आज कॉलेज से आते ही मेरी छोटी बिटिया ने मुझे बताया पापा आज अंकल कहीं गए हैं ...मैंने उत्सुकता वश पूछा ...कहाँ गए हैं ...?
तो बिटिया बोली ...ये तो पता नहीं पापा.... पर उनके हाथ में छोटा सूटकेस था मुझसे बोले ...पापा को बोल देना की 2/3 दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ... आकर साथ चाय पियेंगे...
मैंने संक्षिप्त सा.. "अच्छा" कहा ...
और अन्दर आ गया
अंदर आते ही पत्नी की चिरपरिचित आवाज आई ...आ गए आप ...चलिए जल्दी से फ्रेश हो जाइए ...मैं चाय बनाती हूँ... और हाँ ....आज आपकी पसंद के पकौड़े भी बनाये हैं....
और मैं आज्ञाकारी पति की तरह ... पत्नी के कहे अनुसार फ्रेश होकर बाहर बालकनी मैं आकर बैठ गया....
मेरी पत्नी के हाथ की चाय वाकई लाजवाब होती है और पकौड़े के साथ हरे आम की चटनी पुदीने बाली कहना ही क्या....
पर आज जैसे स्वाद कुछ कम ही जमा... कुछ कमी सी खल रही थी..शायद रमेश सर की.... आदत जो हो गयी थी उनकी..... चाय हों साथ में पकौड़े अगर समेश सर ना हों साथ तो स्वाद पूरा नहीं आता...
बस चाय पीते पीते मैं चला गया पुरानी यादों में....
पता ही नहीं चला ये वक्त कैसे बीत गया.… लगा पल ही में गुजर गए ये 10 / 15 साल जैसे कल ही की बात हो....
बात तब की है.... नया नया आया था कालेज में ट्रांसफर होकर... जैसे ही कॉलेज में प्रवेश किया... रमेश सर से मुलाकात हो गयी...
रमेश सर धीर गम्भीर उजले रंग के बड़ी बड़ी आँखों बाले सामान्य कद काठी वाले गजब केआकर्षक व्यक्तित्व के धनी...एक पल तो मैं देखता ही रह गया ...फिर बरबस संस्कार सभ्यता वश हाथ जुड़ गए...
रमेश सर ने चिरपरिचित गम्भीर मुस्कान से जबाब दिया.... फिर बोले .. आप शायद नए आये हैं...
मैंने संक्षिप्त सा... "जी" कहा
फिर सर बोले ...कोई परेशानी हो तो बताइएगा बेझिझक... क्या परिवार भी साथ है...?
मैंने कहा....सर अभी ज्वाइन किया है रामपुर से ट्रांसफर होकर आया हूँ... घर तलाश कर लूँ फिर परिवार लेकर आऊँगा... सर परिवार बिना बहुत परेशानी होती है ...|
सर ने बताया कि वो राजनीतिक विभाग में एच ओ डी हैं .. यहाँ काफी साल से हैं... फिर चलते चलते हल्की फुल्की परिवार और कॉलेज से सम्बंधित बातचीत होती रही ...
फिर वो कुछ पल रुक कर बोले ...अपने घर चलने के लिए आमंत्रित करते हुए बोले......चलिए मेरे घर चलिए वहीँ पर एक एक कप चाय पीते हैं और बिलकुल मेरे पड़ौस में 2 दिन पहले ही एक मकान खाली हुआ है आप देख भी लीजिएगा...अगर आपको पसन्द आये तो....
औपचारिकता वश एक बार मना किया पर फिर सर के साथ उनके घर चल दिया....
सर के घर उनकी पत्नी और 2 प्यारी सी बच्चियां थी ...लगता था बच्चियां कालेज में हैं.... फिर सर ने ही बताया बड़ी बिटिया बीएड करके जॉब की तैयारी कर रही है और छोटी बिटिया ने पोस्ट ग्रेजुएशन में एडमिशन लिया है ...उनकी वाइफ घर पर ही रहती हैं....
चाय के बाद हम मकान देखने गए ...सब कुछ मनमुताबिक था ...सो...तुरन्त मालिक मकान से बात कर 1 महीने का एडवांस दे 4/5 दिन बाद आने की बात बोल ...और सर का दिल से धन्यवाद कर बस में बैठ गया...|
बस में बैठ ....मैं सोचने लगा...बताओ अनजाने शहर में भी कितने अपने से लोग मिल जाते हैं... सच में भगवान सब कुछ सोचकर रखता है...
बस इस तरह थी मेरी और रमेश सर की पहली मुलाकात...
3/ 4 दिन बाद मैं सारा सामान ले पत्नी और दोनों बच्चों को लेकर आ गया...
कुछ दिन व्यस्त रहे ...समान लगाना , नए शहर को समझना , जरूरत का सामान लाना ,बच्चों का एडमिशन आदि...
फिर सब सामान्य रूप से चलने लगा...कुछ लोग परिचित भी हो गए....इन सब के बीच सर ने मेरी यथासंभव मदद की...जिसका आभार मैं आजतक मानता हूँ....
फिर धीरे धीरे शाम की चाय मैं और सर अकसर साथ ही लॉन में बैठ कर पीते... शुरू में तो कुछ संकोच होता पर धीरे धीरे प्रगाढ़ता बढ़ गयी...मैं और सर एक दूसरे से खुलने लगे...
मैं और सर जब भी शाम की चाय पर साथ होते घर परिवार की बातें अपने बचपन और कॉलेज की बातें करते ....
मितव्ययी धीर गम्भीर से दिखने बाले सर कितने सहज सरल और मृदुल स्वभाव के है तभी मुझे पता चला....
सच कहूँ तो अब मुझे एक आदत सी हो गयी है चाय पर उनकी...तभी तो चाय और पकौड़े का स्वाद आज कुछ जम सा नहीं रहा....
मैं चाय का प्याला हाथ में लिए पहुँच गया बीते वक्त में ....उस दिन गरमी में मन को राहत देने वाली हल्की सी बूंदा बाँदी हो रही थी रोजमर्रा की तरह मैं और सर बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे....तभी सामने से हमारे ही कॉलेज का एक विद्यार्थी किसी लड़की के साथ बातें करता हुआ जा रहा था....उस लड़के ने एक झलक हमें देखा फिर बेफिक्र सा चलते बना....
सर ने मेरी तरफ देखा... फिर बोले देखा मनोज जी
सर मुझे ऐसे ही बुलाते थे... आगे वोले आजकल के बच्चों को जरा भी हिचक जरा भी लिहाज नहीं है ...एक हमारा जमाना था...हम तो आज भी पिताजी के आगे बोलते नहीं... पर आज कल बस कुछ कहिये मत....
मुझे लगा शायद सर कहीं खो से गये...मैंने कहा सर क्या हुआ...
तब सर कुछ सोचते हुए ...कहीं दूर पुरानी यादों में चले गए....और बोले मनोज जी ....
हम आठ भाई बहन है पिताजी मिलेट्री में बड़े अफसर ...पर घर में 10 लोग हम और दादी दादा जी सभी का खर्च पढ़ाई इत्यादि... इसी के कारण सामान्य सा जीवन रहा... पिताजी की अच्छी नौकरी के कारण भी कोई ऐशोआराम नहीं था क्योकि एक ही व्यक्ति पर की तनख्वाह पर सभी का गुजारा होता था ...सब कुछ सामान्य
मैं भाई बहनों में बीच का था ...दिमाग अच्छा था पर पढ़ाई में कम ही लगाता था ... बस पासिंग मार्क से कुछ ही ज्यादा आते थे....पर लिखने का बहुत शौक था...
यही कोई 9/ 10 साल का रहा होंगा ... जब से लिखता हूँ....पिताजी ने साइकिल दिला दी थी ...उस जमाने में साइकिल होना मतलब नबाबी होना.... मैं साइकिल ले इधर उधर घूमता और एक दो दिन बाद अपनी कलम से सारी घटना को शब्दों में ढाल देता और फिर पहुँच जाता दैनिक जागरण के ऑफिस..... वहीं अपनी रचना देता और वो उसे छाप देते ...उस जमाने में बहुत अखबार तो होते नहीं थे ... दो /चार ही होते थे...पर दैनिक जागरण सबसे ऊपर..
इसी तरह रचनाएं देते देते वहाँ के एडिटर महोदय से परिचय हो गया ...अब तो जब भी जाता वो तुरन्त मेरी रचना छपने को दे देते...
अब ये बात तो छिपने बाली नहीं थी...पिताजी अखबार पढ़ते..और मेरी रचना पढ़ते ....साथ ही डाक से आई पेपर की एक प्रति देखते और... मुझ पर गुस्सा करते...हमेशा यही कहते फालतू दिमाग मत लगाओ पढ़ा करो...काम आएगा
पर मैं कहाँ मानने वाला..हर 2/3 दिन बाद फिर पहुँच जाता दैनिक जागरण के ऑफिस रचना लेकर...यही क्रम चलता रहा... बहुत सालों तक
इन्ही सब के बीच एक दिन एक घटना हुई एक दिन मेरी साइकिल किसी से टकरा गई ...मैं बहुत घबराया कि अब तो कोई खैर नहीं.... इसी उधेड़बुन में भागने ही वाला था कि... सामने से आवाज आई कोई बात नहीं ..पर तुम लिखते बहुत अच्छा हो... आशा के विपरीत ...मैं चौंका...बस फिर क्या था ज्यों ही नजरें उठा कर देखा तो उठी ही रह गयीं...तो बस थम गई सांसे ...
2 चुटिया बनाये वो बड़े फूलों बाला पिंक सूट पहने ... गेहुएं रंग की बोलती सी आँखों वाली सामने लड़की खड़ी थी ...5 मिनट हम दोनों सारी घटना ही भूल गए...
फिर जैसे होश आया मैं साइकिल सम्भालते जो भागा कह नहीं सकता...और वो मुस्कुरा रही थी....मुझे आज भी याद है...
सच और फिर 2 दिन घर से निकला ही नहीं... तीसरे दिन जब निकला तक शायद उम्र की उस दहलीज का तकाजा कहूँ या कसूर आँखे उसे ही ढूंढ रही थी...
अब निगाह रास्ते पर कम और इधर उधर ज्यादा थी...
एक दिन वो सामने पड़ गयी ....बस कुछ दिनतक मुस्कुराहटों के आदान प्रदान का सिलसिला चलता रहा...
फिर एक दिन उसने ही इशारे से साइकिल रुकवाई ...मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी ...बस महीनों बाद हल्की फुल्की बातचीत चलती रही ...और फिर नाम का आदान प्रदान स्कूल और फिर हम साथ ही कॉलेज में... धीरे धीरे
मुलाकात अब साथ निभाने तक आ गयी थी...
पर सब वक्त मनमाफिक तो चलता नहीं... कॉलेज से निकले तो नौकरी की तलाश...3 /4 साल उसी में लग गए...लेकिन पिताजी के आगे सर उठाने की हिम्मत नहीं हुई...
अब कॉलेज नहीं और नौकरी की तलाश ...तब धीरे धीरे मुलाकातों का सिलसिला कम हो गया ..जब भी मिलती वो बड़े ही आग्रह और अनुनय से कहती ....मैं रह नही पाऊंगी तुम्हारे बगैर... मैं निरुत्तरित सा... उसके सामने बेबस देखता उसको पर...बोलता कुछ भी नहीं....फिर पिता जी का भय...पिताजी क्या उस वक्त तो बड़े भाई के सामने भी हिम्मत नही होती थी.....
सच बोलूँ तो आज शायद मैं स्वयं को कायर ही कहूँगा....पर क्या करता...आज की तरह जमाना तो नहीं था तब...अपने बड़ो के सामने मुँह खोलने का...
और मैं मन मसोस कर रह गया उस वक्त .... जिसका मलाल आज भी है मुझे .... ना चाहकर भी पीछे हट गया...समझ सकते हो उस पीड़ा को... मेरी लाचारी को....
बस फिर उसके 3/4 साल बाद कॉलेज में जॉब लगी...बड़े भाई की शादी हुई ...फिर मेरा नम्बर आया... फिर यादों ने हिलोरें मारी...एक बार फिर प्रयास किया पर तब तक वक्त हाथ से निकल चुका था...आखिर कब तक कोई इंतजार करता ...और शायद ....क्यों ही करता...जब सामने वाला समझ रहा हो कि...उसके लिए कोई लड़ेगा नहीं... आखिर हिम्मत जुटाने के लिए भी तो हिम्मत ही चाहिए...
बस फिर पिताजी के एक रिश्तेदार ने अपनी पहचान की एम ए पास अपनी पसंद की लड़की से शादी कर दी....
करता भी क्या मेरे पास कोई चारा नहीं था या कहूँ हिम्मत नहीं थी ... और पिताजी का हुक्म जो सर आँखों पर रखना था... फिर समाज परिवार की मान्यताएं निभाते वक्त के साथ 2 बच्चियों का पिता बन गया...
परिवार की जिम्मेदारी निभाते आज यहाँ तक आ गया और वो सिर्फ नाम की एम ए पास मेरे साथ कभी कदमताल ही ना मिला पायीं .... मैं इनमें ..उसको खोजता रहा और ये रूढ़िवाद से जकड़ी रही....
सर लगातार बोले जा रहे थे....और मैं उन्हें एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह सुने जा रहा था ...
सर बोले सच में मनोज जी ... पुरानी यादें कभी खत्म नहीं होतीं.... वक्त के साथ हल्की सी धुंधली भले ही हो जाएं.. पर
यादें कभी नहीं भुलायी जाती हमेशा हमारे अंदर जिंदा रहती है लोगों को लगता है कि.... हम अपना बिता हुआ भूल गए पर हम भूलते कभी नहीं...
सच कहूँ तो.....वो यादें ना दफनाई जाती है ना जलाई जाती है
बस गीली लकड़ी की तरह सुलगती रहती है अंदर ही अंदर
और अंततः बन जाती है राख में दबी चिंगारी की तरह
लोगो को लगता है कि आग बुझ गयी पर असल में वो बुझती नहीं राख में दबी चिंगारी सुलगती रहती है...
सर बेपरवाह से बोले जा रहे थे ...लग रहा था आज बहुत कुछ पिघल रहा है उनके अंदर.... हम दोनों की आँखे नम थी....
तन्द्रा तब टूटी जब सर की वाइफ बोली मैं मन्दिर जा रही हूँ... मैंने बहुत कम ही उनको बोलते सुना है...मैंने
तभी अंदर से पत्नी की आवाज आई ...कहाँ खो गए अंधेरा हो गया... बच्चे जिद्द कर रहे हैं चलिए बाजार होकर आते हैं... कुछ सामान भी लाना है....
सच में अंधेरा हो गया था ...मैं अनमने मन से उठा...बाजार जाने के लिए ..क्योकि छोटी बिटिया तैयार खड़ी थी....
सोच रहा था...कि जिन्दगी भी क्या है... कब किस मोड़ पर जिन्दगी बदल दे कुछ नहीं कह सकते...वक्त है....कि अपनी ही चाल से चलता है.... और हम इच्छाओं उम्मीदों का गला दबाते चलते जाते हैं वक्त के साथ...उसको नियति मान....क्योंकि हमारे पास इसके सिवा कोई और रास्ता भी तो नहीं होता.....
# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
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