ये स्त्री है जनाब...
बिखर बिखर कर निखरती है...
टूट टूट कर सबको जोड़ती है...
मुँह में पल्लू का कोना ठूसे...
मौन आँखों से बोलती है...
ये स्त्री है जनाब...
पीड़ा में भी मुस्कुराती है
मौन हर दंश झेलती पर ...
अपने चीत्कार को खुद ही सुनती
कोरों की नमी में भी मुस्कुराती
ये स्त्री है जनाब....
ये वो नेह का धागा है
जो पिरोती रिश्तों को
कैसे कह दूँ साहब
ये कोमल सी छुई मुई
नार नवेली कमतर है किसी से...
तभी तो कहा....
ये स्त्री है जनाब....