सुनो.....
तुम हमेशा कहते हो कि
मै अक्सर चुप ही रहती हूं...
पर ऐसा नहीं है....
मै....
बोलती तो सबसे हूँ
पर तुमसे नही बोलती
क्योंकि तुम पढ़ लेते हो
मेरी कही अनकही बातें
और
मुझे
मेरी आंखों को
मेरे मौन को...
तुम...समझ जाते हो
उस खामोशी को..
जिन्हें मैं..
नहीं बांध सकती शब्दों में...
यही तो वो बात है
जो लाती है
मुझे
तुम्हारे और करीब
और पाना चाहती हूं
सनिंध्य तुम्हरा ....
मेरी चुप्पी को तुम पिरो देते हो
अपने शब्दों की माला में
कर देते हो साकार मेरे
हर अनकहे भावों को
और आनंदित हो उठती हूँ मै
ये सोचकर
कि
तुम अकेले ऐसे हो मेरी दुनिया मे
जो जानते हो
मेरी अनकही भी....