शनिवार, 16 मई 2020

कब शाकार बनूँ-राजन विघार्थी

मैं हवा में उड़ता एक पतिंगा हूँ
पता नहीं कब
चिड़ियों का शिकार बनूं
पता नहीं कब
बच्चे  बांध लें मुझको डोरी पर
कब उनके खेलों का संसार बनूं
पता नहीं कब
मिल जाये मौका फिरने को दिया के चारो ओर
पता नहीं कब
मै अपनी ही मिटती दुनिया का अंगीकार बनूं
पता नहीं कब
ले जायें चींटी मेरे पंखो को अपने महलों पर
पता नहीं कब
बहा दे मुझको खुदा ही अपनी लहरों पर
एक पंख रह जाये गांवो पर ,एक पंख मिले शहरों पर
पता नहीं कब
मिल जाये दीपक,कब अग्नि का आहार बनूं
आज तो एक मिथ्या हूँ
पता नहीं कब शाकार बनूं///////
दिल की बात बाइ राजन विघार्थी
Written---16/11/13

कोई टिप्पणी नहीं: