मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

डाकियाअब कहाँ हैं

 डाकियाअब कहाँ हैं वो डाकिये वाले दिन .... घण्टों इंतजार रहता था....टकटकी बन्धी रहती थी देहरी पर..जरा सी आहट पर कदम चल पड़ते थे...धडकनों का संगीत  सुनाई देने लगता था... गालों पर बेमौसम गुलाल बिखर जाया करता था....नजरों का काजल  अधखिला कमल हो जाया करता था... हर काम बेमानी लगता था उस इंतजार में.... सच...  डाकिये का इंतजार बड़ा ही रूमानी लगता था... कहाँ गए वो डाकिये वाले दिन..

कोई टिप्पणी नहीं: