
वक्त बदल गया है,
और मेरे लिए दुवायें खत्म हुईं/
रिस्ते बिखर रहे हैं,सपने टूट रहे हैं
दुसमनों से गिला नहीं,अब दोस्त छूट ऱहे हैं
दीवारों के सहारे,दीवारों पे मूत रहें हैं
कदम लड़-खड़ाये तो,अपने छूट रहे हैं
कारवाँ गुजर रहा है,हम पीछे छूट रहे हैं/
कारवाँ गुजर जायेगा,हम खुद को सम्भालेगें
सांसो मे फिर से तूफान भरेगें ,
सपनों को बटोरेगें,इक नई जान भरेगें
हाँ आज मौसम खराब है ,
परिंदे हैं फिर से उड़ान भरेगें/////
(राजन विघार्थी
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