चूड़ियां
वाह वो भी क्या दिन थे...क्या आपने देखा है ये सब ..अपनी माँ दादी ,नानी को ऐसे मनिहारिन से चूड़ी पहनते हुए...मैंने तो पहनी ही हैं.... बचपन में..
इससे एक वाकया याद आया नैनीताल से कुछ दूरी पर है एक जगह रामगढ़ ...हम लोग तल्ला रामगढ़ में रहते थे तब वो इतना विकसित नहीं था आज तो सारी सुविधाएं हैं वहाँ....
रामगढ़ के विषय में अगर वहाँ के फलों का जिक्र नहीं किया तो ये नाइंसाफी होगी...फलों के मामले में रामगढ़ को हम कुमाऊँ का कश्मीर कह सकते हैं ...सेब तो इतने तरह का कि हम सोच नहीं सकते...सेव ,आड़ू ,खुबानी, पुलम (आलू बुखारा) नाशपाती, काफल ... और भी बहुत से फल कोई सोच भी नही सकता कि कितनी वैरायटी ...
हाँ तो मैं चूड़ियों की बात कर रही थी तो ज्यादा विकसित ना होने के कारण बस जरूरी रोजमर्रा के समान ही मिल पाता था...वहीं पर कभी 15 दिन में कभी 1 महीने में रहमान चाचा आते थे चूड़ियाँ पहनाने... और जब भी आते सारी महिलाएं उनसे चूड़ियाँ जरूर पहनती ...तब में 5 साल की रही होंगी ..बस मेरा काम था रहमान चाचा के बगल में बैठना और उनसे बातें करना....और चाचा अपने काम के साथ साथ मेरी बातों का जबाब भी देते ... और जाते समय चाचा मुझे बोलते मुन्नी ला चूड़ियाँ पहना दूँ... मैं मना भी करती तब भिवो मुझे दोनों हाथों में हाथ भर चूड़ियाँ पहना जाते....मम्मी के लाख पैसे देने पर भी ...मेरी मुन्नी है कहकर इनकार कर देते...
फिर हम लोग नैनीताल शिफ्ट हो गए तो बहुत सालों बाद जब मैं कॉलेज में आ गयी तब फिर रहमान चाचा मिले ...मुझे तो देखते ही पहचान गए वोले मुन्नी इतनी बड़ी हो गयी ...ला हाथ कर चूड़ी पहना दूँ.... मैं झेंप कर बोली चाचा अब कॉलेज जाने लगी हूँ वहाँ चूड़ियाँ नही पहनते...फिर कुछ देर मुझे देखते रहे ...फिर जैसे कुछ समझ आया हो ..बोले चल आ ये कड़ा पहना दूँ... और मेरा हाथ खिंचकर कड़ा पहना ही दिया...
पता नहीं क्या रिश्ता था मेरा उनसे....अब तो वो रहे ही नहीं होंगे....पर जब भी मैं कांच की चूड़ियाँ देखती हूँ... इतने सालों बाद भी चाचा का चेहरा याद आ जाता है... पतले दुबले छोटे से एक गठरी लिए और एक बॉक्स लिए वो रहमान चाचा और मैं उनकी मुन्नी....
पर मैं आज भी उनको बहुत miss करती हूँ... तभी तो चूड़ियों की बात आई और में अपने को रोक ना पाई...
सच कुछ लोग जिन्दगी का इतना अहम हिस्सा बन जाते हैं कि जब भी याद करो तब ही आँखों के कोर नम हो जाते हैं.... रहमान चाचा के साथ मेरी अमिट यादें💐
सच कहूं तो चूड़ियों को खनक में अलग ही किस्म का संगीत है जो हमारे संस्कार और हमारे सुहाग का प्रतीक है... और हमारे भारतीयता का गौरव भी.... पर आज की युवा पीढ़ी चकाचौंध की दुनिया में इस अलबेली खनक से दूर होती जा रही है....