काली-काली घटा छाई
रात बढ. आई झुक-झुक कर
एक पृकाश का दीपक उसमें
उजियारा करता है रूक-रूककर
रात-रात भर रूककर चंदा
दुनिया में उजेला करता है
रात-रात भर रूककर चंदा
कितनी मेहनत करता है
न ठण्डी न गर्मी से डरता
इनकी वह परवाह न करके
नित-नित आगे बढ़ता है
ठिठुर-ठिठुर कर आकाश में
चंदा सुखद चाँदनी करता है
रात-रात भर रूककर
कितनी मेहनत करता है/
(राजन विघार्थी)

Written-12/02/2007
रात बढ. आई झुक-झुक कर
एक पृकाश का दीपक उसमें
उजियारा करता है रूक-रूककर
रात-रात भर रूककर चंदा
दुनिया में उजेला करता है
रात-रात भर रूककर चंदा
कितनी मेहनत करता है
न ठण्डी न गर्मी से डरता
इनकी वह परवाह न करके
नित-नित आगे बढ़ता है
ठिठुर-ठिठुर कर आकाश में
चंदा सुखद चाँदनी करता है
रात-रात भर रूककर
कितनी मेहनत करता है/
(राजन विघार्थी)

Written-12/02/2007
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