रविवार, 20 नवंबर 2022

कर्म फल



 आज दिनभर के काम निबटा कर सोचा कुछ पल आराम करूं ... जैसे ही हल्की सी आंख लगी ही थी कि...बाहर से कुछ आवाजें आ रही थी जोर जोर से...पहले तो इग्नोर किया और करवट बदल कर फिर से सोने का प्रयास करने लगी परंतु  आवाजें और भी तेज होने लगी.... मैं बेमन से उठकर बाहर गई ...तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गईं...नींद तो जैसे  पता नहीं कहां चली गई....
        मेरे घर के सामने वाले घर से लगे हुए घर पर एक ट्रक खड़ा था .. उस पर पटक पटक कर समान रखा जा रहा था .... वहीं पर आंटी खड़ी अपने आंचल से मुंह ढके रो रही थी और अंकल जी भी चुपचाप नम आंखों से ये नजारा देख रहे थे....
       बात को समझते मुझे वक्त नहीं लगा....वही किस्से घर घर के...वही कहानी ....रोज पुरानी होती नई सी....
        पर मैं सोचने पर विवश हो गई कि ....आखिर दोष किसका है...माता पिता का या फिर बच्चों का... क्यों हम अपने बच्चों को जरूर से ज्यादा सुविधा देते हैं...हमारी परवरिश में पैसे की बू क्यों आती है...क्यों नहीं हम बच्चों को ये सिखाते कि... सीमित संसाधनों  में कैसे जीते हैं....शायद उस वक्त हमें अपने कमाए पैसे और अपने रुतबे का घमंड होता है... हम आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं...आगे कुछ भी नहीं सोचते कि...इसके परिणाम क्या होंगे...
     आज उन्हीं सब का नतीजा अंकल और आंटी जी भुगत रहे हैं....अंकल जी कस्टम विभाग में आफिसर की पोस्ट पर कार्यरत थे  घर और ऑफिस दोनों जगह रुतबा था कमाई भी अंधाधुंध थी...आंटी भी बड़ी अफसरी में रहती...दो बेटे थे... पूरी कालोनी में सबसे पहले उन बच्चों के पास ही कोई भी नई चीज आती...पहले खिलौने फिर साइकिल और फिर बाइक... 
मेरा तो आंटी जी से केवल नमस्ते तक ही सीमित था ... पर कालोनी में बातें तो आ ही जाती हैं घूम फिर कर...
      ऐसे ही एक दिन सुना अंकल जी के बेटे कॉलेज जाने वाले हैं तो अंकल जी ने उन्हें गाड़ी दिलवा दी...
       बस इसी तरह वक्त बीतता गया .... दोनों बेटों को जॉब लगी..... आलीशान शादियां हुई .. आधुनिक बहुएं आईं...अंकल जी ने एक मकान और बनाया पुणे में ... उस मकान में बड़े बहू और बेटे रहने लगे... फिर अंकल जी रिटायर हो गए और अपने छोटे बेटे के पास लखनऊ में ही रहने लगे....
       सब कुछ सामान्य सा चल रहा था...अंकल आंटी कभी कभार पुणे चले जाते ... पर धीरे धीरे उनका पुणे जाना भी कम और फिर बंद ही हो गया...
           अंकल आंटी अब दिनभर घर पर ही रहते.. आंटी तो घर के कामों में और बच्चों को संभालने में व्यस्त रहती और अंकल जी बाहर के कामों में और छोटी  बहू किट्टी पार्टी और पार्लर में.... 
  एक दो दिन  से अड़ोस पडौस से कुछ सुबुगाहट तो थी ... पर मैने ध्यान नहीं दिया और आज इतना सब कुछ देखकर...समझ ही नहीं आया ...
    मै छत पर खड़ी ये सब देख ही रही थी कि मेरी पढ़ौसन ने बताया ....अंकल आंटी अपने गांव वाले घर जा रहे हैं....छोटी बहू ने अभी 15 दिन पहले ही जबरदस्ती ये मकान अपने नाम करा लिया ...अब उसका कहना है कि मेरे घर से जाओ...उनका बेटा मूक दर्शक बना मौन सहमति दे रहा था अपनी पत्नी को....
        वैसे तो ये कोई नया किस्सा नहीं है ...घर घर की कहानी है कहीं कम तो कहीं ज्यादा.... पर मैं सोच रही थी कि हम एक उम्र में अंधाधुंध पैसा तो कमा लेते हैं आधुनिकता की दौड़ में आंख बन्द कर भागने के लिए.... तब हम ये नहीं सोचते कि जो पैसा हम गलत तरीके से अपने परिवार को सुख सुविधा देने के लिए कमा रहे हैं..... उसमें ना जाने कितनों की बददुआ और हाय लगी है.... हम ये भूल जाते हैं कि हमारे कर्मो को..... स्वयं हमें यहीं और इसी जन्म में भुगतना पड़ता है....सारा हिसाब यहीं चुकता करना पड़ता है.... और हम भूल जाते हैं कि इसके परिणाम क्या होंगे...
        पर अंकल आंटी की दशा देख  मेरी आंखें नम थीं.... मैं सोच रही थी हम क्यों करते हैं ये सब .... क्यों अनजान बने रहते हैं जन बूझ कर.... क्यों हम संतोष नहीं कर पाते...यही सोचते सोचते दो गर्म बूंद मेरे गालों पर से गुजर गई.....
और देखते ही देखते अंकल आंटी चल दिए अपने गांव एक बार फिर से अपना घरौंदा बनाने..अब शायद  उनके पास कोई तथकथित कोई अपना नहीं होगा....बस होंगे तो एक दूसरे की लाठी बने झुर्रियों भरे  दो जोड़ी मजबूत हाथ....

Dr Neelam Gupta "नीरा"

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

l LOVE U

पापा से हमेशा कम बोलने बाली ...उनकी हर बात को आदेश समझ कर मानने वाली ...कभी कदास ही पापा के पास बैठने वाली...पर आज जब पापा के पास बैठी तो मुझे फायदा हुआ.... बातों ही  बातों में उन्होने बताया ...प्यार कैसे जताया जाता है.... बोले मेरे प्यार जताने का तरीका जुदा  है तेरी मां से.... मै I Love You नही बोलता  तेरी मां से.... जब वो पूछती है सब्जी क्या बनाऊं...तो कहना आज तुम्हारी पसंद की....कोई डोरवेल बजाए तो... झट दरवाजे पर जाकर दरवाजा खोलना...कभी बाजार से आए तो एक गिलास पानी का देना....कभी कभी एक प्याली चाय अपने हाथो से बना कर पिला देना... जब वो गुमसुम सी हो उसको हंसा देना ... और हां कभी कभी चार बातें सुना उसको छेड़ना....सामने रखी चीज को अनदेखा कर उसको पुकारना....पापा बोले जा रहे थे हर एक बात और मै सुने जा रही थी....
         तब मैंने सोचा ... सच में प्यार ऐसा होता है...क्या हम भी ऐसा ही प्यार करते हैं  ...हम भी क्या इसी प्यार को जीते हैं ....अंदर से एक आवाज  आई.... नहीं 
  हम  तो  बस वेलेंटाइन डे को ही प्यार मानकर मना लेते है प्यार को केवल I Love U में ही जी लेते हैं.. ...अब सोच लिया मैने  जिस दिन मां पापा जितना प्यार करना सीख जाऊंगी..... अपने प्यार को परवाह से जता पाऊंगी ...उसी दिन से हर रोज असली वेलेंटाइन डे  मनाऊंगी.... 💕

शनिवार, 5 नवंबर 2022

कड़वा सच

जीवन की सच्चाई 

हम जिन्दगी भर स्वयं ही परेशान रहते हैं... सच में देखा जाए तो जिंदगी बहुत सीधी सरल और सहज हैं ...लेकिन हम बिना बात जिन्दगी को इतना जटिल और भयावह बना देते हैं कि वो हमें पहाड़ सी लगने लगती है.... 
मानती हूं कुछ सपने कुछ इच्छाएं कुछ लालसाएं होती हैं एक उम्र पर  और ये भी सच है कि एक उम्र के बाद सब खत्म भी हो जाती है...पर पता नही कब एक अलग  दुनिया बना लेते हैं  और सब कुछ जानकर अनजान बने रहते हैं....
हम जिन्दगी भर बड़ा छोटा अपना पराया में उलझे रहते हैं जबकि एक वक्त पर हम सभी एक से होते हैं....बस 
मत परेशान हो, क्योंकि आमतौर पर...

 1. चालीस साल की अवस्था में "उच्च शिक्षित" और "अल्प शिक्षित" एक जैसे ही होते हैं। (क्योंकि अब कहीं इंटरव्यू नहीं देना, डिग्री नहीं दिखानी).

2. पचास साल की अवस्था में "रूप" और "कुरूप" एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते).

3. साठ साल की अवस्था में "उच्च पद" और "निम्न पद" एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है).

4. सत्तर साल की अवस्था में "बड़ा घर" और "छोटा घर" एक जैसे ही होते हैं। (बीमारियाँ और खालीपन आपको एक जगह बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, और आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं).

5. अस्सी साल की अवस्था में आपके पास धन का "कम होना" या "ज्यादा होना" एक जैसे ही होते हैं। (अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है).

6. नब्बे साल की अवस्था में "सोना" और "जागना" एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है).

जीवन को सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें.

आगे चल कर एक दिन सब की यही स्थिति होनी है, यही जीवन की सच्चाई है...

चैन से जीने के लिए चार रोटी और दो कपड़े काफ़ी हैं... पर ,बेचैनी से जीने के लिए चार गाड़ी, दो बंगले और तीन प्लॉट भी कम हैं !!

ये जीवन की  कड़वी सच्चाई है जिसने भी इसको स्वीकार कर लिया उसे परमानंद ही प्राप्ति हो जायेगी  इसलिए  चैन से रहिए खुश और मस्त रहिए....
और हां बच्चों को वक्त और संस्कार दीजिए .... यही हम सभी की जमा पूंजी है 💕

(इस पोस्ट को मैं मिश्रित पोस्ट का नाम दूंगी क्योंकि इसमें कुछ मेरा और कुछ किसी और का लिखा है फर्क क्या पड़ता है जीवन की कड़वी सच्चाई  लिखी है जिसे हम स्वीकारते ही नहीं  अंत सब का एक ही है....कितने भी ऐशो आराम में जी लो पर शमशान में सबका बिस्तर एक सा ही है )

नफा नुकसान

नफा नुकसान

रविवार का दिन था.... ऑफिस की छुट्टी थी.... फिर नवंबर में हल्की सर्दी भी होने लगी थी... मैं आराम से बिस्तर पर बैठ कर फुर्सत में अखबार पढ़ रहा था... साथ में पत्नी चाय देकर गई थी वह मैं पी रहा था..... वैसे तो फुर्सत ही कहां मिलती है.... सुबह उठो तैयार होओ... बच्चों को स्कूल छोड़ो और ऑफिस जाओ...... बच्चों का स्कूल ऑफिस के रास्ते में ही पड़ता था...... इसलिए उनको छोड़ता हुआ ऑफिस निकल जाता हूं.... यही क्रम पूरे हफ्ते चलता है..... संडे के अतिरिक्त किसी भी दिन फुर्सत नहीं मिलती इसलिए सारे  काम संडे को ही फुर्सत में होते हैं...।
      अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि.....डोर बेल बजी मैं अलसाया सा नहीं उठा ....सोचा पत्नी ही दरवाजा खोल देगी.... शायद पत्नी किसी काम में व्यस्त थी ....या फिर उसने डोरबेल नहीं सुनी .....तभी दोबारा डोर बेल बजी तो मैं अपने आप से बोला...... कौन है भाई इतनी सुबह सुबह संडे के दिन तो फुर्सत से रहने दो....।
 मैंने  अनमने मन से उठकर..... जैसे ही दरवाजा खोला.....सामने  एक स्मार्ट सा युवक खड़ा था.... मैं अभी उसे ऊपर से नीचे तक निहार ही रहा था.... तभी उसने बड़ी शालीनता भरे अंदाज से कहा.... नमस्ते अंकल जी और मेरे पैर छुए......मैंने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते बेटा कहा .....पर मैं असमंजस में था और पहचानने की कोशिश कर रहा था...... कि इतना अदबदार शालीन युवक कौन है ......मेरे दिमाग की घड़ी वक्त से भी तेज चल रही थी उस वक्त.....मैं पहचानने की कोशिश कर ही रहा था पर असफल ही रहा....
          शायद वह मेरी मन: स्थिति समझ गया था .....बोला.... अंकल जी आपने शायद मुझे पहचाना नहीं ....... मैं कुछ झेंप सा गया ......जैसे कि मेरी चोरी पकड़ी गई हो.....मैंने जल्दी से कहा पहले अंदर आओ ....तब बात करते हैं..... वह बिना कुछ बोले मेरे पीछे पीछे ड्राइंग रूम में आ गया ......मैंने बैठने का इशारा किया तो ..... वो बैठ गया..... इतने में पत्नी भी अंदर से कौन है ....??   कहते हुए आ गई ......साथ ही पानी का गिलास  भी लाई...।
      वह युवक सोफे पर बैठ गया और ड्राइंग रूम का उड़ती नजर से मुआयना करने लगा और मैं उसका......वो शायद सोच रहा हो कहां से बात शुरू करे....     मैं कुछ कहता  इससे पहले ही वो बोल पड़ा .....लगता है अंकल जी  आपने मुझे पहचाना नहीं..... मैंने कुछ झेंपते हुए कहा..... शायद उम्र हो हो चली है मेरी .....इसलिए याददाश्त साथ नहीं दे रही..... युवक सधी हुई आवाज में बोला .....मैं वही हूं..... जो अपने पापा के साथ आया था..... 5 साल पहले आपका स्कूटर लेने के लिए आया था तब हमारे पास पैसे कम थे ...लेकिन आपने अपना स्कूटर हमारी मजबूरी समझते हुए हमें ....... नुकसान में बेच दिया ......और साथ ही मिठाई और पेट्रोल के  ₹500 भी दिए..... वह युवक धाराप्रवाह बोले जा रहा था .....उस दिन बहुत दिनों बाद हमने खरीद कर मिठाई खाई थी....... मैंने तभी सोच लिया था कि कुछ बन जाने पर आप जैसे देवता आदमी से मिलने जरूर आऊंगा .....
          आपके स्कूटर ने मेरी  क्या पूरे परिवार की स्थिति ही बदल डाली ......आपको पता है..... अंकल जी वह स्कूटर आज भी मेरे घर पर है .....आपसे स्कूटर लेकर मेरा आने जाने का समय बच जाता था..... तब मैंने ट्यूशन पढ़ाने शुरू कर दीए.....जिससे पापा को कुछ मदद मिल जाए..... फिर मैंने बीटेक ऑनर्स में पास किया...... 1 साल छोटी मोटी नौकरी की साथ ही ट्यूशन भी पढ़ाता रहा .....घर की स्थिति सुधरने लगी थी..... फिर पुणे की एक कंपनी में अच्छी जॉब मिल गई ......आज जैसे ही मैं घर आया ......तो आपसे मिलने चला आया ...।   आपको कुछ देने लायक तो नहीं हूं पर आपके एहसान का बदला कभी भी नहीं चुका सकता...... मैं दिल से आपका शुक्रिया करता हूं...... सच में आपके स्कूटर ने हमारी जिंदगी बदल दी .....वह लगातार एक सुर में बोलता ही जा रहा था .....और.... मैं ....कभी पत्नी को कभी उस युवक को देख रहा था...... मेरे पास कुछ शब्द भी नहीं ही नहीं थे...... मैं सिर्फ इतना ही बोल पाया ......बेटा नफा नुकसान तो चलता ही रहता है .....उस वक्त मुझे लगा तुमको स्कूटर की ज्यादा जरूरत है...... तभी मेरी पत्नी चाय ले आई बोली...... बेटा नाश्ता करोगे ......उसने केवल चाय पी और फिर से धन्यवाद कहते हुए  मेरे और पत्नी के पैर छू कर चला गया.....।
 मैं वहीं सोफे पर धंसा रहा .....मेरे सामने आज से 5 साल पहले का  पूरा घटनाक्रम घूम गया ..... स्कूटर पुराना हो गया था..... घर में बेकार पड़ा था सो  OLX  में   30,000  पर डाल दिया ......बहुत से कॉल आए 27000 , 25000 , 24000 , 28000 के .....बस एक कॉल आया 29000 का ..... मैंने मन बना लिया कि 29000 में बेच ही दूंगा.....।
     अगले दिन सुबह एक कॉल आई....साहब आपने OLX  पर स्कूटर के लिए डाला है..... मैंने संचित सा जवाब दिया .....हां
   उधर से एक दबी सी आवाज आई साहब मैं जोड़ तोड़ कर  ₹24000  ही कर पाऊंगा  ....जो कम पड़ेंगे तो मैं कहीं से इंतजाम कर लूंगा ......अगर संभव हो तो वह स्कूटर मुझे ही देना.....  मेरे बेटे को बहुत जरूरत है .....उसका समय बच जाएगा साहब..... वह पढ़ाई में बहुत अच्छा है....।
            मुझे  लगा जैसे सच में उसको जरूरत हो .....उसकी आवाज में कुछ ऐसी मजबूरी की कसक थी कि..... लगा जैसे सच में उसको जरूरत है ....मैंने कहा...... ठीक है तुम कल आ जाओ....।
      फिर शाम को दो तीन बार उसका फिर कॉल आया साहब.... कल जरूर आऊंगा.... पैसों का इंतजाम कल तक हो ही जाएगा..... कल दूसरा शनिवार था मेरी छुट्टी भी थी ...।
         वह शायद रात को सो भी नहीं पाया होगा..... सुबह 10:00 बजे ही आ गया .....अपने बेटे के साथ ....हाथ जोड़कर खड़ा था....उसने  कहा ....साहब बड़ी मुश्किल से इंतजाम हो पाया ... और नोट मेरे हाथ में थमा दिए
फिर मुझसे बोला .....साहब गिन लीजिए ...... उनमें मुड़े पुराने ...500 के , 100  और 50  के बहुत से नोट थे...... मैं समझ गया उसने कैसे इंतजाम किया होगा ....मैंने कहा.... तुमने गिन लिए तो पूरे ही होंगे.... उसका बेटा हाथ से स्कूटर साफ कर रहा था.... उसकी आंखों में चमक थी ..... उस वक्त मुझे लगा कुछ नुकसान तो हुआ पर किसी का भला हो गया...... वास्तव में ये जरूर मंद है .....हाथ जोड़कर बार-बार धन्यवाद देते हुए .....वह जैसे ही जाने के लिए मुड़ा..... मैंने उसको आवाज दी.... और ....पांच सौ का नोट देते  हुए मैं बोला...... घर जा रहे हो तो.... बच्चों के लिए मिठाई लेते जाना और हां जरूरत पड़े तो पेट्रोल भी डलवा लेना .....मिठाई और पेट्रोल दोनों इसमें आ जाएंगे....।
             उसके जाने के बाद मैंने सोचा..... मुझे नुकसान तो ज्यादा नहीं हुआ .....पर अगर किसी का भला हो जाए तो क्या बुराई है..... मेरा स्कूटर किसी के काम आए इससे ज्यादा और क्या चाहिए .....नफा नुकसान तो चलता ही रहता है....।
          मेरी तंद्रा तब टूटी जब..... पत्नी ने आकर कहा.... देखिए 12:00 बज रहे हैं फटाफट नहा कर आइए.... मैं नाश्ता लगाती हूं .....और मैं.... पत्नी के आदेशानुसार प्रसन्न मन से नहाने चला गया....।

 # Dr नीलम गुप्ता  "नीरा"

बुधवार, 2 नवंबर 2022

मेरे सखा

आज बरसों बाद भी
तुमको पढ़ रही हूं....
सोचती हूं कभी इस तरह मिले थे हम
 शायद हर रोज ही...
 जब भी मैने पुकारा तुम हमेशा 
मेरे साथ थे....
ना वादे ना कसमें ...
पर हर रोज मेरी शिकवे शिकायतें...
तुम सुनते फिर हौले से मुस्कुराते 
जैसे मेरी सारी उलझनों को सुलझाने का 
दारोमदार तुम पर हो...
और मैं बेफिक्र सी...
 कभी मां बन जाते तो कभी पिता 
तो कभी बड़ा या छोटा भाई
तो कभी सखा तो कभी सहेली...
 और .... मैं हर मसले का हल 
तुम मै ढूढती...जैसे तुम 
कोई अलाउद्दीन का चिराग हो...
सच कहूं तो ...
तुम मेरे लिए चिराग ही तो थे...
ना कोई इजहार था ना इकरार 
ना तुम्हारी कोई चाहत थी
ना मेरी...बस एक अलबेला रिश्ता 
पर कोई तो नेह डोर से बंधे थे हम...
 तभी तो तुम ....
आज भी मेरे उतने ही करीब हो
जितने तब....
मिलने ना मिलने का सवाल ही कहां था
तुम मुझे पढ़ते गए और मैं तुमको लिखती गई...
पर आज.... बरसों बाद
हर रोज पढ़ लेती हूं तुम्हें...
और बांच लेती हूं ख्यालों में...
  तुम आज भी मेरे अलाउद्दीन के चिराग हो 
 पता नहीं क्या रिश्ता है मेरा 
तुमसे.....
प्यार इश्क मोहब्ब्त चाहत का ...
अरे नहीं...
हमारा तो रूहानी रिश्ता है...
जिसका कोई नाम नहीं ...
बेनाम सा... सबसे कोसों दूर
मेरे सखा


 # नीलम "नीरा"

प्रेम

किसी ने कहा मुझसे.....
तुम बड़ा प्रेम लिखती हो...
:
:
मैं हौले से मुस्कुराई...
फिर आहिस्ता से बोली... 
चलो तुम्हारी बात मानती हूं....
:
;
आज से क्या...
 अभी से प्रेम लिखना छोड़ती हूं....
नफरत लिखना शुरू करती हूं...
:
 इसका शुभारंभ मै...
अभी से तुमसे करती हूं...
बोलो मंजूर है...
फिर दोनो खिलखिलाए....

# नीलम "नीरा"

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

कतार



आज मेरे रिटायरमेंट को पूरे 3 साल हो गए... पता ही नहीं  चला कि.... ये वक्त कब निकल गया  ... सच ही तो है... वक्त कब और कहां ठहरा है किसी के लिए....बस मुट्ठी में बंद रेत की तरह चुपचाप फिसल जाता है...पीछे मुड़कर देखो तो ....कुछ भी हासिल नहीं होता... हथेली पर कुछ रेत के कण चिपके रहते हैं....वो भी धीरे धीरे आखिरकार गिर ही जाते हैं.....
        बस इसी उधेड़ बुन में लगा मै... बचपन में पिताजी की  हिदायतों भरे ....
और ...फिर भी दोस्तों संग मस्ती भरे और शरारतों के गलियारे से निकल ..... किशोरावस्था की सीढ़ी चढ़ने लगा ...  पढ़ने में मध्यम था फिर भी सामाजिक होने के कारण..... शिक्षको का प्रिय था ... मेरा स्वभाव हमेशा से ही संकोची और शर्मिला रहा... 
              यूं ही समय बीतता गया वक्त के साथ कदम ताल मिलाते हुए....जवानी के पायदान पर कदम रखा कालेज गया ... वहीं मित्र मंडली में मेरी एक मित्र बनी....कसमें वादे सब कुछ तो किए ....एक मुस्कान चेहरे पर ठहर गई....
                पर सच कहूं तो वादे करना बहुत आसान है ....निभाना उतना ही कठिन ...कितना ही आत्मवल चाहिए ...जिसकी शायद मुझमें कमी थी....
     पिताजी का डर ,पढ़ाई के बाद नौकरी की जद्दोजहद, मनचाही नौकरी ना मिलने के कारण..... कुंठा और भी बहुत सी बातें... उस वक्त लगा एक युवक होना कितनी जिम्मेदारियों भरा होता है....
       वक्त का सफर बदस्तूर जारी था ...वक्त बीता लम्बे इंतजार के बाद मनचाही नौकरी भी लगी पर .......कुछ बातें कहां इंतजार की मोहताज होती है...
            फिर समझो तो परिवार की जिम्मेदारियां ही सर्वोपरी होती हैं... मां पिता की उम्मीद भरी निगाहें .....
      कहां मुंह मोड़ा जाता है इन सब से... नालायक बनने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए...
           इन सब के बीच मैने स्वयं ही सरेंडर  करके ....अपने मां पिताजी के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर सौंप दी...
      करीब एक साल बाद  मां की खुशी का ठिकाना नहीं था उनकी मन पसंद बहू जो आ रही थी...
         मां  खुश थी पिताजी खुश थे .....घर में चहल-पहल और  रौनक का वातावरण ....पर मैं ज्यों का त्यों दूर होते तमाशे को मूकदर्शक बना देखता .....आखिर वह घड़ी भी आ ही गई ....मेरे सर सेहरा बंधा और ले आया मै अपने साथ  घर को लक्ष्मी बनाने वाली गृह लक्ष्मी ...…
           ढोल ,मंगल - गीत , रीति रिवाज, रस्में ,हंसी - ठिठोली सब कुछ तो था..... पर मैं फिर भी अकेला का अकेला
        शाम ढली रात हुई रस्मों की रस्म निभाने या कहूं मां की पसंद का सामना करने जा पहुंचा कमरे में हल्की सी चूड़ी खनकी ,पायल की आवाज हुई लाल जोड़े में लिपटी वो मेरी आहट से और भी सिमट गई ..... घूंघट उठाया तो मां की पसंद मेरी पसंद से बिल्कुल अलग थी ..... 
        खैर जो होना था सो तो हो ही गया .....जब सौप दी अपने सपनो की बागडोर दूसरों के हाथ तो फिर नाराजगी या गुस्से का अधिकार कहां...फिर उसका भी दोष कहां....वो भी तो मेरे साथ ही बंधी है अग्नि के इर्द गिर्द सात फेरे लेकर....
         अब तो दूसरों की खुशी के लिए सब कुछ निभाना ही था....... मैं जिम्मेदारी निभाता रहा मूकदर्शक बन.... वह हुकुम की बादशाह  बनी घर संभालती रही.... और पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालती .... 
         जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में दो नन्ही फूल सी बेटियों की किलकारी से  मेरा घर आंगन चहकने लगा 
     अब वक्त के साथ लगभग मेरे सपनों में  धुंध सी जमने लगी थी कभी-कभी धुंध  हटती भी तो परिवार और समाज की जिम्मेदारियों की चादर सब ढाप देती ......सच कहूं तो फुर्सत ही कहां मिलती है ......पीछे मुड़कर देखने की..... बेटियां चंदा सी बढ़ने लगी .....उचित घर वर देखकर उनकी पसंद से उनको भरे मन से विदा किया ......
        कब मैं समय के पायदान पर चढ़ते चढ़ते जिम्मेदारियों की गठरी लादे इतना आगे बढ़ गया कि कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं .....
            आज इतने बरसों बाद .... मै  अनमना सा पीछे मुड़कर जो देखता हूं ....मेरे चेहरे पर अनगिनत रंग आते जाते रहे... 
     आज मै बालकनी में खड़े देखता हूं ....स्कूटर ,मोटरसाइकिल पर आते जाते हुए लोगों को .....तो सोचता हूं....इतनी भगदौड़ , इतनी आपाधापी....आखिर किसलिए....जब कभी मुड़कर पीछे देखना ही नहीं.... और मै ख्यालों में खोया  सबको खड़ा कर देता हूं .....एक समय के बाद एक कतार में..... जहां आज मै स्वयं खड़ा हूं....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

हार की जीत




 
       काली अंधेरी रात .....खुला आसमान और तारे टिमटिमा रहे हैं बेफिक्र से... हर तरफ सन्नाटा.... हो भी क्यों ना ........लोग दिन भर की थकान से थक कर सो जो गए ..... भला रात के 2:00 बजे वैसे भी कौन जागता है.....।
    पर मेरी नींद मुझ से कोसों दूर ......सच कहूं तो ......अब तो रात भर जागने की एक आदत सी हो गई थी...... एक नियम सा बन गया था ......पर आज कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही थी .......
इसी कारण मैं उठकर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई....... दूर तलक फैला सन्नाटा और अंधेरा .......और ......उस स्याह अंधेरे में कुछ खोजती सी.....मेरी आंखें 
        पहुंच गई आज से 20 वर्ष पहले जब ना अंधेरा था और ना ही सन्नाटा.... हर तरफ चहकता सा मधुर संगीत था....
          तब मैं 20 वर्ष की थी... जब लाल सुर्ख रंग का लहंगा पहने , भरे हाथ चूड़ियों के ....मांग में चटक सिंदूर लगाएं.... दुल्हन बन अपने बांके सजीले सपनों के राजकुमार के साथ इस घर में आई थी..... तब गूंज रहा था पूरा घर मेरी पायल की  झंकार से .....उस वक्त मुझे खुद से ही रश्क हो रहा था .....इतना स्मार्ट गोरा और सधी हुई कद - काठी का हमसफर पाकर ....।   तब मैं ही तो थी दुनिया की सबसे भाग्यशाली  युवती ......
      सभी कुछ सामान्य से बेहतर चल रहा था ....और चाहिए भी क्या एक युवती को प्यार करने वाला  .....उसकी हर ख्वाहिश को हाथों हाथ लेने वाला पति.... दिन तो मानो पंख लगा कर उड़ रहे थे ...
       पर हम तो इंसान हैं ना..... कब तक उड़ते पंख लगा कर.... यथार्थ को तो जीना ही पड़ता है... हर वक्त एक सा नहीं रहता....परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.... कभी तो नया भी पुराना होता है.... कलई तो उतरती ही है ना.....
          सच ही तो है वक्त कहां रुकता है .....और अच्छा वक्त तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है.... शादी को यही कोई सात - आठ  महीने ही बीते होंगे ......एक दिन घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे...…बातों ही बातों में उन्होंने मेरी सुघड़ता और सुंदरता के पुल बांधने शुरू कर कर दिए .....मेरे साथी के चेहरे पर अनेकों रंग आते जाते रहे..... बात आई गई हो गई उस वक्त तो.....
       पर रात को जैसे ही सारी कलई खुल गई...... लगा जैसे किसी परी के पंख काट कर उसे जमीन पर बेरहमी से पटक दिया हो .....तभी यथार्थ से सामना हुआ दरवाजा खोला तो देखा..... नशे में धुत मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा था वमुश्किल उसे अंदर कर दरवाजा बंद किया तो .....उन्होंने गाली और न जाने क्या-क्या बोलना शुरु कर दिया ......ये सब मेरे लिए इतना अप्रत्याशित था जैसे किसी ने मेरे कानों में तो जैसे गरम शीशा उड़ेल दिया हो..... कुछ भी समझ में नहीं आया..... मैने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी..... मैं कुछ समझ पाती या कुछ बोल पाती.... उससे पहले ही एक मजबूत हाथ मेरे गाल पर पड़ा.... मैंने अपने आप को गिरते गिरते बचाया.... मैं कुछ माजरा  समझ पाती उससे पहले ही वह बिस्तर पर गिर कर सो गए .....और मैं भी पता नहीं गीली आंखों से नींद में समा गई...।
     सुबह उठी तो सब कुछ सामान्य था अपने पास बुला कर बोले..... यार कल कुछ दोस्तों के साथ ज्यादा हो गई थी और पता नहीं तुम्हें क्या - क्या बोल दिया....सच में सॉरी यार सॉरी....
     आखिर मैं तो स्त्री ही हूं भूल गई रात की बात को .....कर लिया उनकी बात पर विश्वास ....।   पर यह क्या अब तो आए दिन यह क्रम सा बन गया .....रात को नशे में धुत और सुबह माफी का नाटक ....।             शादी को भी  साल भर से ज्यादा हो गया था..... कहो तो किससे कहूं ..... मायके में बुजुर्ग मां पिताजी और भाई की अपनी  गृहस्थी ... गरम खून 
मैं चुपचाप सब सहती रही .....पर समझ ही नहीं पाती कि .....जो आदमी दिन में इतना लाड़ प्यार जताता है ....रात में हैवानियत कहां से आती है....।
     बस  इसी चक्र के चलते मैं दो बेटों की मां बन गई .....शायद इसी उम्मीद से कि कभी तो यह सुधरेंगे ही..... हो सकता है बेटों का मुंह देख कर ही यह सुधर जाए.....पर हालात और भी बदतर होते गए..... मैं स्वयं से और यथार्थ से  लड़ती रही लगता था..... जितना उजला मेरा रंग था उतनी ही काली मेरी किस्मत....।
         धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं भी मशीन सी बन गई ...। एक लगाव था.... वह भी तार-तार हो गया .....मैंने अपना समय अपने बच्चों को देना शुरू कर दिया ....।
   पर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था.... एक दिन पता चला मेरे पति की दोनों किडनी की हालत नशे के कारण बहुत खराब है .....पर आखिर पत्नी ही हूं ना ....मन से ना सही बेमन से ही उनके जीवन की दुआ मांगने लगी और उनकी जी जान से सेवा करती ......बदले में दुत्कार और गालियों के सिवा कभी कुछ नहीं मिला ....।
          पर कुदरत का लिखा कौन टाल सकता है...। एक दिन वह दोनों बच्चों को और मुझे छोड़कर चले गए....!
      मैं टूट कर पहले ही बिखर गई थी...... पर जो भी थोड़ा बहुत मेरे अंदर था..... वह भी तार-तार हो गया...... पर ऐसे कब तक चलता मुझे बच्चों के मासूम चेहरे देखकर संभलना ही था..... कब तक यूं मातम बनाए  रखती....।
      मुझे वक्त लगा कुछ महीनों का .......संभालने में खुद को..... मजबूत किया खुद को......दिन भर स्वयं को कोसते हुए मरने की बातें सोचने वाली .....मैं .......फिर से नए आत्मवल से खड़ी होने के लिए स्वयं को संभालती रही .......आखिर जीत मेरी हुई....।    
           मैंने धीरे धीरे कारोबार संभाला और बच्चों को मां पिता दोनों की तरह परवरिश की....।            आज उसी का नतीजा है कि मेरे दोनों बेटे मुकाम हासिल कर करके अपने पैरों पर खड़े हैं....।
          दुनिया , समाज और स्वयं से लड़ते हुए आखिरकार ....मैं... हार कर भी जीत गई ......इस स्याह रात में जब सारी दुनिया सो रही है..... मुझसे नींद कोसों दूर है .....मैं बालकनी में खड़ी .....आसमान में बेफिक्र से तारे को  टिमटिमाते हुए  देखकर सोचती हूं ......जहां  जंग में खुद से हार कर....!!

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

राही

राही 

राही 
राह पर चलते एक राही से पूछा मैने..
क्यों चलते हो इस कंकरीले रास्ते पर
निरे कांटों से अटा पड़ा है ये रास्ता
हर तरफ़ विरानगी छाई हुई है...
दूर तलक कोई मंजिल भी दिखाई देती नहीं...
वो मुसाफिर कुछ ठिठका...मुस्कुराया 
एक उड़ती सी नजर मुझ पर डाली
और सहज हो बोला...
माना कि ...तुम सही हो
पर ये तो बतलाओ...जरा सी ठोकर से
मंजिल की इन बाधाओं से...
 घबराकर
क्यों बदलूं पथ अपना...
मै ना चलूंगा तो कोई तो चलेगा
कोई तो करेगा ...एक नई पहल 
जो मिटा कर राह की वधाओ को
करेगा पथ प्रस्स्त ..
फिर मै क्यों  नहीं....??
चुभेंगे नहीं कंकर पत्थर तो ..
आगे बड़ने  की   ललक कैसे जागे..
मिल गई जो मंजिल सहज 
फिर वो मंजिल क्या....?
वो राह ही क्या ...जो नीरस हो
कुछ कह पाती मै....
उससे पहले वो ... राही 
 यूं बोल  फिर चल दिया ...
अपनी मंजिल की ओर....
और.... मै
देखती रही ...उसे अपनी घुन में जाते हुए
एकटक.....

# Dr Neelam Gupta "नीरा"


मंगलवार, 20 सितंबर 2022

एक कप चाय

आज सुबह सुबह 
चाय का प्याला लेकर बालकनी में आई
 भोर वेला ....... सुहाना मौसम ...
एक आध पंछी चहक रहे थे ...
अब बची ही कहां है जगह उनके 
 नीड़ बनाने के लिए .... 
पेड़ तो बस नाम के ही रह गए हैं....
हर तरफ तो बहुमंजिल इमारतें....
आज गर्मी से कुछ राहत थी ....
कुछ कल  की बारिश की हल्की फुहार का असर था ....
और कुछ आज भी घटा सी थी...
कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था....
 और मै....मौसम का आनंद लेते हुए...
बालकनी में खड़ी देख रही थी ....आने जाने वालों को...
 वो शायद वक्त को मात देकर आगे जाना चाहते थे....
    पर मै... 
  हाथ में चाय का प्याला थामे वहीं की वहीं...
 मेरा मन  ऐसे में कहां रुकता...
उसे तो बस  हल्की सी आहट चाहिए....
  और ...
आंखें चुप चाप वहीं से लम्बा सफर तय कर लेती हैं....
             ....................

     चारों तरफ  हरी घास कुछ बड़े पेड़... रंगीन फूल
लगता था सबके जीवन में रंग भर देंगे....
     वहीं पर  तुम संग जीए वो पल
 बेतुकी सी बातें ... बिना बात हंसना... दीन दुनिया से बेखबर

सारी रस्मों तो ताक पर रख...अपनी एक अलग दुनिया....
      कभी नोक - झोंक तो कभी मान मनुहार...तेरा मेरा नहीं बस हमारा संसार....
       सब कुछ पॉपकॉर्न और सौंधी आंच पर भुने भुट्टे में ही पूरा हो जाता था....
  बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी अपनी...
जहां भविष्य  से कोई वास्ता नहीं...बस जो है वो आज ही है....
       पर वक्त के पंख होते हैं तब सुना था.... फिर देखा भी...
      सपनों की दीवार शायद वक्त से कुछ कच्ची थी...
 हल्की सी ठसक लगी और ढह गई... 
 फैली हुई बाहों को यूं इंतजार का ढाढस दे चले गए... 
    आंखों के सपने नमी में धुंधले हो गए....
  तब जाना कसमें वादे तो बने ही होते हैं ...टूटने के लिए
 आंखों का सारा काजल बह गया...
तब तो अपने ही हाथ पराए से हो गए....काजल की रेखा को साफ करने की हिम्मत ना जुटा पाए....
   पर वक्त कब किसका हुआ है....
सच वक्त के पंख होते हैं....

     ........................
 
       तभी अंदर से आवाज आई...
अरे भई आज कहां हो.....
  मै बालकनी में खड़े खड़े ही लौट आई... गालों पर लुढ़क आई बूंदों को फटाफट साफ किया 
कहीं इतने बरसों बाद चोरी ना पकड़ी जाए...
  सच यादें तो राख में दबी चिंगारी सी होती हैं...
जो कभी बुझती नहीं ...सुलगती रहती है धीरे धीरे...
  अच्छा अब ठंडी हुई चाय का प्याला मेज पर रख....
लगती हूं सुबह के कामों में....
मिलती हूं फिर....एक प्याला गरम चाय के साथ...

#  नीलम गुप्ता  "नीरा"

इक पाती तेरे नाम

आज वर्षों बाद ...
मै फिर से लिखने बैठी "इक पाती तेरे नाम"
 वो तेरी यादें...
 वो तेरी बातें 
 वो सुनहरी धूप 
 वो शीतल छांव 
 वो मंद बयार 
वो उन्मुक्त हंसी
वो  नीला आसमान
कुछ भी तो नहीं बदला....
..............

सब कुछ आज फिर से  जीवंत सा हो उठा....
एक अंतराल बाद जब तुम मिले 
तब समझ आया कि ...
वो ख्वाब जो बचपन में सखी सहेलियों संग साझा किए थे....
कि....
 आएगा सफेद घोड़े में एक राजकुमार
 मेरे सपनों को जो देगा नई उड़ान 
 कराएगा मुझे वो सैर परियों के देश की
वो तुम हो...
...............

सच में.... 
 वो राजकुमार तो किस्से कहानियों का था...
पर हकीकत में ....
स्नेह, सम्मान ,परवाह और  अनकहे मनोभावों को जो पढ़े
 वही तो राजकुमार है....सफेद घोड़े वाला 
.............

सुनो ...
मन करता है अब ....
फिर से लौट जाऊं ... उन हंसी पलों में....
फिर से अठखेलियां करूं....
 झूमूं खुले आसमान तले....

.............

तुम संग फिर से....
ख्याबों में फिर से रंग भरने लगी मैं....
जीने लगी उन लम्हों को  एक बार फिर से....
बस....
लापरवाह सी मैं....
सपनों के पन्नों में ख्यावों की स्याही से ....
लिखने बैठी ....आज फिर से..
"इक पाती तेरे नाम "

Dr नीलम गुप्ता। " नीरा "


चाय

उम्र के हर मोड़ पर एक चाय ही तो है
जो रंग भर देती है जिन्दगी में....
चाय फीकी हो या मीठी क्या फर्क पड़ता है
पर इसकी हर एक चुस्की जिन्दगी में मिठास भर देती है...
ये वो सांवली सलोनी चाय ही तो है..
जो यादों से चेहरे गुलाबी कर देती है...
सुबह की हो या शाम की चाय....
दोस्ती का हर जज्बा हर वक्त सलामत जो रखती है
वो चाय ही तो है....


ललना

एक नारी, स्त्री, ललना.... ना जाने कितने ही नामों से जाने जानी वाली एक औरत का जब नाम आता है ...... तब एक खाका उभर कर सामने आता है.... दुबली पतली मांग को चटख सिन्दूर से सजाए , माथे पर लाल बिंदी लगाए , होठों पर मधुर मुस्कान लिए , कजरारी आंखों वाली  , कानों को बालियों से सजाए ,  बालों को करीने से बांधे  और एक लापरवाह सी लट गालों को चूमती , गले में  मंगल सूत्र डाल कर इतराती .... ... ओर.....पैरो पर पायल - बिछुए  और महावर से स्वयं को  संवारती ...  करीने से बंधी साड़ी में खुद को समेटे हुए.... यही तो है वो   
 स्त्री.... 
               यही स्त्री जो सबकी आकर्षण का केंद्र है.... रूक जाती हैं  चलते चलते निगाहें उसके  उभारों पर... यही नहीं निगाह रखी जाती है उसके एक एक पल पर.... उसका उठना बैठना सभी तो दायरे तय कर दिए जाते हैं....जैसे कोई ठेकेदार हो उसका...
      पर क्या सोचा है कभी... उसमें भी जान है एक दिल है जो धड़कता है...कुछ भावनाएं हैं, अहसास है ,उसका भी वजूद है....  शायद नहीं ना...अगर सोचा होता तो वो यूं मजबूर ना होती निगाहें झुका कर चलने को....
      सच तो ये है ...कोई ये भी नहीं सोचता कि ये वही नारी है..... जो ना जाने अपने अंदर कितनी वेदना , दर्द और मान - अपमान , तिरस्कार का अथाह समुंदर समेटे हुए है अपने अंदर.... कितनी की अपनी इच्छाओं का गला घोटाती है ....परिवार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए.... हर रोज सौ दफा मरती है...एक परिवार को बचाने के लिए... हजार बार वो चुप होती है दूसरों को बोलने का मौका देने के लिए ... कभी स्वयं चुप होती है तो ....कभी जबरन चुप कराई जाती है...वो चीत्कार नहीं करती बस पी लेती है विष का घूंट मीरा की तरह.... वो  सींचती है रिश्तों को अपने आंख के पानी से... तभी तो वो बनती है त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति....
            ये स्त्री ही है..... जहां जाती है वहां महका देती है घर आंगन .... ईट मिट्टी गारे जैसी  बेजान चीजों में जान डाल देती है..... ईट मिट्टी गारे से बने मकान को अपने शुभ कदम रखते ही घर और अपनी तपस्या से घर को मन्दिर बना देती है .... जिसके चहकने से  किलकारी गूंजती हैं घर में....
      सच में स्त्री तुम इस धरा का मान हो 💕

# नीलम "नीरा"


सोमवार, 29 अगस्त 2022

पत्नी



    हमने बहुत बार देखा है और सुना भी है कि ....पत्नी ऐसी होती है या फिर बीबी वैसी होती हैं....इतना ही नहीं सारे जोक्स  में से जहां तक मैं समझती हूं 90 % जोक्स बीबियों पर होते हैं.... और मजेदार बात ये है कि ये बीबियाँ इन जोक्स पर स्वयं भी हंसती है...
         सच बात तो ये है कि ये बीबियाँ बड़ी ही निराली और अनोखी होती हैं.... मेरी ये बात शायद आपको कुछ अटपटी लगे.... पर इतना कहूंगी कि कभी पत्नियों पर गौर करिए...  आपने शायद कभी नोटिस किया हो जब आप ऑफिस के लिए जाते समय  बीबी को टिफिन बनाने में देर हो जाने पर..... गुस्से में बिना टिफिन के चले जाते हैं .....तो वह पूरा दिन बीवी का खराब हो जाता है वह आपके बिना दिन भर खाना नहीं  खाती .... लेकिन दिन के पूरे काम यथावत करती ही रहती है....
      इतना ही नहीं जब कभी आप रात  में नाराज होकर बिना खाना खाए सो जाते हैं तो बीवी आपको मान मनुहार करके मना ही लेती है और भूखे पेट सोने नहीं देती जबकि वह खुद बिना खाए सो जाती है....

इसके अतिरिक्त.एक किस्सा मै आपको बताती हूं....

       एक बार किसी पति पत्नि का छोटी सी बात को लेकर झगड़ा हो गया .... गर्मियों की रात थी दोनों गुस्से में अपनी अपनी जगह सो गए .....करीब आधी रात को पति को प्यास लगी वह उठा और पास ही में रखी मेज पर वाटर कूलर से खुद उठकर पानी पिया ........पानी पीकर जैसे ही वह बिस्तर पर जाने के लिए मुड़ा उसने देखा पास ही बिस्तर पर लेटी बीवी उसे गुस्से से देख रही थी और बोली आपने पानी खुद क्यों किया पति भी गुस्से में था अकड़ कर बोला हाथ-पांव सलामत है खुद भी सकता हूं तुम्हारा मोहताज नहीं हूं.....
      पत्नी गुस्से से उठ कर बैठ गई और जोर से बोली एक बात गौर से सुन लो लड़ाई अपनी जगह है लेकिन मैं अपना हक और अपनी खुशी किसी को जीने नहीं दूंगी और ना ही किसी का अधिकार होने दूंगी....
        पति हक्का-बक्का उसे देखता रहा फिर पत्नी बोली आपको पता है..... पानी देते हुए या आपका काम करते हुए मुझे कितनी खुशी होती है भले ही हमारी लड़ाई हो या फिर आपस में बातचीत बंद हो....
                यह मैं आपको बता देती हूं कि आप ना तो पानी खुद पिएंगे और ना ही खाना खुद लेकर खाएंगे बीवी की आंखें इतना कहते हुए नम और सुर्ख थी....
        पति ने स्नेह से उसे देखते हुए गले से लगा लिया और झगड़े को वहीं पर विराम दिया 💕
                       ........................

          समय के साथ वक्त आगे बढ़ता गया .....कुछ सालों बाद या एक अंतराल बाद जब एक रात को पति पानी पीने के लिए उठा तो..... उसने दीवार पर लगी अपनी पत्नी की खूबसूरत तस्वीर को देखा उसकी आंखों से पानी की अविरल धारा बहने लगी उसने  हाथों से भरे मन से उस तस्वीर को सहलाया.....
                 तब उसे अपनी पत्नी की वह बात याद आई जब वह कहती थी... चाहे लड़ाई हो या झगड़ा हो या फिर बातचीत बंद हो .....लेकिन मोहब्बत तो मोहब्बत होती है मोहब्बत कभी मरती नहीं 
       सच में पत्नियां होती ही ऐसी अलबेली है एक पहेली की तरह वह अपने अधिकारों का भरपूर सम्मान करके बड़े ही जतन से सहेज कर उन पर अपना पूरा हक जमा कर रखती हैं.... ❤️

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"


रविवार, 28 अगस्त 2022

पुरुष



ईश्वर की अद्भुत अलौलिक संरचना बेजोड़ योग स्त्री पुरूष..... दोनों की एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत पर एक दूसरे के पूरक ❤️ जहां एक स्त्री कोमल ममतामयी वहीं पुरुष यथार्थ के धरातल से जुड़ा कठोर भावनाओं को अपने अंदर समेटे हुए ...तभी तो स्त्री उन्मुक्त विचरती है और इस जगत के निर्माण में सक्षम है....एक दूसरे के बिना दोनो ही अपूर्ण है....

पुरुष यानी .........????? (एक अनसुलझा सवाल )
स्त्री.........??????  ( एक पहेली )

सच कहूं तो बहुत से व्याख्यान भरे पड़े हैं स्त्री की गाथा में ... स्त्री के नख शिख वर्णन हर जगह पढ़ने को मिल जायेगा ...
पर उसमें पुरूष कहाँ है...??  सच सब जानते हैं ..... और मानते भी हैं ... कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं... पर फिर भी...पुरुष को समझा कौन....?? यदा कदा की बात छोड़ दे तो .... कहां मिलता है पुरुष का वर्णन....
       पुरुष की प्रकृति धीर गम्भीर है... पर सीने में दिल धड़कता है... भावनाओं का समुन्दर उमड़ता हैं... हिलोरें लेती हैं उसके भी मन में कोमल भावनाएं ...वो पत्थर है पर.....पर कठोर नहीं.... क्योंकि प्रेम का झरना भी वहीं से फूटता है... ख्याब बुनना सपने संजोना..सजल होना ...सब तो है.. पुरुष में...हम स्त्रियों जैसा..

कभी भी कहीं भी पुरुष द्वारा  पुरुष के लिए कुछ लिखा  गया है.... परंतु एक स्त्री पुरुष को किस नजरिए से देखती है..... पुरुष के मनोभावों को समेटते है... 

एक स्त्री के नज़रिये से देखें तो....
वास्तविकता थोड़ी ज्यादा नज़दीक होती है.......

पुरुष यानि कि ...
पत्थर में अंकुरित  कोपल....

पुरुष  मतलब ...
लोहे के सीने के पीछे ...
धक धक करता कोमल ह्रदय ...

पुरुष यानि कि....
किसी कोयल की कूक  ढ़ूँढता एक मूक वृक्ष ....

पुरुष मतलब...
वो बट बृक्ष जो एक स्थान पर खड़ा
छाँव देता है....

पुरुष कहता  है कि...
" आज मूड नहीं  है,
 दिमाग़  ठिकाने नहीं  है...."
पर, शायद  ही कहेगा कि
आज मन उदास है......

सबको ढाढस बंधाता खुद टूट कर
अपनी  आंखों के बांध को कभी टूटने नहीं देता
वक्त आने पर बीबीएन जाता है
सुखा पोखर ....

स्त्री ....
पुरुष के कंधे पर सर रखकर रो लेती  है....
जब कि, पुरुष 
स्त्री की गोद में सर रखकर रो लेता है.......

जिस तरह दुनियाभर की स्त्रियों को...
अपने  पुरुष के शर्ट पे बटन लगाने में जो रोमांच  होता है....
वही  रोमांच उसी वक्त  स्त्री को 
गले लगाने में
पुरुष को होता है.......

जीतने के लिए पैदा हुआ पुरुष ...
प्यार के पास  हार जाता है....
और जब.....
वो प्यार  छोड़ जाता है ना
तब
वह जड़ समेत  उखड़ जाता है....

स्त्री की मजबूरी सह जाता है.... 
जैसे  तैसे भी....
मगर,
बेवफाई  सह नहीं  पाता.....
उसका.....  या खुद का..... 
दुश्मन बन जाता है.........

धंधे में लाखों का घाटा सह जाता है
भागीदारी में दगा नहीं सह पाता ....

समर्पण स्त्री का स्वभाव है.....
और पुरुष की हार्दिक कामना .......

स्त्री के आँसू  अंधेरे में भी 
दिखते है.....
पुरुष के  आँसू 
उसके तकिये को भी नहीं दिखते ...

कहते  है 
स्त्री को चाहते रहो,
समझने की ज़रूरत नही.......
मैं कहती  हूँ :  
पुरुषको  बस.. समझो....... 
अपने आप चाहने लगेगा  तुम्हें ....

जहां तक समझा है मैने...
स्त्री यदि गंगा जल है
तो पुरुष सहज भाव से समेटे हुए 
जल का दरिया 

स्त्री समर्पित है तो 
पुरुष समर्पण ...

सच कहूं तो
बस पुरुष तो पुरूष है...
एक कठोर आवरण पहने हुए ..
सशक्त प्रहरी ....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

शीशा

बहुत दिनों से घर के कोने में रखा
वो शीशा 
वक्त की गर्द से  धुंधल सा 
अचानक आज सामने आ गया 
ढेरों सवालों के पुलिंदे लिए

और 
मैं पहुंच गई स्मृतियों की घाटी में
जहां संगीत था निर्झर झरने में 
तो सूखे पत्तों में भी 
हर कण कण झूमता सा था 
पर सब गुजरा जमाना हुआ
और ...आज
वहां हरी मखमली घास में 
उगी हुई थी ढेरों शैवाल..
अनवरत कोशिश के बाद भी
रह ही जाते हैं शैवाल के निशां

हर मौसम में 
पंछी कूंजते हैं सुनाते हैं धुन
और... मै
कभी सुना तो कभी अनसुना कर 
बड़ जाती हूं बोझिल कदमों से आगे
शायद 
आईने के सवालों से बचने के लिए 
नहीं करना चाहती मै उन
 अनसुलझे सवालों का सामना
मालूम है मुझे... कि
आईने की गर्द में दफन है...
एक इतिहास

अब मै नहीं दोहराना चाहती इतिहास
नहीं देखना चाहती आईने में तुम्हारा अक्श
जिसमें...
मेरा अंतर्मन  भीग जाए 
मुझे अब ना होगा 
उस बरसात का सामना ...
अनकहे मन से कहती हूं
अब बरसात नही अच्छी लगती मुझे..

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"

सुनो...
तुम कोरे कागज पर लिखते जाओ कुछ  हर्फ
और ....मैं 
लपेटती जाऊं उन्हें अपने अंतर्मन में
द्रौपदी के चीर की तरह

खो जाऊं उनमें ...मीरा की पीर की तरह
और तुम्हारे हर हर्फ में हर्फ बन समा जाऊं

तुम रंगते जाओ उस कोरे कागज को
और ... मै 
रंगती जाऊं राधा की तरह 
हर हर्फ में...
हो जाऊं ....एकाकार हर्फ के हर हर्फ में...

बस तुम...
लिखते जाओ...
जिसमे मेरा रोम रोम 
डूब जाए अनंत होने के लिए ....

नीलम गुप्ता " नीरा"

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

मेरी तमन्ना

स्याह अंधेरों में जुगनुओं से कहाँ होती है रोशनी...!
एक नन्हा -सा चिराग जलाने की तमन्ना है...!!

तंग गलियों में जो पसरा हुआ सन्नाटा सा है...!
उसमें हल्की सी सुगबुगाहट लाने की तमन्ना है...!!

अधढके तन में जो घूम रहा नन्हा कल का भविष्य...!
उसके तन को ढापने की बड़ी तमन्ना है...!!

सोता है जो खाली पेट केवल पानी पीकर फुटपाथ पर...!
उसके लिए इक कौर निवाला मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!!

 मासूम से चेहरों पर जो लिपटी पड़ी है उदासी की चादर...!
उसको समेट मुस्कुराहट लाने की तमन्ना है...!!

ललचाई सी निगाहों से जो देख रहे टुकुर-टुकुर ...!
उनको आंशियाँ मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!!

भोर सी चमक...रात सी चाँदनी रहे सबके चेहरों पर...!
ये ख्वाहिश भी है तहेदिल से मेरी ...
बस यही इक " तमन्ना " पूरी करने की " तमन्ना " है मेरी ...!!

# नीलम " नीरा "

स्याह अंधेरों में जुगनुओं से कहाँ होती है रोशनी

 स्याह अंधेरों में जुगनुओं से कहाँ होती है रोशनी...!

एक नन्हा -सा चिराग जलाने की तमन्ना है...!!

तंग गलियों में जो पसरा हुआ सन्नाटा सा है...!

उसमें हल्की सी सुगबुगाहट लाने की तमन्ना है...!!

                         अधढके तन में जो घूम रहा नन्हा कल का भविष्य...!

                          उसके तन को ढापने की बड़ी तमन्ना है...!!

                          सोता है जो खाली पेट केवल पानी पीकर फुटपाथ पर...!

उसके लिए इक कौर निवाला मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!! 

मासूम से चेहरों पर जो लिपटी पड़ी है उदासी की चादर...!

उसको समेट मुस्कुराहट लाने की तमन्ना है...!!

ललचाई सी निगाहों से जो देख रहे टुकुर-टुकुर ...!

                                     उनको आंशियाँ मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!!

                              भोर सी चमक...रात सी चाँदनी रहे सबके चेहरों पर...!

ये ख्वाहिश भी है तहेदिल से मेरी ...बस यही इक " तमन्ना " पूरी करने की " तमन्ना " है मेरी ...!!# नीलम " नीरा "

गुरुवार, 16 जून 2022

चाय

चाय....


एक छोटा सा शब्द चाय....कितना गहरा है ...कितना कुछ समेटे हुए हैं ..अपने में....इत्तु सी चाय ...बदल देती है दुनिया...  प्यार सम्मान अपनापन... स्नेह दुलार  मनुहार  एक मधुर अहसास ..सुकून... यारी दोस्ती...क्या कुछ नहीं है...चाय में....
सच कहूँ तो....एक कप चाय ...पूरी की पूरी महफिल है.... जिंदगी का सार है.... अब आप कहेंगे ...जिन्दगी का सार.... हाँ ...सार.. पी कर तो देखिए ..एक कप चाय दोस्तों संग... उस अहसास से लबरेज हो जाएंगे आप ... जिनको सिर्फ महसूस किया जा सकता है... जिनको व्यक्त करने के लिए शब्द ही नहीं बने.... अद्भुत अहसास
    एक कप चाय ...से लौट आती है जिन्दगी.... पुरानी यादें... बचपन की  अठखेलियाँ...  और नए पुराने दोस्त...वो प्यार भरी मीठी बातें.... वो शिकवे शिकायतें...
 
इस भगदौड़ भरी...जिन्दगी में... सुकून है चाय...सर दर्द हो या हो मन उदास...तन्हाई हो या हो  अकेलापन ... जीवन का खालीपन.. सब डूब जाते हैं ...चाय के उस  छोटे से प्याले में... पी कर तो देखिए .... कभी आँखे नम तो कभी मुस्कुरा जाती हैं आँखे... एक कप चाय से 

 सबसे बड़ी बात ...खाली बैठे हो ...तो एक कप चाय  से अच्छा कोई विकल्प ही नहीं है समय बिताने का....सर्द मौसम हो या तपती धूप या फिर रिमझिम बरसात ...चाय   का अलग ही आनन्द है.... बरसात हो और चाय संग पकौड़े... फिर तो बस परम् आनन्द....

 अब क्या ही कहूँ.... एक कप चाय ...वो भी दोस्तों संग अपनों संग...उदास जिन्दगी में रंग भर देती है... गोरी हो या काली चाय...  मीठी हो या फीकी ....सब के चेहरे गुलाब कर देती है... चाय...
तो चलिए ...हो जाये ....एक कप चाय ☺️

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

शनिवार, 4 जून 2022

काँटे

छोटी थी ...तब सोचती थी कि गुलाब इतना प्यारा सा ....
इतनी भीनी खुशबू....हर रंग में मनमोहक... जरा सा प्यार से सहलाओ तो ....उसकी महक से सारा फिजा महक जाए ...पर फिर उसमें कांटे क्यों होते हैं....?? 
उलझी ही रहती ...
बालमन ऐसा ही होता है.... जो हर बात में सवाल..और वो भी अनगिनत.... कुछ तो बेसिरपैर के ....

लेकिन...
तब तो नहीं....
पर अब समझ आया कि...
हर सवाल का जबाब होता है.... सवाल कभी बेसिरपैर के नही होते ....कोई ना कोई  तथ्य होता ही है...हर सवाल जबाब का....
अब गुलाब को ही देखो ....अपनी भीनी महक से सबका दिल मोह लेते हैं...
चाहे सुंदरी के बालों में लगे या किसी को नेह वश दो या सुहाग सेज सजी हो ...
हर जगह अलग महत्व...पर साथ में काँटे ...??
काँटे वो भी फिजूल कहाँ होते हैं...
हर जगह एक संदेश तो देते हैं.... जहाँ गुलाब है वहाँ काँटो से सावधान रहो... ये काँटे ही ये सन्देश देते हैं... कि  जहाँ ख़ुशी है वहाँ जनझावत भी है...
एक बात और....
गुलाब में कांटे इसलिए  भी होते हैं... जिससे कोई उसे झटके से तोड़े तो ...लहूलुहान कर काँटे उसे जता दें कि गुलाब अकेला नहीं है... उसके भी पहरेदार हैं...
सच कहूँ तो...बिना काँटो का गुलाब अच्छा ही नहीं लगता....

गुलाब है जनाब आहिस्ता से सहेजिये...
 किताबों में रखे गुलाब जब भी मिलते हैं... हर बार ताजा ही होते हैं....

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

सोमवार, 30 मई 2022

सजीवनी बूटी

संजीवनी बूटी

जी हाँ जरुरत होती है....उम्र पर
संजीवनी बूटी की सभी को.....

जहाँ बंद हो जाते हैं सारे रास्ते....
और..
  खड़ी हो जाती है जिन्दगी एक ऐसे दोराहे पर
जब....
 ये जानी पहचानी गलियां लगती हैं बेगानी सी
फिर.....
 जिन्दगी के सफर में सिर्फ तलाश रहती है
इक अदद सुकून की...
और.....
तब मिल जाते हैं ... कुछ दोस्त खड़े हुए 
उम्मीद से अपनी बाँहे फैलाये.... 
मीठी मुस्कान लिए... थामने को डगमगाते हुए कदम
वही दोस्त.....
जो खोल देते हैं जिन्दगी का वो रास्ता 
जहाँ फिर से शुरू होता है एक नया सफर ....
  सच कहा....
नया सफर नया रास्ता बेफिक्री का बेपरवाह सा...अलबेला
और फिर....
 फिर से शुरू हो जाती है जिन्दगी की नई पारी....
दोस्तों संग ...
जहाँ सारे रिश्ते नाते ताक पर रख ....
फिर से जी लेते हैं हम जिन्दगी की अनूठी पारी
और फिर....
चल पड़ती है जिन्दगी.... 
चुलबुले नटखट और शरारती दोस्तों संग ...
अनजानी राह पर....
 सच कहूँ तो....
दोस्त सजीवनी बूटी होते हैं.....
जो जिंदादिली से जीना सिखाते हैं...☺️

 एक बात और कहूँगी दोस्तों....
दोस्तों में कोई उम्र नही होती ...
जब दोस्ती होती है तो सब हमउम्र हो जाते हैं....
तभी तो संजीवनी बूटी होते हैं ये ....
बिंदास दोस्त

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

विश्व धूम्रपान निषेध दिवस

आओ हम सब मिल कर  मनाए ...विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

चलो आओ हम सब मिलकर ये संकल्प लें, धूम्रपान को बंद करें |

धूम्रपान की यह है खामी, यह पहुंचाती है पर्यावरण को बड़ी हानि।

चलो आओ हम सब मिलकर ये संकल्प करें, धूम्रपान को बंद करें |

सच को स्वीकारो साथियों..
आप सिगरेट को नहीं… सिगरेट आपको पीती है... इसका नतीजा सिर्फ मौत है |

 मान भी लो मेरी बात धूम्रपान का ना करें उपयोग, उससे होते अनेक रोग |

शरीर का रखना हो ध्यान, तो बंद करें धूम्रपान....|

सिगरेट-बीड़ी के सेवन से, प्रदूषित होती है वायु, फेफड़े होते हैं खराब और घट जाती है आयु |

अगर शरीर का रखना है ध्यान तो अब से बंद करो धूम्रपान।
नशे को छोड़ दो! जीवन को नया मोड दो! इस जहर से नाता ही तोड दो |

   करना है अगर अपनी जर्जरता का निदान...तो कर दो धूम्रपान का वहिष्कार |

 देश के प्रति अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को निभाते हम.... खुद भी और औरों को भी करें जागरूक धूम्रपान बंद करें  |

 गर चाहिए रोटी कपड़ा और मकान ..
तो धूम्रपान से पकड़ लें कान |

अपने देश और समाज के नौनिहालों को रखें इस जानलेवा जहर से दूर ....बंद करें धूम्रपान |

आओ हम सब मिलकर लेते हैं ये शपथ....मिटा कर देश से इस  ज़हर को...एक  उन्नत राष्ट बनाते हैं.. |

जहाँ ना कोई मोहताज हो रोटी कपड़ा और मकान का...
एक वैभवशाली देश बनाने के लिए ....आओ हम सब मिलकर बीड़ी सिगरेट गुटका और शराब का निषेध करें..|

चलो साथियों मिल जुल कर  विश्व धूम्रपान निषेध को सफल बनायें ...|

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

सैलाब



आज कॉलेज से आते ही मेरी छोटी बिटिया ने मुझे बताया पापा आज अंकल कहीं गए हैं ...मैंने उत्सुकता वश पूछा ...कहाँ गए हैं ...?
तो बिटिया बोली ...ये तो पता नहीं पापा.... पर उनके हाथ में छोटा सूटकेस था मुझसे बोले ...पापा को बोल देना की 2/3 दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ... आकर साथ चाय पियेंगे...
मैंने संक्षिप्त सा.. "अच्छा" कहा ...
और अन्दर आ गया
अंदर आते ही पत्नी की चिरपरिचित आवाज आई ...आ गए आप ...चलिए जल्दी से फ्रेश हो जाइए ...मैं चाय बनाती हूँ... और हाँ ....आज आपकी पसंद के  पकौड़े भी बनाये हैं....
 और मैं आज्ञाकारी पति की तरह ... पत्नी के कहे अनुसार फ्रेश होकर  बाहर बालकनी मैं आकर बैठ गया....
 मेरी पत्नी के हाथ की चाय वाकई लाजवाब होती है और पकौड़े के साथ हरे आम की चटनी पुदीने बाली कहना ही क्या....
पर आज जैसे  स्वाद कुछ कम ही जमा... कुछ कमी सी खल रही थी..शायद रमेश सर की.... आदत जो हो गयी थी उनकी..... चाय हों साथ में पकौड़े अगर समेश सर ना हों साथ तो स्वाद पूरा नहीं आता...
 बस चाय पीते पीते  मैं चला गया पुरानी यादों में.... 
पता ही नहीं चला  ये वक्त कैसे बीत गया.… लगा पल ही में गुजर गए ये 10 / 15 साल  जैसे कल ही की बात हो....
बात तब की है.... नया नया आया था कालेज में  ट्रांसफर होकर...  जैसे ही कॉलेज में प्रवेश किया... रमेश सर से मुलाकात हो गयी...
रमेश सर धीर गम्भीर उजले रंग के बड़ी बड़ी आँखों बाले सामान्य कद काठी वाले गजब केआकर्षक व्यक्तित्व के धनी...एक पल तो मैं देखता ही रह गया ...फिर बरबस संस्कार सभ्यता वश हाथ जुड़ गए...
रमेश सर ने चिरपरिचित गम्भीर मुस्कान से जबाब दिया.... फिर बोले .. आप शायद नए आये हैं...
मैंने संक्षिप्त सा... "जी"  कहा
 फिर सर बोले ...कोई परेशानी हो तो बताइएगा बेझिझक... क्या परिवार भी साथ है...?
मैंने कहा....सर अभी ज्वाइन किया है  रामपुर से ट्रांसफर होकर आया हूँ... घर तलाश कर लूँ फिर परिवार लेकर आऊँगा... सर परिवार बिना बहुत परेशानी होती है ...|
 सर ने बताया कि वो राजनीतिक विभाग में एच ओ डी हैं .. यहाँ काफी साल से हैं... फिर  चलते चलते हल्की फुल्की परिवार और कॉलेज से सम्बंधित बातचीत होती रही ...
फिर वो कुछ पल रुक कर बोले ...अपने घर चलने के लिए आमंत्रित करते हुए बोले......चलिए मेरे घर चलिए  वहीँ पर एक एक कप चाय पीते हैं और बिलकुल मेरे पड़ौस में 2 दिन पहले ही एक मकान खाली हुआ है आप देख भी लीजिएगा...अगर आपको पसन्द आये तो....
औपचारिकता वश एक बार मना किया पर फिर सर के साथ उनके घर चल दिया....
 सर के घर उनकी पत्नी और 2 प्यारी सी बच्चियां थी ...लगता था बच्चियां कालेज में हैं.... फिर सर ने ही बताया बड़ी बिटिया बीएड करके  जॉब की तैयारी कर रही है और छोटी बिटिया ने पोस्ट ग्रेजुएशन में एडमिशन लिया है ...उनकी वाइफ घर पर ही रहती हैं....
 चाय के बाद हम मकान देखने गए ...सब कुछ मनमुताबिक था ...सो...तुरन्त मालिक मकान से बात कर  1 महीने का एडवांस दे 4/5 दिन बाद आने की बात बोल ...और सर का दिल से धन्यवाद कर  बस में बैठ गया...|
बस में बैठ ....मैं सोचने लगा...बताओ अनजाने शहर में भी कितने अपने से  लोग मिल जाते हैं... सच में भगवान सब कुछ सोचकर रखता है...
बस इस तरह थी मेरी और रमेश सर की पहली मुलाकात...

 3/ 4 दिन बाद मैं सारा सामान ले पत्नी और दोनों बच्चों को लेकर आ गया... 
कुछ दिन व्यस्त रहे ...समान लगाना , नए शहर को समझना , जरूरत का सामान लाना ,बच्चों का एडमिशन आदि... 
फिर सब सामान्य रूप से चलने लगा...कुछ लोग परिचित भी हो गए....इन सब के बीच सर ने मेरी यथासंभव मदद की...जिसका आभार मैं आजतक मानता हूँ....
फिर धीरे धीरे  शाम की चाय मैं और सर अकसर साथ ही लॉन में बैठ कर पीते... शुरू में तो कुछ संकोच होता पर धीरे धीरे प्रगाढ़ता बढ़ गयी...मैं और  सर एक दूसरे से खुलने लगे...
मैं और सर जब भी शाम की चाय पर साथ होते घर परिवार की बातें अपने बचपन और कॉलेज की बातें करते ....
 मितव्ययी धीर गम्भीर से दिखने बाले सर कितने सहज सरल और मृदुल स्वभाव के है तभी मुझे पता चला....
 सच कहूँ तो अब मुझे  एक आदत सी हो गयी है चाय पर उनकी...तभी  तो चाय और पकौड़े का स्वाद आज कुछ जम सा नहीं रहा....
मैं चाय का प्याला हाथ में लिए पहुँच गया बीते वक्त में ....उस दिन गरमी में मन को राहत देने वाली हल्की  सी बूंदा बाँदी हो रही थी रोजमर्रा की तरह मैं और सर बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे....तभी सामने से हमारे ही कॉलेज का एक विद्यार्थी किसी लड़की के साथ बातें करता हुआ जा रहा था....उस लड़के ने एक झलक हमें देखा फिर बेफिक्र सा चलते बना....
 सर ने मेरी तरफ देखा... फिर बोले देखा मनोज जी  
सर मुझे ऐसे ही बुलाते थे... आगे वोले आजकल के बच्चों को जरा भी हिचक   जरा भी लिहाज  नहीं है ...एक हमारा जमाना था...हम तो आज भी पिताजी के आगे बोलते नहीं... पर आज कल बस कुछ कहिये मत....
मुझे लगा शायद सर कहीं खो से गये...मैंने कहा सर क्या हुआ...
तब सर कुछ सोचते हुए ...कहीं दूर पुरानी यादों में चले गए....और बोले मनोज जी ....
 हम आठ भाई बहन है पिताजी मिलेट्री में बड़े अफसर ...पर घर में 10 लोग हम और दादी दादा जी सभी का खर्च पढ़ाई इत्यादि... इसी के कारण सामान्य सा जीवन रहा... पिताजी की अच्छी नौकरी के कारण भी कोई ऐशोआराम नहीं था क्योकि एक ही व्यक्ति पर की तनख्वाह पर सभी का गुजारा होता था   ...सब कुछ सामान्य 
मैं भाई बहनों में बीच का था ...दिमाग अच्छा था पर पढ़ाई में कम ही लगाता था ... बस पासिंग मार्क से कुछ ही ज्यादा आते थे....पर लिखने का बहुत शौक था...
यही कोई 9/ 10 साल का रहा होंगा ... जब से लिखता हूँ....पिताजी ने साइकिल दिला दी थी ...उस जमाने में साइकिल होना मतलब नबाबी होना.... मैं साइकिल ले इधर उधर घूमता और एक दो दिन बाद  अपनी कलम से सारी घटना को  शब्दों में ढाल देता और फिर पहुँच जाता  दैनिक जागरण के ऑफिस.....  वहीं अपनी रचना देता और वो उसे छाप देते ...उस जमाने में बहुत अखबार तो होते नहीं थे ... दो /चार ही होते थे...पर दैनिक जागरण सबसे ऊपर..
इसी तरह रचनाएं देते देते वहाँ के एडिटर महोदय से परिचय हो गया ...अब तो जब भी जाता वो तुरन्त मेरी रचना  छपने को दे देते...
अब ये बात तो छिपने बाली नहीं थी...पिताजी अखबार पढ़ते..और मेरी रचना पढ़ते ....साथ ही डाक से आई पेपर की एक प्रति देखते और... मुझ पर गुस्सा करते...हमेशा यही कहते फालतू दिमाग मत लगाओ पढ़ा करो...काम आएगा 
पर मैं कहाँ मानने वाला..हर 2/3 दिन बाद फिर पहुँच जाता दैनिक जागरण के ऑफिस रचना लेकर...यही क्रम चलता रहा... बहुत सालों तक
  इन्ही सब के बीच एक दिन एक  घटना हुई एक दिन मेरी साइकिल किसी से टकरा गई ...मैं बहुत घबराया कि अब तो कोई खैर नहीं.... इसी उधेड़बुन में भागने ही वाला था कि... सामने से आवाज आई कोई बात नहीं ..पर तुम लिखते बहुत अच्छा हो... आशा के विपरीत ...मैं चौंका...बस फिर क्या था ज्यों ही नजरें उठा कर देखा तो उठी ही रह गयीं...तो बस थम गई सांसे ...
2 चुटिया बनाये वो बड़े फूलों बाला पिंक सूट पहने ... गेहुएं रंग की बोलती सी आँखों वाली सामने लड़की खड़ी थी ...5 मिनट हम दोनों सारी घटना ही भूल गए...
फिर जैसे होश आया मैं साइकिल सम्भालते जो भागा कह नहीं सकता...और वो मुस्कुरा रही थी....मुझे आज भी याद है...
सच और फिर   2 दिन घर से निकला ही नहीं... तीसरे दिन जब निकला तक शायद उम्र की उस दहलीज का तकाजा कहूँ या कसूर  आँखे उसे ही ढूंढ रही थी...
अब निगाह रास्ते पर कम और इधर उधर ज्यादा थी...
एक दिन वो सामने पड़ गयी ....बस कुछ दिनतक मुस्कुराहटों के आदान प्रदान का सिलसिला चलता रहा...
फिर एक दिन उसने ही इशारे से साइकिल रुकवाई ...मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी ...बस महीनों बाद हल्की फुल्की बातचीत चलती रही ...और फिर नाम का आदान प्रदान स्कूल  और फिर हम साथ ही कॉलेज में... धीरे धीरे
मुलाकात अब  साथ निभाने तक आ गयी थी...
पर सब वक्त मनमाफिक तो चलता नहीं... कॉलेज से निकले तो नौकरी की तलाश...3 /4 साल उसी में लग गए...लेकिन पिताजी के आगे सर उठाने की  हिम्मत नहीं हुई...
अब कॉलेज नहीं और नौकरी की तलाश  ...तब धीरे धीरे मुलाकातों का सिलसिला कम हो गया ..जब भी मिलती वो बड़े ही आग्रह और अनुनय से कहती ....मैं रह नही पाऊंगी तुम्हारे बगैर... मैं निरुत्तरित सा... उसके सामने बेबस देखता उसको  पर...बोलता कुछ भी नहीं....फिर पिता जी का भय...पिताजी क्या उस वक्त तो बड़े भाई के सामने भी हिम्मत नही होती थी.....
सच बोलूँ तो आज शायद मैं स्वयं को कायर ही कहूँगा....पर क्या करता...आज की तरह जमाना तो नहीं था तब...अपने बड़ो के सामने मुँह खोलने का...
और मैं मन मसोस कर रह गया उस वक्त .... जिसका मलाल आज भी है मुझे .... ना चाहकर भी पीछे हट गया...समझ सकते हो उस पीड़ा को... मेरी लाचारी को....
 बस फिर उसके  3/4 साल बाद कॉलेज में जॉब लगी...बड़े भाई की शादी हुई ...फिर मेरा नम्बर आया... फिर यादों ने हिलोरें मारी...एक बार फिर प्रयास किया  पर तब तक वक्त हाथ से निकल चुका था...आखिर कब तक कोई इंतजार करता ...और शायद ....क्यों ही करता...जब सामने वाला समझ रहा हो कि...उसके लिए कोई लड़ेगा नहीं... आखिर हिम्मत जुटाने के लिए भी तो हिम्मत ही चाहिए...
बस फिर पिताजी के एक रिश्तेदार ने अपनी पहचान की एम ए पास अपनी पसंद की लड़की से शादी कर दी....
   करता भी क्या मेरे पास कोई चारा नहीं था या कहूँ हिम्मत नहीं थी  ... और पिताजी का हुक्म जो सर आँखों पर रखना था... फिर   समाज परिवार की मान्यताएं निभाते वक्त के साथ 2 बच्चियों का पिता बन गया...
परिवार की जिम्मेदारी निभाते आज यहाँ तक आ गया और वो सिर्फ नाम की एम ए पास  मेरे साथ कभी कदमताल ही ना मिला पायीं .... मैं इनमें ..उसको खोजता रहा और ये रूढ़िवाद से जकड़ी रही....
 सर लगातार बोले जा रहे थे....और मैं उन्हें एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह सुने जा रहा था ...
 सर बोले सच में मनोज जी ... पुरानी यादें कभी खत्म नहीं होतीं.... वक्त के साथ हल्की सी धुंधली भले ही हो जाएं.. पर
यादें कभी नहीं भुलायी जाती हमेशा हमारे अंदर जिंदा रहती है लोगों को लगता है कि.... हम अपना बिता हुआ भूल गए पर हम भूलते कभी नहीं...
 सच कहूँ तो.....वो यादें ना दफनाई जाती है ना जलाई जाती है 
बस गीली लकड़ी की तरह सुलगती रहती है अंदर ही अंदर 
और अंततः बन जाती है राख में दबी चिंगारी की तरह 
लोगो को लगता है कि आग बुझ गयी पर असल में वो बुझती नहीं राख में दबी चिंगारी सुलगती रहती है...
सर बेपरवाह से बोले जा रहे थे ...लग रहा था आज बहुत कुछ पिघल रहा है उनके अंदर.... हम दोनों की आँखे नम थी....
तन्द्रा तब टूटी जब सर की वाइफ बोली मैं मन्दिर जा रही हूँ... मैंने बहुत कम ही उनको बोलते सुना है...मैंने
         तभी अंदर से पत्नी की आवाज आई ...कहाँ खो गए  अंधेरा हो गया... बच्चे जिद्द कर रहे हैं चलिए बाजार होकर आते हैं... कुछ सामान भी लाना है....
सच में अंधेरा हो गया था ...मैं अनमने मन से उठा...बाजार जाने के लिए ..क्योकि छोटी बिटिया तैयार खड़ी थी....
सोच रहा था...कि जिन्दगी भी क्या है... कब किस मोड़ पर जिन्दगी बदल दे कुछ नहीं कह सकते...वक्त है....कि अपनी ही चाल से चलता है.... और हम इच्छाओं उम्मीदों का गला दबाते चलते जाते हैं वक्त के साथ...उसको नियति मान....क्योंकि हमारे पास इसके सिवा कोई और रास्ता भी तो नहीं होता.....

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

शनिवार, 28 मई 2022

संजीवनी बूटी

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जी हाँ जरुरत होती है....उम्र पर
संजीवनी बूटी की सभी को.....

जहाँ बंद हो जाते हैं सारे रास्ते....
और..
  खड़ी हो जाती है जिन्दगी एक ऐसे दोराहे पर
जब....
 ये जानी पहचानी गलियां लगती हैं बेगानी सी
फिर.....
 जिन्दगी के सफर में सिर्फ तलाश रहती है
इक अदद सुकून की...
और.....
तब मिल जाते हैं ... कुछ दोस्त खड़े हुए 
उम्मीद से अपनी बाँहे फैलाये.... 
मीठी मुस्कान लिए... थामने को डगमगाते हुए कदम
वही दोस्त.....
जो खोल देते हैं जिन्दगी का वो रास्ता 
जहाँ फिर से शुरू होता है एक नया सफर ....
  सच कहा....
नया सफर नया रास्ता बेफिक्री का बेपरवाह सा...अलबेला
और फिर....
 फिर से शुरू हो जाती है जिन्दगी की नई पारी....
दोस्तों संग ...
जहाँ सारे रिश्ते नाते ताक पर रख ....
फिर से जी लेते हैं हम जिन्दगी की अनूठी पारी
और फिर....
चल पड़ती है जिन्दगी.... 
चुलबुले नटखट और शरारती दोस्तों संग ...
अनजानी राह पर....
 सच कहूँ तो....
दोस्त सजीवनी बूटी होते हैं.....
जो जिंदादिली से जीना सिखाते हैं...☺️

 एक बात और कहूँगी दोस्तों....
दोस्तों में कोई उम्र नही होती ...
जब दोस्ती होती है तो सब हमउम्र हो जाते हैं....
अभी तो संजीवनी बूटी होते हैं ये ....
बिंदास दोस्त

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

शुक्रवार, 13 मई 2022

मेरी माँ

एक मुलाकात मेरी ...मेरी माँ से

जब मैं थी उदर में माँ के ...वो अपने से ज्यादा रखती ख्याल मेरा
 जरा  सी अकुलाहट पर मेरी ..वो विचलित हो जाती
      😭😭😭
थोड़ा सा बड़ी हुई... पहचान भूख को मेरी झटपट सीने से लगा मेरी भूख मिटाती
पता नही कैसे मेरीे ...उंगली पकड़ चलना सिखाया  
मेरे नन्हे पैरों को  सम्बल दे आगे बढ़ना सिखाया 
 ना जाने कब खेल खेल में क ख़ ग का परिचय करवाया 
मै नादान अल्हड़ सी..बिन बात रुठ जाती..याद है मुझे आज भी..
पर फिर भी  वो झट मनुहार कर चूम लेती पलकों को मेरी
जान भी नहीं पाई मैं ...कब मुझे अच्छे बुरे का भेद करना सिखाया
 बातों ही बातों में चुपके से थमा दी मुझे संस्कारों की गठरी
 वो माँ ही थी..जिसने  एक पल भी अलग ना किया मुझे अपने से
फिर भी रख सीने पर पत्थर ...
                         😭😭😭
 झट से सौंप दी अनजाने  हाथों में मेरे जीवन की डोर ..
  वहाँ भी हरपल साया बन  साथ निभाती रही मेरा
   जब आया समझ तब छोड़ चली वो  साथ मेरा...
पता नहीं वो कैसी जादूगरनी थी...बिन कहे समझ जाती थी मुझे...
🙏🙏🙏
ढूंढ लेती वो मेरी मुस्कान में भी ...हल्की सी उदासी की धूमिल  रेखा 
वो माँ हरपल यादों में रहती है  मेरे हमसाया बन
 माँ अब तू ही बता कैसे याद करूँ तुझको ..
एक दिन में..
मेरे लिए तो हर रोज... हर पल   तू ही तू है..
कदम कदम पर तेरी बातें...तेरी सलाहें.. थाम लेती हैं..
मेरे डगमगाए कदमों को...आज भी
सच माँ ..मैं माँ बन कर भी... तुझको पल पल याद करती हूँ..
  बन्द आखों के नम कोरों से तुझको बारम्बार नमन  करती हूँ
           😭😭😭

                          #.  नीलम  "नीरा "

गुरुवार, 5 मई 2022

जिम्मेदार कौन

जिम्मेदार कौन....
जी हाँ कौन जिम्मेदार है बच्चों को बिगाड़ने में.. मेरे जेहन में ये सवाल उस वक्त उठा... जब मैं सुबह सुबह उन बच्चों को देख रही थी जो स्कूल बस से स्कूल जा रहे थे  और कुछ बच्चे पास ही स्कूल में पैदल ही जा रहे थे... 
मेरे घर के सामने से अधिकतर सभी स्कूलों की बसें निकालती हैं ...इसलिए मैं अधिकतर बच्चों के स्कूल जाने और आने के वक्त गेट से बाहर आ ही जाती हूँ... बच्चों की चहल पहल किसका  दिल नहीं मोह लेती...

           हाँ तो मैं वही बता रही थी कि  बच्चों को बिगाड़ने में माँ और पिता का ही हाथ रहता है .....ये बात कुछ लोगों को बुरी और अटपटी जरुर लगेगी ..पर मेरे नजरिये से मुझे तो सही लगी... क्योंकि मैं लगभग रोज ही देखती हूँ बच्चे स्कूल जा रहे होते हैं और उनके माता पिता कंधे पर उनका स्कूलबैग लादे होते हैं... और बच्चा शैतानी करता हुआ बेफिक्र चलता है...
 आज जब एक ऐसे ही माँ को बोला..... तो उनका जबाब था...बैग भारी है..ये थक जाएगा...
मुझे जबाब अजीब लगा पर आदतानुसार 
फिर मैंने कहा .. आप स्वंय ही अपने बच्चे को बिगाड़ रही हैं... उसे उसकी जिम्मेदारी तो उठाने दीजिये..कल तो फिर आप ही कहेंगी ...

मैं सोचने पर विवश हो गयी और तभी  लगा जब हम अपने छोटे बच्चों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं कराएंगे तो वो नासमझ समझेंगे कैसे....वो तो वही समझेंगे जो हम समझाएंगे...
         ये बात ठीक है कि हमारा अतिशय स्नेह होता है बच्चों पर 
तो क्या हम उनको उनके काम  से अलग कर दें...
ईश्वर में हमें माता पिता बना कर बहुत बड़ा दायित्व सौंपा है..तो हमारा भी फर्ज बनता है कि अपने बच्चों को एक अच्छी परवरिश के साथ जिम्मेदारी उठाना भी सिखाएं...
आज वो छोटा सा स्कूल बैग उठाएंगे ...ऐसे ही धीरे धीरे आगे बढ़ेंगे...
बच्चों को प्यार स्नेह दुलार भरपूर दीजिये पर अच्छी शिक्षा भी दीजिये ..क्योंकि यही छोटी छोटी बातें आगे चलकर फायदेमंद या नुकसानदेह हो सकती है... 
तभी तो कहा है ...बच्चे की पहली पाठशाला घर है और पहले गुरु माता पिता☺️

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

डाकियाअब कहाँ हैं

 डाकियाअब कहाँ हैं वो डाकिये वाले दिन .... घण्टों इंतजार रहता था....टकटकी बन्धी रहती थी देहरी पर..जरा सी आहट पर कदम चल पड़ते थे...धडकनों का संगीत  सुनाई देने लगता था... गालों पर बेमौसम गुलाल बिखर जाया करता था....नजरों का काजल  अधखिला कमल हो जाया करता था... हर काम बेमानी लगता था उस इंतजार में.... सच...  डाकिये का इंतजार बड़ा ही रूमानी लगता था... कहाँ गए वो डाकिये वाले दिन..

बुधवार, 2 मार्च 2022

ये स्त्री

ये स्त्री है जनाब...
बिखर बिखर कर निखरती है...
 टूट टूट कर सबको जोड़ती है...
मुँह में पल्लू का कोना ठूसे...
मौन आँखों से बोलती है...
ये स्त्री है जनाब...

 पीड़ा में भी मुस्कुराती है
 मौन हर दंश झेलती पर ...
 अपने चीत्कार को खुद ही सुनती 
 कोरों की नमी में भी मुस्कुराती 
ये स्त्री है जनाब....

ये वो नेह का धागा है
जो पिरोती रिश्तों को
 कैसे कह दूँ साहब 
ये कोमल सी छुई मुई 
 नार नवेली कमतर है किसी से...
 तभी तो कहा....
ये स्त्री है जनाब....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

उलझन

ए सुनो....
   बस एक बार मिल लो ...
बहुत कुछ उलझा है तुम संग...
 वही उलझन सुलझा लें..
बहुत सी खट्टी मीठी यादें...
बहुत सी अच्छी बुरी बातें...
बहुत से मान मनुहार के पल...
 वो तुम्हारा आँखों से बोलना...
 वो तुम्हारे मेरी हर बात को हल्के से उछलना...
 वो तुम्हारा लटों को अपने हाथ से पीछे करना...
वो पीछे से आकर आँखें बन्द करना...
 वो अभी मन भरा नहीं कहकर रोकना...
  जाते जाते मुड़कर तुम्हारा देखना...
और
वो आखिरी बार तुम्हारा बिना मुड़े चले जाना ...
बहुत सी बातें हैं... तुम आओ तो तुम
बस एक बार तुमसे उलझना है
उलझ कर तुमझे बहुत कुछ सुलझाना है....
समझ रहे हो ...ना तुम 
सब कुछ सुलझाने के लिए...
जरूरी है तुमसे उलझना...

# डॉ नीलम गुप्ता  "नीरा"

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

प्रेम

प्रेम

प्रेम अनन्त है 
वही प्रेम सूक्ष्म है
प्रेम धरा है
 तो वही प्रेम आकाश है
प्रेम प्रतीक्षा है...
प्रेम कोरो की नमी तो....
वहीं प्रेम स्निग्ध मुस्कान है..
ओस की बूँदों सा
सूर्य की पहली किरन सा प्रेम 
सच अपरिभाषित सा प्रेम....

जरूरत कहाँ है... प्रेम को शब्द की
किसी अभिव्यक्ति की .....
प्रेम अनन्त विस्तार है
कहाँ है प्रेम की सीमा .....
प्रेम अंतर्मन का अनन्त अहसास 
जिसे पढ़ा नही जाता
शब्दों के मोती में गूँथ कर
माला  नहीं बनाई जा सकती
व्यक्त  नहीं किया जाता 
शब्दों की परिधि से परे प्रेम
एक अनगढ़ सा अहसास प्रेम
बन्द आँखों में सिमटा प्रेम
 रूह से रूह में समाया हुआ 
अव्यक्त सा... प्रेम 
 मेरा ही प्रेम है...
और 
मैं  प्रेममय  प्रेमी  हूँ....

डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"