आज बरसों बाद भी
तुमको पढ़ रही हूं....
सोचती हूं कभी इस तरह मिले थे हम
शायद हर रोज ही...
जब भी मैने पुकारा तुम हमेशा
मेरे साथ थे....
ना वादे ना कसमें ...
पर हर रोज मेरी शिकवे शिकायतें...
तुम सुनते फिर हौले से मुस्कुराते
जैसे मेरी सारी उलझनों को सुलझाने का
दारोमदार तुम पर हो...
और मैं बेफिक्र सी...
कभी मां बन जाते तो कभी पिता
तो कभी बड़ा या छोटा भाई
तो कभी सखा तो कभी सहेली...
और .... मैं हर मसले का हल
तुम मै ढूढती...जैसे तुम
कोई अलाउद्दीन का चिराग हो...
सच कहूं तो ...
तुम मेरे लिए चिराग ही तो थे...
ना कोई इजहार था ना इकरार
ना तुम्हारी कोई चाहत थी
ना मेरी...बस एक अलबेला रिश्ता
पर कोई तो नेह डोर से बंधे थे हम...
तभी तो तुम ....
आज भी मेरे उतने ही करीब हो
जितने तब....
मिलने ना मिलने का सवाल ही कहां था
तुम मुझे पढ़ते गए और मैं तुमको लिखती गई...
पर आज.... बरसों बाद
हर रोज पढ़ लेती हूं तुम्हें...
और बांच लेती हूं ख्यालों में...
तुम आज भी मेरे अलाउद्दीन के चिराग हो
पता नहीं क्या रिश्ता है मेरा
तुमसे.....
प्यार इश्क मोहब्ब्त चाहत का ...
अरे नहीं...
हमारा तो रूहानी रिश्ता है...
जिसका कोई नाम नहीं ...
बेनाम सा... सबसे कोसों दूर
मेरे सखा
# नीलम "नीरा"
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