गुरुवार, 28 सितंबर 2023

#रात्री विश्राम #

#रात्री विश्राम  #

कभी ख़यालों में
कभी सवालों में
रख लेता हूँ मैं तुम्हें जैसे
बातों में क्या 
अब भी मुझे तुम 
रख पाती हो 

इश्क़ की स्याह में
रंगा मन मेरा
इन्हीं रंगों में 
तुम भी बोलो 
खयाल अपना क्या
रंग पाती हो

लिखता हूँ अक्सर
तुम्हें प्रेम में
प्रेम में मुझे तुम
क्या पढ़ पाती हो
कहो मुझे क्या
तुम पढ़ पाती हो?

बुधवार, 20 सितंबर 2023

प्रेम......प्रेम क्या है....??ये एक ऐसा अनसुलझा सरल सहज सा सुलझा सा सवाल है....जिसके ज़बाब तो बहुतेरे हैं... पर फिर भी सवाल ही है... व्यक्त और अव्यक्त के बीच हिंडोले लेता मासूम सा प्रेम ... सच बात तो ये है...बिना आकार प्रकार का प्रेम साकार सा महसूस होता है , कोई रूप रंग नहीं फिर भी रंगीन सा लगता है , कोई खुशबू नही फिर भी अपनी महक से मदहोश करता है... प्रेम के आँखें नहीं, फिर भी देखता है , हाथ नहीं फिर भी आँखे खुद ही पोंछता है , पैर नहीं फिर भी प्रेम दो इंसानों के साथ साथ जीवन भर चलता है....प्रेम की कोई गति सीमा नहीं फिर भी निर्बाध चलता है.... प्रेम को समझ जाए उससे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं... प्रेम को मीरा ने जाना , प्रेम को राधा ने जाना , प्रेम को लैला ने जाना, सोनी ने जाना, शीरी ने जाना ,और जिनका आज भी दीवाना है जमाना पर आज भी इस दुनिया ने प्रेम को सही ढंग से नही जाना एक भूल भुलैया बना दिया .... देखा जाय तो प्रेम एक ऐसा भाव है जो जीवन का खुशियों से अभिनंदन करता है , और हमने प्रेम को शादी के द्वारा गठबंधन बना दिया, पर क्या सोचा है कि क्या प्रेम को कभी बंधा जा सका है...उन्मुक्त प्रेम तो स्वछंद है .... सच कहें तो दरअसल जाना ही नहीं जा सकता – प्रेम क्या होता है.....? क्योंकि प्रेम में सिर्फ डूबा जा सकता है और इसमें डूबने बाला ही जान सकता है की प्रेम कितना गहरा है.....चाहे फिर वह ईश्वर से हो या इंसान से,या फिर किसी जानवर से पक्षी से कोई फर्क नहीं पड़ता ,प्रेम की कोई सीमा नहीं असीमित प्रेम किसी से भी हो क्या फर्क पड़ता है....प्रेम स्वयं में ईश्वर या यूँ कहें प्रेम ही ईश्वर है.... सच कहें तो प्रेम खुदा है , ज्यादा होने पर प्रेम बिना बंधन के बंधा है , एक डोर में गुंथा है.....कम हो तो दुआ है , और कमोबेश हो तो जिंदगी को समझने की दवा है , सच कहे तो प्रेम एक ऐसी हवा है , जिसकी जद में सारा आलम है , प्रेम ऐसा सागर है जिसमें हर कोई डूबना चाहता है.... प्रेम कोई भाव नहीं, ना कोई राग है, प्रेम कोई इच्छा नहीं, ना ही कोई तृष्णा है , प्रेम कोई रूप नहीं, ना ही कोई पहचान है , क्योंकि प्रेम सब कुछ है , और कहें तो प्रेम कुछ नहीं , प्रेम निराकार होता हुआ भी साकार है द्वैत होते हुए भी अद्वैत है.... प्रेम एहसासों की भावनाओं गुंथी ही माला है जिसको समर्पण के धागे में पिरोया है...प्रेम दो शरीरों का नहीं रूह का मिलन है प्रेम वो तप है जो इसमें जितना तपता है उतना ही पार जाता है....मूक प्रेम बहुत वाचाल है....सच प्रेम तो प्रेम है अखण्ड अलौकिक अद्भुत अन्नत 💕

शनिवार, 17 जून 2023

संवाद

सुनो.....
तुम हमेशा कहते हो कि
मै अक्सर चुप ही रहती हूं...
पर ऐसा नहीं है....

मै....
बोलती तो सबसे हूँ
पर तुमसे नही बोलती 

क्योंकि तुम पढ़ लेते हो
मेरी कही अनकही बातें 

और 
मुझे
मेरी आंखों को
मेरे मौन को...
तुम...समझ जाते हो 
उस खामोशी को..
जिन्हें मैं..
नहीं बांध सकती शब्दों में...

यही तो वो बात है
जो लाती है
मुझे
तुम्हारे और करीब
और पाना चाहती हूं
सनिंध्य तुम्हरा ....

मेरी चुप्पी को तुम पिरो देते हो
अपने शब्दों की माला में 
कर देते हो साकार मेरे
हर अनकहे भावों को

और आनंदित हो उठती हूँ मै
ये सोचकर
कि
तुम अकेले ऐसे हो मेरी दुनिया मे
जो जानते हो
मेरी अनकही भी....

शुक्रवार, 12 मई 2023

जीवन मंत्र by ankur

जीवन में कुछ रोड़े है
बहुत नहीं बस थोड़े है
तुमको आगे बढ़ते जाना है
इनको खुद ही हट जाना है
इनसे यदि तुम घबराओगे
तो मिट्टी में मिल जाओगे।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
       अंकुर गुप्ता

गुरुवार, 2 मार्च 2023

सफर

सुना था ....
 "सफर"  हमेशा सुहाना होता है...
पर वो...

 कैसा "सफर" था  जो....
 मैं आज तक "सफर" कर रही हूँ
एक "सफर" से दूसरे "सफर" का  "सफर"  
ऐसा "सफर" होता है जो मैं ही नहीं 
वल्कि
स्वंय "सफर" को भी "सफर" तय करना पड़ता है....

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

मैं तन्हा हूं

( मेरे परम् मित्रों... ये केवल एक पोस्ट है...
मैं  शब्द का संबोधन किसी व्यक्ति विशेष या मेरे अपने लिए नहीं है..... धन्यवाद )

 मैं...टूट रही हूँ.. बिखर रही हूँ.. 
आहिस्ता आहिस्ता 
डूब रही हूँ.. और..धीरे धीरे 
खुद ही खुद में विलीन हो रही हूँ..
पर...कहाँ.. और ..क्यों...??
शायद  मुझको भी पता नहीं..
असमंजस में हूं.....
ये ऊँचे ऊँचे मकान..जहाँ चार दीवारी और छत तो है..
पर...घर नहीं
लोग की भीड़ तो बहुत है...
पर....इंसान नहीं
रिश्ते और उनके नाम बहुत हैं...
पर...अपना कोई नहीं
औरत भी है आदमी भी हैं..
पर...माँ-पिता  नहीं 
खाना पानी..सब कुछ तो है..
पर...भोजन का स्वाद नहीं
सब कुछ तो है... ऐसो आराम का सामान..
हर चीज मुहैया है..
पर..फिर भी 
मैं...टूट रही हूँ... बिखर रही हूँ..
समेट नहीं पा रही खुद को..
पर क्यों...
शायद कोई बजह ...
वजह कोई नहीं .....
पर कोई तो वजह होगी...
मुझे भी पता नहीं..

#  नीलम " नीरा "

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

एक पहेली

सूर्य की रक्तिम आभा..
अलसायी सी धूप..
चिड़ियों का मधुर कलरव..
भास करा रही थी एक..
नये उल्लास उमंग से भरे दिन का..
सब कुछ वही ..पर फिर भी नूतन सा...

मैं देखती हूँ एक दिवास्वप्न की तरह..
और रत हो जाती हूं नित्य कलाप में..
लगता है मेरी अंगुली थामें कोई ..
रोज मुझे ले जाता है मेरे गन्तव्य तक...

दिन चढ़ा...सूर्य तपा...
खो जाती हूं दिनभर कहीं ...
चक्रवत मैं ...
दिनभर अपने-आप को खोजती हूं इधर उधर...
और बनी रहती हूं अनबूझ पहेली सी मैं ....

फिर बुनकर ताना बाना सांझ को....
वापस लौट आती हूं मैं ...
सूर्य की लालिमा की तरह...
पक्षियों की तरह अपनी नीढ़  में ...
एक सुकून के साथ ...
चिर आनन्द के साथ ...
और करती हूं पुन: इन्तजार ...
सूर्य की उस रक्तिम आभा का...
जो फिर से एक नया सवेरा...
नया उल्लास लिए...
मेरी अंगुली थामने फिर आयेगा....

शनिवार, 28 जनवरी 2023

कुनकुनी धूप



वक्त कब और कैसे आगे खिसकता जाता है कुछ पता नहीं चलता ....आज से ठीक 20 साल पहले बिलकुल ऐसी ही सर्द सुबह ....हर तरफ चांदनी सी बिखरी जिधर तक निगाह जाती बर्फ ही बर्फ .... पहाड़ों में ऐसा ही होता है सर्दियों में दिनभर ठीक ठाक मौसम और सुबह उठो तो बर्फ की सफेद चादर.... हल्की ठिठुरन तो थी ही.....पर सूरज अपनी ड्यूटी पर मुस्कुराता हुआ आ गया...
   सूरज की वो गुलाबी  पीली सोने जैसी किरने  उस बर्फ पर पड़ अलग ही तरह से चमक रही थी.... उस सर्दी में भी सुकून दे रही थी...
     मैं अपनी बालकनी में बैठी उस  सर्दीली सुबह में कुनकुनी धूप का आनंद ले रही थी.... बहुत सुकून भरा था वो पल.... जैसे मेरे मन और मौसम का सही तालमेल था.... आंखें बन्द किए सोचने लगी...काश सब कुछ इतना ही सुनहरा होता ....ये तपता सूरज यूं ही माध्यम होता... ताप तो देता पर सुकून भरा... 
       सच कहूं ... पर ऐसा होता कहां है ... जो हम सोचते हैं.... पर यदि कुछ मन चाहा मिल भी जाए तो ... हमें सब्र कहां होता है...हम भूल जाते हैं उसकी कीमत....
        यही तो हुआ था पूर्वी के साथ ... पूर्वी मेरे घर के पास ही रहती थी हम उम्र थे ....एक साथ खेलते एक साथ बतियाते...
 बचपन के स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ साथ पढ़े ....मेरी अच्छी दोस्त थी ... हर बात मुझसे साझा करना उसकी आदत में शुमार था... कॉलेज क्या घर में भी कुछ बात हो वो तुरंत ही मुझसे साझा करती....
 घर पर पहले मां और बाबूजी की खुसुर फुसुर..... फिर खुले आम हमारी शादी की चर्चा होने लगी...
 पर वक्त के साथ तो चलना ही पड़ता है... फिर मां और बाबू जी को अपनी जिम्मेदारी पूरी भी करनी थी....हमारे दोनो के लिए उचित जीवन साथी की तलाश होने लगी...मेरी शादी जैसे ही तय हुई पूर्वी खुश तो बहुत थी पर उदास भी थी...हमारा साथ जो छूटने वाला था...  
लेकिन पूर्वी के लिए अभी जीवन साथी की तलाश जारी थी...एक दिन मुझे पता चला कि... पूर्वी ने 
 अपने ही सहकर्मी विपुल  का परिचय अपने घर पर करवाया... 
उसके घर वालों के लिए ये बात बहुत चौंकाने वाली थी...
 ये मेरे लिए कुछ नया तो नहीं था पर अजीब जरूर था ...क्योंकि पूर्वी ने एक बार जब मै मायके आई थी तो विपुल से मिलवाया तो था .....पर कभी ये जिक्र नहीं किया कि वो उसको अपना जीवन साथी बनाएगी... 
उसके घर में नाराजगी का माहौल था पर पूर्वी थी कि अपनी जिद्द पर अड़ी रही कि शादी करेगी तो विपुल से.... आखिरकार बच्चों की जिद्द के आगे माता पिता को हारना ही पड़ता है.... वही हुआ अंकल आंटी ने पूर्वी की शादी विपुल से कर दी...
       उस वक्त मुझे बुरा लगा कि उसने इतनी बड़ी बात मुझसे छिपाई ....खैर उसकी जिंदगी का अहम फैसला था ...उसको ही लेना था.... पर अपने मन की कहूं तो मुझे विपुल जरा भी अच्छा नहीं लगा.... देखने भालने में स्मार्ट रंग गेहुआ सधी हुई कद काठी... सब कुछ अच्छा था ... फिर पता नहीं क्यों...वो मुझे सही नहीं लगा.... पर मैं क्या ही बोलती एक लड़की तो आकर्षिक करने के लिए विपुल में सब कुछ था....
     खैर पूर्वी की शादी हुई... मैं उसकी शादी में आ ना सकी....
वक्त बीतता गया ...  मैं भी अपनी  गृहस्थी में व्यस्त हो गई... और पूर्वी भी... जब भी मैं मायके जाती उसके घर जरूर जाती ...उसके समाचार मिल जाते....अब धीरे धीरे समय बीतता गया.... जिम्मेदारियां बढ़ती गईं ... और मेरा मायके जाना कम हो गया....
        पर एक बात मुझे हमेशा कचोटती कि पूर्वी जब भी बात करती उधर की ही बात करती ... घर परिवार की बात होती तो टालमटोल कर बात का रुख बदल देती.... धीरे धीरे मेरी और पूर्वी की बातचीत का सिलसिला भी कम हो चला... जब भी कभी हम मिलते तो मायके में ही मिलते .... और घर गृहस्थी में रमते हुए समय के साथ मायके आना ही कम हो गया... मायके में रुकना तो अब हो ही नही पाता....कभी बच्चों के एग्जाम कभी टेस्ट... बस यूं कहूं कि जिन्दगी अपने ढर्रे पर चल रही थी... बचपन की बातें बचपन के सपने सब सपने हो गए थे....अपने लिए तो वक्त अब चुराना पड़ता है... तब भी बमुश्किल वक्त मिलता है....
        इस बार भतीजे की शादी  गई तब पता चला पूर्वी भी आई है.... मैं उससे मिलने गई...
    उसने मुझे देखा झट से गले लगा लिया... और बहुत देर तक  यूं ही मुझसे चिपकी रही... मैने ही कहा..... अरे पूर्वी अब छोड़ तो...तुझे देख तो लूं... हम दोनों की आंखों में आसूं थे... अपने को संयत कर मै बोली पूर्वी ये क्या हाल बना रखा है...हमेशा टिपटॉप रहने वाली और मुझे भी टोकने वाली ... और अक्सर मेरी ड्रेस को ये कहकर बदलवाने वाली की तुझे तो कपड़ों की मैचिंग की भी अकल नहीं है.... फिर तूने अपना क्या हाल बना रखा है.... ना ठीक से बिंदी , ना हाथ में चूड़ी बस एक कड़ा डाल रखा है...
     उससे मिलने के बाद  मैं   अपने घर आ गई बेमनी सी...
पर मैं रातभर सो नहीं पाई....
      एक बात तो थी इस बार जब पूर्वी मिली  कुछ उखड़ी उखड़ी थी ... मेरे बहुत पूछने पर भी बात टाल दी.... विपुल के बारे में पूछने पर...धीरे से बोली ...ठीक हैं.... मुझे  अपने अंदर कुछ खटका तो पर मैंने नजरंदाज कर दिया....
        एक बार जब मै फिर करीब दो साल पहले  मायके गई तब उड़ती हुई खबर सुनी कि पूर्वी अब अकेली ही रहती है.... एक धक्का सा लगा...  आंखें नम हुईं ... सोचा पूर्वी को कॉल करूं...  पर पूछूंगी क्या.... आख़िर उसकी जिंदगी है.... फिर मन में सवाल उठा मेरी सहेली है पूछ सकती हूं.... इसी तरह स्वयं से ही तर्क वितर्क करते हुए.... एक दिन मैने पूर्वी को कॉल कर ही दिया....
      पूर्वी अपने को संयत करती रही... और बोलती रही... फिर मैंने ही विपुल की बात छेड़ी तो.... पहले वो टालमटोल करती रही..... पर मैंने भी ठान लिया था कि.... सच तो मुझे जानना ही है ......जो कभी मुझसे अपने घर की एक एक बात बताती थी वो आज कैसे कोई बात छुपा सकती है....मेरे कुछ कुरेदने पर आखिर उसके सब्र का बांध टूट ही गया...
 वो अपने को रोक नहीं पाई और फूट फूट कर रोने लगी.... 
      कुछ पल मै शांत रही ... सोचा पता नहीं कितने दिन का गुब्बार मन में दबाए बैठी है निकल जाने दो.... फिर कुछ देर बाद वो खुद ही अपने को संयमित करने के बाद बोली.... पीहू तू सच कहती थी  कि.... विपुल से शादी करने में जल्दी मत कर..... पर उस वक्त मैं तो दीवानी थी....किसी की नहीं सुनी... विपुल मेरी जिद्द था..
  शादी हुई  शुरू के कुछ महीने हंसी खुशी बीते ....कुछ समय सब कुछ सही चला...... फिर विपुल अपने रंग में आने लगे...  उनके लिए लड़कियां ही  जरूरी थी... मै तो सिर्फ़ घर और बच्चों की देखभाल के लिए ही.... मैने देखा विपुल को समझाया और कई बार उसकी हरकतों को अनदेखा किया..... पर... हर बार यही कहते अब नहीं करूंगा... और मै बेबकुफ हर बार विश्वास कर उनको माफ करती ... शायद अब सुधर जाए..... पर यही मेरी गलतफहमी थी.....आख़िर कहती भी तो किससे ...वो मेरी पसंद थे और मेरी ही जिद्द....           वक्त गुजरता ही गया....बच्चे बड़े हो रहे थे....कुछ समाज और कुछ बच्चों की खातिर सब चुपचाप सहती रही.... अब मैंने भी मान लिया था कि विपुल से कुछ कहना मतलब दीवार से सिर मारना... सब कुछ यंत्र वत चल रहा था... एक दिन विपुल अपनी एक सहकर्मी को ले आए और बोले ये कुछ दिन हमारे साथ रहेगी.... मै चुप थी एक ही बात मुझे विपुल से जोड़े हुए थी कि वो बच्चों का ध्यान रखते लेकिन मुझसे मतलब नहीं रखते...
मेरे लिए इतना ही काफी था आख़िर मेरे बच्चों को पिता का प्यार तो मिल ही रहा है..... परन्तु एक दिन मैंने विपुल को रंगे हाथों पकड़ लिया.... और उसी दिन अपना सामान बांध कर घर से आ गई...
    मायके तो जा नहीं सकती थी क्योंकि मां बाबू जी तो अब रहे नहीं...कुछ दिन अपनी मौसी के घर रही ... फिर एक स्कूल में बार्डन की जॉब का विज्ञापन देखा ...बस फार्म भर दिया... रहने की सुविधा थी मैं वहीं बच्चों को लेकर रहने लगी....
       मेरी रुकी हुई जिंदगी जैसे वक्त के साथ कदम ताल मिलाने लगी...एक बेटी की शादी की कर दी यहीं स्कूल में एक मेम हैं उनका बेटा इंजीनियर है उससे...दूसरी की भी हो ही जाएगी....
     फिर मैंने बातों ही बातों में पूछ लिया विपुल शादी में आए थे बोली.... हां केवल कन्यादान की रस्म निभाने....
    सच कहूं पीहू...विपुल को मैंने इतनी शिद्दत से चाहा था ...तभी उनकी माफ करने वाली और ना माफ करने वाली सारी गलतियां माफ़ की... पर वो शायद मेरे नसीब में नहीं थे... पीहू जिन्दगी बहुत डगमगाई पर... मै संभल गई.... जिन्दगी ने मुझे कदम दर कदम कठिन से कठिन इम्तेहान लिए .... पर मैं गिरी नहीं वल्कि मजबूत से मजबूत होती गई...
 आज मैं बहुत खुश हूं...सच कहूं आज तुझे बात कर मन का सारा गुब्बार निकल गया.... बहुत हल्का सा लग रहा है....
    मुझे भी पता नहीं चला उससे बातें करते हुए कब मेरी आंखे उसके साथ सरीक हो गईं....
 फिर पूर्वी ही बोली ...अच्छा पीहू कुछ बच्चे आए हैं उनको पढ़ा लूं ...मेरा खाली वक्त भी कट जाता है... फिर कॉल करूंगी....मैने बस इतना ही कहा पूर्वी अपना ध्यान रखना...
        आज मुझे लगा सच में सूरज की वो गुलाबी पीली सी सोने जैसी किरने.... उस बर्फ पर पड़ कर बिलकुल पहले की तरह चमक रही है....
जैसे ही मैंने आंखे खोली...मुझे लगा ठिठुरती ठंड में वो कुनकुनी धूप  मुझे सहला कर अपनी गर्माहट का सुकून भरा अहसास करा रही है.... मैं मंद मुस्कान के साथ आंखे खोल कर उठ जाती हूं...अपनी दिनचर्या की शुरुआत करने.....

# नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

अनजाना सफर

अनजाना सफर

तुमसे होकर गुजरी है हर बात मेरी ...
फिर भी महफिल में कुछ यूं मुस्कुराते हो...
जैसे जानते नहीं ....
हर कमी को मेरी यूं छिपा जाते हो....
जैसे देखा ही नहीं .....
हर नाकामी पर मेरी यूं ढांढस बंधाते हो....
जैसे कुछ हुआ ही नहीं .....
आँख के मेरी आँसू यूं इस तरह पोछते हो.....
जैसे तिनका-तिनका गिरा हो.....
बात जब भी किसी की चुभी हो मुझे .....
कुछ इस तरह युं समझाते हो....
जैसे हम उम्र सखी हो मेरी.....
उलझ जाती हूं जब भी किसी उलझन में .....
पास बैठ कुछ यूं बहलाते हो ....
जैसे माँ हो मेरी ....
जब भी महसूस करती हूं उदासियों को अपने करीब.....
तुम दूर होकर भी पास आ जाते हो...
बन प्रियतम स्नेह जताते हो....
कहाँ कहाँ ...क्या क्या कहूं तेरे बारे में ...
जब भी पड़ती हूं अकेली मैं...
संग मेरे खड़े हो एक और एक ग्यारह बन जाते हो...
सच कहूं....
थकती नहीं कलम मेरी ....अल्फाजों की खलती है कमी  मुझको....
हर एक पन्ना कोरा है पर... उसमें लिखा भी तेरा नाम ही है 
तू धड़कन है मेरे दिल की...सांसों की गरमी है.....
बसती है मेरे रग -रग में ...
नाता नहीं तेरा मुझसे ज्यादा पुराना...
पर लगता है बांधा है तूने मुझे जन्म जन्मान्तर से....
मानती हूं कोई नाम नहीं इस रिश्ते का...
पर बेनाम रिश्ते में रंगने लगी हूं खुद को....

******************************
** कौन कहता है बरसों की पहचान बनाती है दोस्ती ....
दोस्ती तो जब दिल मिल जाएं तब हो जाती  है...**

#  नीलम " नीरा "

सोमवार, 23 जनवरी 2023

तुम्हारा मौन

तुम्हारा मौन

सच
तुम्हारा मौन....सर्द. व बर्फीली  हवाओं सा चीरता....
अंदर तक झकझोरता है...
पर ये मौन कोई साधारण सा मौन नहीं  .......
ये मौन उसका मौन था.....
शायद मैं समझ नहीं पायी  उसके मौन का मतलब.......
पर वो इस बात से नाबाफिक है....
कि उसका मौन आहत कर जाता है...मेरे अन्तर्मन को ...
. मैं स्वयं से ही प्रश्न उत्तर करती 
 और स्वयं ही अन्तर्द्वन्द्व को झेलती हूं....
पर शायद...
 तुम मौन को ढाल बना कर बचना चाहते  हो...
और मैं जानबूझ कर फिर फिर इन्तजार करती हूं....
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे प्रहार का.....
पता नहीं क्यों तुम अनजान बन
सब कुछ तिरोहित करते हो
खामोशी से....
मौन रहकर....
....................

शायद वक्त के साथ अब मैं समझने लगी हूं 
और 
अब स्वीकारती हूं तुम्हारा मौन....
सिर्फ इसलिए ...
कि ये मौन..तुम्हारा है...
तुम से होकर आया है.....
 तुम्हारी हर वो चीज मुझे पसन्द है....
जो तुम से होकर गुजरती है....
इसलिए मै तुम्हारे मौन को......
स्वीकारती हूं.....
समर्पित भाव से......
पूर्णसमर्पित...भाव....से....

#  नीलम गुप्ता. " नीरा "

पुरूष



अकसर सुना जाता है .....और ....जाता रहा है..... और.... शायद सुना जाता रहेगा... कि वो पुरूष है कठोर तो होगा ही... सब कुछ संभाल लेगा... हर बडी से बड़ी और छोटी से छोटी जिम्मेदारियों से लाद दिया जाता है उसका कंधा... और बना दिया है सुकुमार से कठोर....
       सच कहूं तो पुरूष कठोर नहीं होता बल्कि उसे बना दिया जाता है.... अमूमन देखा जाए तो बचपन से किशोर और किशोर से युवा और प्रोढ़ावस्था तक उसे सिर्फ और सिर्फ दायित्व ही मिलता है...प्रेम तो मिलता ही नहीं... यदि प्रेम मिलता भी है तो दायित्व की चाशनी में लिपटा हुआ....
         जबकि पुरूष के दिल में भी होते हैं सुकोमल भाव सुमधुर अहसास... धड़कता है उसका भी दिल... टूटता और बिखरता है वो भी.... चाहता है वो भी एक सुकोमल कंधा जहां खो सके वो स्वयं को... जुड़ जाए वो एक अहसास से .... वो भी संजोता है सपने ...देखता है ख्वाब....
   पर सारे भाव खो से जाते हैं कहीं... विलीन हो जाते हैं अंतर्मन के उदगार... कभी दायित्वों का वास्ता देकर तो कभी जिम्मेदारियों को गिना कर ....और बना देते हैं पुरुष को गंभीर पुरूष... अश्रु विहीन आंखों का मालिक 
         पर एक बात अक्षरत: ये भी सच है पुरुष को समर्पित भाव से  प्रेम करने वाली स्त्री जानती है....
पुरूष अथाह प्यार सरलता कोमलता का कोष होता है...बिलकुल निर्मल जल का अथाह सागर सा....
ऐसी स्त्री के आगोश मे वह पिघलता है रो तक लेता है...
खोल देता है अपनी जिन्दगी की किताब के हर पन्ने को... 
        सच पुरूष कठोर नहीं होता वो भी जीना चाहता है उन्मुक्त प्रेम में गोते लगाना चाहता है...प्रेम के अथाह समुद्र में  डूबकर जीना चाहता है...

# नीलम गुप्ता "नीरा"