स्वार्थ के लिए अपने
मानव ने देखे कितने सपने
मानव अपने कितने सपने सच करता है
जंगलों का विनाश करता है
अपने ही नाश के दिनों को और पास करता है/
मानव ने देखे कितने सपने
मानव अपने कितने सपने सच करता है
जंगलों का विनाश करता है
अपने ही नाश के दिनों को और पास करता है/
जंगल को काट रहा है
विनाश की चिट्ठी ,बांट रहा है
विग्यान के दौर में,विकाश की दौड़ में
सब कुछ जान रहा है
विनाश के पथ पर भाग रहा है/
विनाश की चिट्ठी ,बांट रहा है
विग्यान के दौर में,विकाश की दौड़ में
सब कुछ जान रहा है
विनाश के पथ पर भाग रहा है/
विकाश के नाम में
विग्यान के पैगाम में
सोचा था
फस्ट आऊँगा मैं
पर
फेल हो गया इक्जाम में///
विग्यान के पैगाम में
सोचा था
फस्ट आऊँगा मैं
पर
फेल हो गया इक्जाम में///
राजन विघार्थी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें