बुधवार, 12 अगस्त 2020

नज़र ankur

उसके चले जाने के बाद 
जिंदगी की हर बात सुलझ गई 
उसने सामने आकर नक़ाब  क्या हटाया
 जिंदगी फिर से उलझ गई ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
        अंकुर गुप्ता

सोमवार, 3 अगस्त 2020

निन्दा

" निन्दा "...एक ऐसा शब्द ..जिसे सुनकर ... मन को विचलित करने वाला भाव मन में  आता है...
परन्तु अगर हम स्वयं किसी की निन्दा करें तो आनन्द भी बहुत आता है...ये दोनों ही बातें  अलग हैं ....परन्तु ये एक स्वभाविक प्रक्रिया है....
परन्तु अगर हम दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो... निन्दा  के भाव ही बदल जायेंगे ...हमारी विचारधारा का रूख ही बदल जायेगा ....
बस सोचने की बात सिर्फ इतनी है...कि कोई भी हमारी निन्दा क्यों  करता है....कुछ तो विशेष है ना....हम में ....उससे
तभी तो वो अपने अमूल्य समय में हमारे बारे में सोच रहा है...कहीं ना कहीं हम उसके दिल दिमाग में  समाये हुए हैं ..दूसरी बात...किसी ना किसी मामले में अवश्य ही  हम उससे क्षेष्ठ हैं ....तभी तो उस पर हमारा कब्जा है...
फिर नाराजगी कैसी ....हम भी खुश रहें ...वो भी खुश रहे....बस जरा सी सोच बदली ...मायने बदल गये....
( एक बार सोच कर तो देखिए )

# नीलम " नीरा "

शनिवार, 1 अगस्त 2020

उपेक्षा -सुभद्रा कुमारी चौहान

इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥

 विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
 निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥

 मेरी साँसों की लू से,
कुछ आँच न उनमें आए।
 मेरे अंतर की ज्वाला,
उनको न कभी झुलसाए॥

 कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने,
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥

 इस भांति उपेक्षा मेरी,
करके मेरी अवहेला,
तुमने आशा की कलियाँ
 मसलीं खिलने की बेला॥

कलह-कारण -सुभद्रा कुमारी चौहान

कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
 पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥
 तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने।
 पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी॥

 उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया।
 मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं॥
 कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में सोच हो आया।
 वही कुछ बोल दें पहले, प्रतीक्षा में रुकी थी मैं॥

 अचानक ध्यान पूजा का हुआ, झट आँख जो खोली।
 नहीं देखा उन्हें, बस सामने सूनी कुटी दीखी॥
 हृदयधन चल दिए, मैं लाज से उनसे नहीं बोली।
 गया सर्वस्व, अपने आपको दूनी लुटी दीखी॥

इसका रोना -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।
 मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है॥
 सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे।
 बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे॥1॥

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो।
 यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो॥
 कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है।
 छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है॥2॥

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है।
 पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है॥
 जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है।
 छूटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है॥3॥

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है।
 जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है॥
 मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में।
 जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में॥4॥

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ।
 वह मेरी प्यारी बिटिया है, मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ॥
 तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान।
 जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान॥5॥

चलते समय -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा...’ कहते रुकती है जबान,
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!

सेवा करना था, जहाँ मुझे
 कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
 उन कृपा-कटाक्षों का बदला,
बलि होकर जहाँ चुकाना था॥

 मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
 वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना॥

चिंता -सुभद्रा कुमारी चौहान

लगे आने, हृदय धन से
 कहा मैंने कि मत आओ।
 कहीं हो प्रेम में पागल
 न पथ में ही मचल जाओ॥

 कठिन है मार्ग, मुझको
 मंजिलें वे पार करनीं हैं।
 उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें
 शायद फिसल जाओ॥

 तुम्हें कुछ चोट आ जाए
 कहीं लाचार लौटूँ मैं।
 हठीले प्यार से व्रत-भंग
 की घड़ियाँ निकट लाओ॥

जीवन-फूल-सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरे भोले मूर्ख हृदय ने
 कभी न इस पर किया विचार।
 विधि ने लिखी भाल पर मेरे
 सुख की घड़ियाँ दो ही चार॥

 छलती रही सदा ही
 मृगतृष्णा सी आशा मतवाली।
 सदा लुभाया जीवन साकी ने
 दिखला रीती प्याली॥

 मेरी कलित कामनाओं की
 ललित लालसाओं की धूल।
 आँखों के आगे उड़-उड़ करती है
 व्यथित हृदय में शूल॥

 उन चरणों की भक्ति-भावना
 मेरे लिए हुई अपराध।
 कभी न पूरी हुई अभागे
 जीवन की भोली सी साध॥

 मेरी एक-एक अभिलाषा
 का कैसा ह्रास हुआ।
 मेरे प्रखर पवित्र प्रेम का
 किस प्रकार उपहास हुआ॥

 मुझे न दुख है
 जो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।
 निठुर निराशा के झोंकों को
 मनमानी कर जाने दो॥

 हे विधि इतनी दया दिखाना
 मेरी इच्छा के अनुकूल।
 उनके ही चरणों पर
 बिखरा देना मेरा जीवन-फूल॥

खिलौनेवाला -सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
 खिलौनेवाला फिर से आया है।
 कई तरह के सुंदर-सुंदर
 नए खिलौने लाया है।

 हरा-हरा तोता पिंजड़े में,
गेंद एक पैसे वाली,
छोटी सी मोटर गाड़ी है,
सर-सर-सर चलने वाली।

 सीटी भी है कई तरह की,
कई तरह के सुंदर खेल,
चाभी भर देने से भक-भक,
करती चलने वाली रेल।

 गुड़िया भी है बहुत भली-सी,
पहने कानों में बाली,
छोटा-सा 'टी सेट' है,
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

 छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं,
हैं छोटी-छोटी तलवार,
नए खिलौने ले लो भैया,
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

 मुन्‍नू ने गुड़िया ले ली है,
मोहन ने मोटर गाड़ी
 मचल-मचल सरला करती है,
माँ ने लेने को साड़ी,

तुम -सुभद्रा कुमारी चौहान

जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो,
है जीवन में जीवन।
 कोई नहीं छीन सकता
 तुमको मुझसे मेरे धन॥

 आओ मेरे हृदय-कुंज में
 निर्भय करो विहार।
 सदा बंद रखूँगी
 मैं अपने अंतर का द्वार॥

 नहीं लांछना की लपटें
 प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं।
 पीड़ित करने तुम्हें
 वेदनाएं न वहाँ आएँगीं॥

 अपने उच्छ्वासों से मिश्रित
 कर आँसू की बूँद।
 शीतल कर दूँगी तुम प्रियतम
 सोना आँखें मूँद॥

 जगने पर पीना छक-छककर
 मेरी मदिरा की प्याली।
 एक बूँद भी शेष
 न रहने देना करना ख़ाली॥

 नशा उतर जाए फिर भी
 बाकी रह जाए खुमारी।
 रह जाए लाली आँखों में
 स्मृतियाँ प्यारी-प्यारी॥

अनोखा दान -सुभद्रा कुमारी चौहान

अपने बिखरे भावों का मैं,
गूँथ अटपटा सा यह हार।
 चली चढ़ाने उन चरणों पर,
अपने हिय का संचित प्यार॥

 डर था कहीं उपस्थिति मेरी,
उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य।
 नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा,
मेरे इन भावों का मूल्य?

संकोचों में डूबी मैं जब,
पहुँची उनके आँगन में।
 कहीं उपेक्षा करें न मेरी,
अकुलाई सी थी मन में।

 किंतु अरे यह क्या,
इतना आदर, इतनी करुणा, सम्मान?
प्रथम दृष्टि में ही दे डाला,
तुमने मुझे अहो मतिमान!

मैं अपने झीने आँचल में,
इस अपार करुणा का भार।
 कैसे भला सँभाल सकूँगी,
उनका वह स्नेह अपार।

 लख महानता उनकी पल-पल,
देख रही हूँ अपनी ओर।
 मेरे लिए बहुत थी केवल,
उनकी तो करुणा की को

झाँसी की रानी की समाधि पर-सुभद्रा कुमारी चौहान

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

ठुकरा दो या प्यार करो -सुभद्रा कुमारी चौहान

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
 सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

 धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
 मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

 मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
 फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

 धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं
 हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

 कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
 मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

 नहीं दान है, नहीं दक्षिणा ख़ाली हाथ चली आयी
 पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

 पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
 दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

 मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
 जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ

 चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
 यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

झिलमिल तारे -सुभद्रा कुमारी चौहान

कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
 झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम
 चमक रहे मन मारे।।

 अपलक आँखों से कह दो
 किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी
 मुक्तावलि वारा करते?

करते हो अमिट प्रतीक्षा,
तुम कभी न विचलित होते।
 नीरव रजनी अंचल में
 तुम कभी न छिप कर सोते।।

 जब निशा प्रिया से मिलने,
दिनकर निवेश में जाते।
 नभ के सूने आँगन में
 तुम धीरे-धीरे आते।।

 विधुरा से कह दो मन की,
लज्जा की जाली खोलो।
 क्या तुम भी विरह विकल हो,
हे तारे कुछ तो बोलो।

 मैं भी वियोगिनी मुझसे
 फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को
 हे झिलमिल-झिलमिल तारे!

परिचय -सुभद्रा कुमारी चौहान

क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं
 ललित-कलित कविताएं।
 चाहो तो चित्रित कर दूँ
 जीवन की करुण कथाएं॥

 सूना कवि-हृदय पड़ा है,
इसमें साहित्य नहीं है।
 इस लुटे हुए जीवन में,
अब तो लालित्य नहीं है॥

 मेरे प्राणों का सौदा,
करती अंतर की ज्वाला।
 बेसुध-सी करती जाती,
क्षण-क्षण वियोग की हाला॥

 नीरस-सा होता जाता,
जाने क्यों मेरा जीवन।
 भूली-भूली सी फिरती,
लेकर यह खोया-सा मन॥

 कैसे जीवन की प्याली टूटी,
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
 मेरा मतवाला साकी??

सुध में मेरे आते ही
 मेरा छिप गया सुनहला सपना।
 खो गया कहाँ पर जाने?
जीवन का वैभव अपना॥

 क्यों कहते हो लिखने को,
पढ़ लो आँखों में सहृदय।
 मेरी सब मौन व्यथाएं,
मेरी पीड़ा का परिचय॥

पानी और धूप-सुभद्रा कुमारी चौहान

अभी अभी थी धूप, बरसने
 लगा कहाँ से यह पानी
 किसने फोड़ घड़े बादल के
 की है इतनी शैतानी।

 सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया
 अपने घर का दरवाजा़
 उसकी माँ ने भी क्‍या उसको
 बुला लिया कहकर आजा।

 ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं
 बादल हैं किसके काका
 किसको डाँट रहे हैं, किसने
 कहना नहीं सुना माँ का।

 बिजली के आँगन में अम्‍माँ
 चलती है कितनी तलवार
 कैसी चमक रही है फिर भी
 क्‍यों ख़ाली जाते हैं वार।

 क्‍या अब तक तलवार चलाना
 माँ वे सीख नहीं पाए
 इसीलिए क्‍या आज सीखने
 आसमान पर हैं आए।

 एक बार भी माँ यदि मुझको
 बिजली के घर जाने दो
 उसके बच्‍चों को तलवार
 चलाना सिखला आने दो।

 खुश होकर तब बिजली देगी
 मुझे चमकती सी तलवार
 तब माँ कर न कोई सकेगा
 अपने ऊपर अत्‍याचार।

 पुलिसमैन अपने काका को
 फिर न पकड़ने आएँगे
 देखेंगे तलवार दूर से ही
 वे सब डर जाएँगे।

 अगर चाहती हो माँ काका
 जाएँ अब न जेलखाना
 तो फिर बिजली के घर मुझको
 तुम जल्‍दी से पहुँचाना।

 काका जेल न जाएँगे अब
 तूझे मँगा दूँगी तलवार
 पर बिजली के घर जाने का
 अब मत करना कभी विचार।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो-सुभद्रा कुमारी चौहान

विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
 अरे न पूछो, कह न सकूँगी,
तुमसे मैं अपनी बीती॥

 नहीं मानते हो तो जा
 उन मुकुलित कलियों से पूछो।
 अथवा विरह विकल घायल सी
 भ्रमरावलियों से पूछो॥

 जो माली के निठुर करों से
 असमय में दी गईं मरोड़।
 जिनका जर्जर हृदय विकल है,
प्रेमी मधुप-वृंद को छोड़॥

 सिंधु-प्रेयसी सरिता से तुम
 जाके पूछो मेरा हाल।
 जिसे मिलन-पथ पर रोका हो,
कहीं किसी ने बाधा डाल॥

नीम-सुभद्रा कुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
 तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥
 ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं।
 निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥
 हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
 उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥
 नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
 कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली॥
 तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
 तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी॥
 है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा।
 ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा॥
 तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा॥
 तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै।
 इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै॥
 प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो।
 जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो॥
 तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
 निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो॥

प्रथम दर्शन-सुभद्रा कुमारी चौहान

प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
 बिना परिचय के एकाएक
 हृदय में उलझन पड़ ही गई॥

 मूँदने पर भी दोनों नेत्र,
खड़े दिखते सम्मुख साकार।
 पुतलियों में उनकी छवि श्याम
 मोहिनी, जीवित जड़ ही गई॥

 भूल जाने को उनकी याद,
किए कितने ही तो उपचार।
 किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति
 छाप-सी दिल पर पड़ ही गई॥

प्रभु तुम मेरे मन की जानो -सुभद्रा कुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
 प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
 यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

 इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
 तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
 तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
 जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

 मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
 और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥
 मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
 मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

 तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
 बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

 कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
 दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥
 मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
 यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

 यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
 यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥
 ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

 मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
 जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥
 वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
 और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

 तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
 छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥

प्रतीक्षा-सुभद्रा कुमारी चौहान

बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
 नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
 उनमें जाने कितनी ही
 अभिलाषाओं के पल्लव पाल॥

 बिता दिए मैंने कितने ही
 व्याकुल दिन, अकुलाई रात।
 नीरस नैन हुए कब करके
 उमड़े आँसू की बरसात॥

 मैं सुदूर पथ के कलरव में,
सुन लेने को प्रिय की बात।
 फिरती विकल बावली-सी
 सहती अपवादों के आघात॥

 किंतु न देखा उन्हें अभी तक
 इन ललचाई आँखों ने।
 संकोचों में लुटा दिया
 सब कुछ, सकुचाई आँखों ने॥

 अब मोती के जाल बिछाकर,
गिनतीं हैं नभ के तारे।
 इनकी प्यास बुझाने को सखि!
आएंगे क्या फिर प्यारे?

प्रियतम से -सुभद्रा कुमारी चौहान

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
 अब रूखा व्यवहार न हो।
 अजी, बोल तो लिया करो तुम
 चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

 जरा जरा सी बातों पर
 मत रूठो मेरे अभिमानी।
 लो प्रसन्न हो जाओ
 ग़लती मैंने अपनी सब मानी॥

 मैं भूलों की भरी पिटारी
 और दया के तुम आगार।
 सदा दिखाई दो तुम हँसते
 चाहे मुझ से करो न प्यार॥

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

उल्लास-सुभद्रा कुमारी चौहान

शैशव के सुन्दर प्रभात का
 मैंने नव विकास देखा।
 यौवन की मादक लाली में
 जीवन का हुलास देखा।।

 जग-झंझा-झकोर में
 आशा-लतिका का विलास देखा।
 आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
 क्रम-क्रम से प्रकाश देखा।।

 जीवन में न निराशा मुझको
 कभी रुलाने को आयी।
 जग झूठा है यह विरक्ति भी
 नहीं सिखाने को आयी।।

 अरिदल की पहिचान कराने
 नहीं घृणा आने पायी।
 नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
 भीषणता लाने पायी।।

आराधना -सुभद्रा कुमारी चौहान

जब मैं आँगन में पहुँची,
पूजा का थाल सजाए।
 शिव जी की तरह दिखे वे,
बैठे थे ध्यान लगाए॥

 जिन चरणों के पूजन को, 
यह हृदय विकल हो जाता।
 मैं समझ न पाई, वह भी, 
है किसका ध्यान लगाता?

मैं सन्मुख ही जा बैठी,
कुछ चिंतित सी घबराई।
 यह किसके आराधक हैं,
मन में व्याकुलता छाई॥

 मैं इन्हें पूजती निशि-दिन,
ये किसका ध्यान लगाते?
हे विधि! कैसी छलना है,
हैं कैसे दृश्य दिखाते??

टूटी समाधि इतने ही में,
नेत्र उन्होंने खोले।
 लख मुझे सामने हँस कर
 मीठे स्वर में वे बोले॥

 फल गई साधना मेरी,
तुम आईं आज यहाँ पर।
 उनकी मंजुल-छाया में
 भ्रम रहता भला कहाँ पर॥

 अपनी भूलों पर मन यह
 जाने कितना पछताया।
 संकोच सहित चरणों पर,
जो कुछ था वही चढ़ाया॥

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कोयल -सुभद्रा कुमारी चौहान

देखो कोयल काली है पर, 
मीठी है इसकी बोली,
इसने ही तो कूक कूक कर,
आमों में मिश्री घोली।

 कोयल कोयल सच बतलाना,
क्या संदेसा लायी हो?
बहुत दिनों के बाद आज फिर,
इस डाली पर आई हो।

 क्या गाती हो किसे बुलाती?
बतला दो कोयल रानी,
प्यासी धरती देख मांगती,
हो क्या मेघों से पानी?

कोयल यह मिठास क्या तुमने,
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी,
बोली यह सिखलायी है?

डाल डाल पर उड़ना गाना,
जिसने तुम्हें सिखाया है,
सबसे मीठे मीठे बोलो,
यह भी तुम्हें बताया है।

 बहुत भली हो तुमने माँ की,
बात सदा ही है मानी,
इसीलिये तो तुम कहलाती,
हो सब चिड़ियों की रानी।
               सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरा नया बचपन-सुभद्रा कुमारी चौहान

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
 गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

 चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
 कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

 किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
 किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

 रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
 बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

 मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
 झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

 दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
 धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

 वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
 लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

 लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
 तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

 दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
 मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

 मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
 अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

 सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
 प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

 माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
 आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

 किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
 चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

 आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
 व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

 वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
 क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
 नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
 कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

 पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
 मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

 मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
 उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

 मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
 मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

 जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
 भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥
सुभद्रा कुमारी चौहान 

झांसी की रानी-सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

 चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

 वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

 निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

 अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

 रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

 बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
 'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

 हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

 लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

 ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

 अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

 पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

 घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

 तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सुभद्रा कुमारी चौहान 

मापदण्ड बदलो-दुष्यंत कुमार

मेरी प्रगति या अगति का
 यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
 मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
 मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
 नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

 अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
 मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
 एक बार और
 शक्ति आज़माने को
 धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
 मचल रही होंगी ।
 एक और अवसर की प्रतीक्षा में
 मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।

 ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
 ये मुझको उकसाते हैं ।
 पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
 मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
 मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
 क़सम देती हैं ।

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये-दुष्यंत कुमार

अब अंतर में अवसाद नहीं 
 चापल्य नहीं उन्माद नहीं 
 सूना-सूना सा जीवन है 
 कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं 

 तव स्वागत हित हिलता रहता 
 अंतरवीणा का तार प्रिये ..

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी 
 आशाएं मुझसे छूट चुकी 
 सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ 
 मेरे हाथों से टूट चुकी 

 खो बैठा अपने हाथों ही 
 मैं अपना कोष अपार प्रिये 
 फिर कर लेने दो प्यार प्रिये ..

आज सडकों पर-दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

 एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

 अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

 वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

 ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

 राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

आग जलती रहे-दुष्यंत कुमार

एक तीखी आँच ने
 इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
 हाथों से गुजरता कल छुआ
 हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
 जो मुझे छूने चली
 हर उस हवा का आँचल छुआ
... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता
 आग के संपर्क से
 दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
 मैं उबलता रहा पानी-सा
 परे हर तर्क से
 एक चौथाई उमर
 यों खौलते बीती बिना अवकाश
 सुख कहाँ
 यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
 छानता आकाश
 आह! कैसा कठिन
... कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
 आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
 ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
 जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

चीथड़े में हिन्दुस्तान- दुष्यंत कुमार

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

 ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

 एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। 

 मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

 इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
 जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

 कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।

 मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

मत कहो आकाश में कोहरा घना है-दुष्यंत कुमार

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

 सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,
क्या कारोगे सूर्य का क्या देखना है।

 हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।

 दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे- दुष्यंत कुमार

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
 इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

 हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
 हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

 थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
 तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

 उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
 वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

 फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
 अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

 रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
 आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

 मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
 हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगेहम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
 इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे

 हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
 अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे

अब तो पथ यही है- दुष्यंत कुमार

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए, 
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है| 

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |

हो गई है पीर पर्वत-दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
 इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
 शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

 हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
 हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

 सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
 मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

 मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
 हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

गुरुवार, 25 जून 2020

पड़ोसी से / अटल बिहारी वाजपेयी

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है ।
औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?

अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं / अटल बिहारी वाजपेयी

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता,
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता।
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा।
शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा।
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास

जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी



जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें।
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें।
याद करें काला पानी को,
अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते,
सावरकर से बलिदानी को।
याद करें बहरे शासन को,
बम से थर्राते आसन को,
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू
के आत्मोत्सर्ग पावन को।
अन्यायी से लड़े,
दया की मत फरियाद करें।
उनकी याद करें।
बलिदानों की बेला आई,
लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा
जिससे कीमत गई चुकाई
मुक्ति माँगती शक्ति संगठित,
युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित,
कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी
मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत।
अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में
क्यों अवसाद करें?
उनकी याद करें

राह कौन सी जाऊँ मैं? / अटल बिहारी वाजपेयी

चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं 

दो अनुभूतियाँ -अटल बिहारी वाजपेयी

पहली अनुभूति:
गीत नहीं गाता हूँ

 बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं 
 टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ
 लगी कुछ ऐसी नज़र
 बिखरा शीशे सा शहर

 अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ

 पीठ मे छुरी सा चांद
 राहू गया रेखा फांद
 मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
 गीत नहीं गाता हूँ

 दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ

 टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
 पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
 झरे सब पीले पात
 कोयल की कुहुक रात

 प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
 गीत नया गाता हूँ

 टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
 अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
 हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
 गीत नया गाता हूँ

हरी हरी दूब पर-अटल बिहारी वाजपेयी

हरी हरी दूब पर 
 ओस की बूंदे 
 अभी थी, 
अभी नहीं हैं| 
ऐसी खुशियाँ 
 जो हमेशा हमारा साथ दें 
 कभी नहीं थी, 
कहीं नहीं हैं| 

क्काँयर की कोख से 
 फूटा बाल सूर्य, 
जब पूरब की गोद में 
 पाँव फैलाने लगा, 
तो मेरी बगीची का 
 पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, 
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ 
 या उसके ताप से भाप बनी, 
ओस की बुँदों को ढूंढूँ? 

कौरव कौन, कौन पांडव -अटल बिहारी वाजपेयी

कौरव कौन
 कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
 का फैला
 कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
 जुए की लत है|
हर पंचायत में
 पांचाली
 अपमानित है|
बिना कृष्ण के
 आज
 महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

दूध में दरार पड़ गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
 बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई।

 खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
 सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
 वसंत से बहार झड़ गई
 दूध में दरार पड़ गई।

 अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
 बात बनाएँ, बिगड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई

क्षमा याचना-अटल बिहारी वाजपेयी

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

 जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
 चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे

अंतरद्वंद्व -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?
 
वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?

जीवन की ढलने लगी साँझ -अटल बिहारी वाजपेयी

जीवन की ढलने लगी सांझ
 उमर घट गई
 डगर कट गई
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

 बदले हैं अर्थ
 शब्द हुए व्यर्थ
 शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

 सपनों में मीत
 बिखरा संगीत
 ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

मौत से ठन गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई! 
मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था, 
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

 मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

 मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, 
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? 

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, 
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। 

 मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, 
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। 

 बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, 
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। 

 प्यार इतना परायों से मुझको मिला, 
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। 

 हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, 
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। 

 आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, 
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। 

 पार पाने का क़ायम मगर हौसला, 
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। 

 मौत से ठन गई

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ -अटल बिहारी वाजपेयी

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 सवेरा है मगर पूरब दिशा में 
 घिर रहे बादल 
 रूई से धुंधलके में 
 मील के पत्थर पड़े घायल 
 ठिठके पाँव 
 ओझल गाँव 
 जड़ता है न गतिमयता 

 स्वयं को दूसरों की दृष्टि से 
 मैं देख पाता हूं 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 समय की सदर साँसों ने 
 चिनारों को झुलस डाला, 
मगर हिमपात को देती 
 चुनौती एक दुर्ममाला, 

बिखरे नीड़, 
विहँसे चीड़, 
आँसू हैं न मुस्कानें, 
हिमानी झील के तट पर 
 अकेला गुनगुनाता हूँ। 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

एक बरस बीत गया -अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया 
 
झुलसाता जेठ मास 
 शरद चांदनी उदास 
 सिसकी भरते सावन का 
 अंतर्घट रीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
सीकचों मे सिमटा जग 
 किंतु विकल प्राण विहग 
 धरती से अम्बर तक 
 गूंज मुक्ति गीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
पथ निहारते नयन 
 गिनते दिन पल छिन 
 लौट कभी आएगा 
 मन का जो मीत गया 
 एक बरस बीत गया

अपने ही मन से कुछ बोलें -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या खोया, क्या पाया जग में
 मिलते और बिछुड़ते मग में
 मुझे किसी से नहीं शिकायत
 यद्यपि छला गया पग-पग में
 एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
 जीवन एक अनन्त कहानी
 पर तन की अपनी सीमाएँ
 यद्यपि सौ शरदों की वाणी
 इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
 जीवन बंजारों का डेरा
 आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
 कौन जानता किधर सवेरा
 अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

झुक नहीं सकते -अटल बिहारी वाजपेयी

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

 सत्य का संघर्ष सत्ता से
 न्याय लड़ता निरंकुशता से
 अंधेरे ने दी चुनौती है
 किरण अंतिम अस्त होती है

 दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
 वज्र टूटे या उठे भूकंप
 यह बराबर का नहीं है युद्ध
 हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
 हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
 और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

 किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
 अंगद ने बढ़ाया चरण
 प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
 समर्पण की माँग अस्वीकार

 दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
 टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

ऊँचाई -अटल बिहारी वाजपेयी

ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है। 

जमती है सिर्फ बर्फ, 
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 
मौत की तरह ठंडी होती है। 
खेलती, खिलखिलाती नदी, 
जिसका रूप धारण कर, 
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 

 ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 
 पानी को पत्थर कर दे, 
ऐसी ऊँचाई 
 जिसका दरस हीन भाव भर दे, 
अभिनंदन की अधिकारी है, 
आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, 

किन्तु कोई गौरैया, 
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, 
ना कोई थका-मांदा बटोही, 
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 

 सच्चाई यह है कि 
 केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, 
सबसे अलग-थलग, 
परिवेश से पृथक, 
अपनों से कटा-बँटा, 
शून्य में अकेला खड़ा होना, 
पहाड़ की महानता नहीं, 
मजबूरी है। 
 ऊँचाई और गहराई में 
 आकाश-पाताल की दूरी है। 

जो जितना ऊँचा, 

पुनः चमकेगा दिनकर -अटल बिहारी वाजपेयी

आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
 न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
 पुनः चमकेगा दिनकर।

क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी

बाधाएँ आती हैं आएँ
 घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

आओ फिर से दिया जलाएँ -अटल बिहारी वाजपेयी

आओ फिर से दिया जलाएँ
 भरी दुपहरी में अंधियारा
 सूरज परछाई से हारा
 अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ

 हम पड़ाव को समझे मंज़िल
 लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
 वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ।

 आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
 अपनों के विघ्नों ने घेरा
 अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
 आओ फिर से दिया जलाएँ

सोमवार, 25 मई 2020

क्या पूजन-महादेवी वर्मा

क्या पूजन,
क्या पूजन क्या अर्चन रे!

उस असीम का सुंदर मंदिर,
मेरा लघुतम जीवन रे,
मेरी श्वासें करती रहतीं,
नित प्रिय का अभिनंदन रे!

पद रज को धोने उमड़े,
आते लोचन में जल कण रे,
अक्षत पुलकित रोम मधुर,
मेरी पीड़ा का चंदन रे!

स्नेह भरा जलता है झिलमिल,
मेरा यह दीपक मन रे,
मेरे दृग के तारक में,
नव उत्पल का उन्मीलन रे!

                            महादेवी वर्मा 

धूप बने उड़ते जाते हैं, 
प्रतिपल मेरे स्पंदन रे,
प्रिय प्रिय जपते अधर ताल,
देता पलकों का नर्तन रे! 

क्यों इन तारों को उलझाते?-महादेवी वर्मा

क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों,
आ आ कर फिर जाते?

पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर,
क्या यह अस्फुट गाते?

लय में मेरा चिर करुणा-धन,
कम्पन में सपनों का स्पन्दन,
गीतों में भर चिर सुख, चिर दुख,
कण कण में बिखराते!

मेरे शैशव के मधु में घुल,
मेरे यौवन के मद में ढुल,
मेरे आँसू स्मित में हिल मिल,
मेरे क्यों न कहाते? 

                        महादेवी वर्मा 
                                 

मैं अनंत पथ में लिखती जो -महादेवी वर्मा

मै अनंत पथ में लिखती जो
 सस्मित सपनों की बाते
 उनको कभी न धो पायेंगी
 अपने आँसू से रातें!

उड़् उड़ कर जो धूल करेगी
 मेघों का नभ में अभिषेक
 अमिट रहेगी उसके अंचल-
में मेरी पीड़ा की रेख!

तारों में प्रतिबिम्बित हो
 मुस्कायेंगी अनंत आँखें,
हो कर सीमाहीन, शून्य में
 मँडरायेगी अभिलाषें!

वीणा होगी मूक बजाने-
वाला होगा अंतर्धान,
विस्मृति के चरणों पर आ कर
 लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!

जब असीम से हो जायेगा
 मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता
 खेलेगी मिटने का खेल! 
        महादेवी वर्मा 

जाग तुझको दूर जाना l-महादेवी वर्मा

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
 जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफ़ान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया!
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियां बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना! 

             महादेवी वर्मा 

अलि! मैं कण-कण को जान चली -महादेवी वर्मा

अलि, मैं कण-कण को जान चली,
सबका क्रन्दन पहचान चली।

 जो दृग में हीरक-जल भरते,
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनको से,
जो सुखे अधरों पर झरते।

 जिस मुक्ताहल में मेघ भरे,
जो तारो के तृण में उतरे,
मै नभ के रज के रस-विष के,
आँसू के सब रँग जान चली।

 जिसका मीठा-तीखा दंश न,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता,
जर्जर मानस, चिर आहत मन।

 जो मृदु फूलो के स्पन्दन से,
जो पैना एकाकीपन से,
मै उपवन निर्जन पथ के हर,
कंटक का मृदु मन जान चली।

 गति का दे चिर वरदान चली,
जो जल में विद्युत-प्यास भरा,
जो आतप मे जल-जल निखरा,

              महादेवी वर्मा 

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!
नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,
प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में,
प्रलय में मेरा पता पदचिन्‍ह जीवन में,
शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में
 कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ,
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ,
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,
दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के,
शून्य हूँ जिसके बिछे हैं पाँवड़े पलके,
पुलक हूँ जो पला है कठिन प्रस्तर में,
हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में,
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी
 त्याग का दिन भी चरम आसिक्त का तम भी,
तार भी आघात भी झंकार की गति भी,
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी,
अधर भी हूँ और स्‍िमत की चांदनी भी हूँ 
 
                महादेवी वर्मा 

जब यह दीप थके -महादेवी वर्मा

जब यह दीप थके तब आना।

 यह चंचल सपने भोले हैं,
दृग-जल पर पाले मैने, मृदु
 पलकों पर तोले हैं;
दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!

साधें करुणा - अंक ढली है,
सान्ध्य गगन - सी रंगमयी पर
 पावस की सजला बदली है;
विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!

यह उड़ते क्षण पुलक - भरे है,
सुधि से सुरभित स्नेह - धुले,
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;
दे तारो के प्राण इन्हीं से सूने श्वास बसाना!

यह स्पन्दन हैं अंक - व्यथा के
 चिर उज्ज्वल अक्षर जीवन की
 बिखरी विस्मृत क्षार - कथा के;
कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख - लिख अजर बनाना!

लौ ने वर्ती को जाना है
 वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने
 रज का अंचल पहचाना है;
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना! 

              महादेवी वर्मा 

कहाँ रहेगी चिड़िया-महादेवी वर्मा

कहाँ रहेगी चिड़िया?
आंधी आई जोर-शोर से,
डाली टूटी है झकोर से,
उड़ा घोंसला बेचारी का,
किससे अपनी बात कहेगी?
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ?
कैसे यह घोंसला बनाएँ?
कैसे फूटे अंडे जोड़ें?
किससे यह सब बात कहेगी,
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ? 

महादेवी वर्मा 

मैं प्रिय पहचानी नहीं-महादेवी वर्मा

पथ देख बिता दी रैन
 मैं प्रिय पहचानी नहीं !

तम ने धोया नभ-पंथ
 सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप
 जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात: बुझा गया कौन
 अपरिचित, जानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

धर कनक-थाल में मेघ
 सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
 विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात:-
सुनायी कहानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

नव इन्द्रधनुष सा चीर
 महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
 -नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
 मैं बेसुध मानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

इन श्वासों का इतिहास
 आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक
 लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
 नयन से पानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

          महादेवी वर्मा 

क्या जलने की रीत-महादेवी वर्मा

क्या जलने की रीति, 
शलभ समझा, दीपक जाना।

 घेरे हैं बंदी दीपक को,
ज्वाला की बेला,
दीन शलभ भी दीपशिखा से,
सिर धुन धुन खेला।

 इसको क्षण संताप, 
भोर उसको भी बुझ जाना।

 इसके झुलसे पंख धूम की,
उसके रेख रही,
इसमें वह उन्माद, न उसमें
 ज्वाला शेष रही।

 जग इसको चिर तृप्त कहे, 
या समझे पछताना।

 प्रिय मेरा चिर दीप जिसे छू,
जल उठता जीवन,
दीपक का आलोक, शलभ
 का भी इसमें क्रंदन।

 युग युग जल निष्कंप, 
इसे जलने का वर पाना।

 धूम कहाँ विद्युत लहरों से,
हैं नि:श्वास भरा,
झंझा की कंपन देती,
चिर जागृति का पहरा।
 जाना उज्ज्वल प्रात: 

 महादेवी वर्मा 

मैं बनी मधुमास आली!-महादेवी वर्मा

मैं बनी मधुमास आली!

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चाँदनी
 उमड़ आई री, दृगों में
 सजनि, कालिन्दी निराली!

रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
 वात मलय-निकुंज-वाली!

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
 मुरलिका मधुराग वाली? 

मिटने का अधिकार-महादेवी वर्मा

वे मुस्काते फूल, नहीं
 जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
 जिनको भाता है बुझ जाना

 वे सूने से नयन, नहीं
 जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज, नही
 जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती

 वे नीलम के मेघ, नहीं
 जिनको है घुल जाने की चाह
 वह अनन्त ऋतुराज, नहीं
 जिसने देखी जाने की राह

 ऐसा तेरा लोक, वेदना
 नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
 जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा
 तेरी करुणा का उपहार
 रहने दो हे देव! अरे
 यह मेरे मिटने का अधिकार! 
           महादेवी वर्मा 

मेरा सजल मुख देख लेते!-महादेवी वर्मा

मेरा सजल 
 मुख देख लेते!
यह करुण 
 मुख देख लेते!

सेतु शूलों का बना बाँधा विरह-बारिश का जल
 फूल की पलकें बनाकर प्यालियाँ बाँटा हलाहल!

दुखमय सुख
 सुख भरा दुःख
 कौन लेता पूछ, जो तुम,
ज्वाल-जल का देश देते!

नयन की नीलम-तुला पर मोतियों से प्यार तोला,

कर रहा व्यापार कब से मृत्यु से यह प्राण भोला!

भ्रान्तिमय कण
 श्रान्तिमय क्षण-
थे मुझे वरदान, जो तुम
 माँग ममता शेष लेते!

पद चले, जीवन चला, पलकें चली, स्पन्दन रही चल
 किन्तु चलता जा रहा मेरा क्षितिज भी दूर धूमिल ।

 अंग अलसित
 प्राण विजड़ित
 मानती जय, जो तुम्हीं
 हँस हार आज अनेक देते!

घुल गई इन आँसुओं में देव जाने कौन हाला,
झूमता है विश्व पी-पी घूमती नक्षत्र-माला;

साध है तुम
 बन सघन तुम
 सुरँग अवगुण्ठन उठा,
गिन आँसुओं की रख लेते!

शिथिल चरणों के थकित इन नूपुरों की करुण रुनझुन
 विरह की इतिहास कहती, जो कभी पाते सुभग सुन;

चपल पद धर
 आ अचल उर!
वार देते मुक्ति, खो
 निर्वाण का सन्देश देते! 

कौन तुम मेरे हृदय में -महादेवी वर्मा

कौन मेरी कसक में नित,
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में,
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा,
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण नि:श्वास मेरे,
कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिह्न किसके,
लौटते यह श्वास फिर फिर!

कौन बन्दी कर मुझे अब,
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित,
एक लघु क्षण दे रहा,
निर्वाण के वरदान शत शत!

पा लिया मैंने किसे इस,
वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

गूँजता उर में न जाने
 दूर के संगीत सा क्या?
आज खो निज को मुझे
          महादेवी वर्मा 

दीपक पर पतंग-महादेवी वर्मा

दीपक में पतंग जलता क्यों?
प्रिय की आभा में जीता फिर
 दूरी का अभिनय करता क्यों
 पागल रे पतंग जलता क्यों

 उजियाला जिसका दीपक है
 मुझमें भी है वह चिनगारी
 अपनी ज्वाला देख अन्य की
 ज्वाला पर इतनी ममता क्यों

 गिरता कब दीपक दीपक में
 तारक में तारक कब घुलता
 तेरा ही उन्माद शिखा में
 जलता है फिर आकुलता क्यों

 पाता जड़ जीवन जीवन से
 तम दिन में मिल दिन हो जाता
 पर जीवन के आभा के कण
 एक सदा भ्रम मे फिरता क्यों

 जो तू जलने को पागल हो
 आँसू का जल स्नेह बनेगा
 धूमहीन निस्पंद जगत में
 जल-बुझ, यह क्रंदन करता 
दीपक में पतंग जलता क्यों?
          
                महादेवी वर्मा

  

जाग-जाग सुकेशिनी री!-महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch
जाग-जाग सुकेशिनी री!

अनिल ने आ मृदुल हौले
 शिथिल वेणी-बन्धन खोले
 पर न तेरे पलक डोले
 बिखरती अलकें, झरे जाते
 सुमन, वरवेशिनी री!

छाँह में अस्तित्व खोये
 अश्रु से सब रंग धोये
 मन्दप्रभ दीपक सँजोये,
पंथ किसका देखती तू अलस
 स्वप्न - निमेषिनी री?
Mahadevi Verma | Modern Meera of India | Prakhar Jeevan
रजत - तारों घटा बुन बुन
 गगन के चिर दाग़ गिन-गिन
 श्रान्त जग के श्वास चुन-चुन
 सो गई क्या नींद की अज्ञात-
पथ निर्देशिनी री?
Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch

दिवस की पदचाप चंचल
 श्रान्ति में सुधि-सी मधुर चल
 आ रही है निकट प्रतिपल,
निमिष में होगा अरुण-जग
 ओ विराग-निवेशिनी री?

रूप-रेखा - उलझनों में
 कठिन सीमा - बन्धनों में
 जग बँधा निष्ठुर क्षणों में
 अश्रुमय कोमल कहाँ तू
 आ गई परदेशिनी री?
महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi ...

         महादेवी वर्मा