प्रेम
प्रेम अनन्त है
वही प्रेम सूक्ष्म है
प्रेम धरा है
तो वही प्रेम आकाश है
प्रेम प्रतीक्षा है...
प्रेम कोरो की नमी तो....
वहीं प्रेम स्निग्ध मुस्कान है..
ओस की बूँदों सा
सूर्य की पहली किरन सा प्रेम
सच अपरिभाषित सा प्रेम....
जरूरत कहाँ है... प्रेम को शब्द की
किसी अभिव्यक्ति की .....
प्रेम अनन्त विस्तार है
कहाँ है प्रेम की सीमा .....
प्रेम अंतर्मन का अनन्त अहसास
जिसे पढ़ा नही जाता
शब्दों के मोती में गूँथ कर
माला नहीं बनाई जा सकती
व्यक्त नहीं किया जाता
शब्दों की परिधि से परे प्रेम
एक अनगढ़ सा अहसास प्रेम
बन्द आँखों में सिमटा प्रेम
रूह से रूह में समाया हुआ
अव्यक्त सा... प्रेम
मेरा ही प्रेम है...
और
मैं प्रेममय प्रेमी हूँ....
डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"
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