सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

हार की जीत




 
       काली अंधेरी रात .....खुला आसमान और तारे टिमटिमा रहे हैं बेफिक्र से... हर तरफ सन्नाटा.... हो भी क्यों ना ........लोग दिन भर की थकान से थक कर सो जो गए ..... भला रात के 2:00 बजे वैसे भी कौन जागता है.....।
    पर मेरी नींद मुझ से कोसों दूर ......सच कहूं तो ......अब तो रात भर जागने की एक आदत सी हो गई थी...... एक नियम सा बन गया था ......पर आज कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही थी .......
इसी कारण मैं उठकर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई....... दूर तलक फैला सन्नाटा और अंधेरा .......और ......उस स्याह अंधेरे में कुछ खोजती सी.....मेरी आंखें 
        पहुंच गई आज से 20 वर्ष पहले जब ना अंधेरा था और ना ही सन्नाटा.... हर तरफ चहकता सा मधुर संगीत था....
          तब मैं 20 वर्ष की थी... जब लाल सुर्ख रंग का लहंगा पहने , भरे हाथ चूड़ियों के ....मांग में चटक सिंदूर लगाएं.... दुल्हन बन अपने बांके सजीले सपनों के राजकुमार के साथ इस घर में आई थी..... तब गूंज रहा था पूरा घर मेरी पायल की  झंकार से .....उस वक्त मुझे खुद से ही रश्क हो रहा था .....इतना स्मार्ट गोरा और सधी हुई कद - काठी का हमसफर पाकर ....।   तब मैं ही तो थी दुनिया की सबसे भाग्यशाली  युवती ......
      सभी कुछ सामान्य से बेहतर चल रहा था ....और चाहिए भी क्या एक युवती को प्यार करने वाला  .....उसकी हर ख्वाहिश को हाथों हाथ लेने वाला पति.... दिन तो मानो पंख लगा कर उड़ रहे थे ...
       पर हम तो इंसान हैं ना..... कब तक उड़ते पंख लगा कर.... यथार्थ को तो जीना ही पड़ता है... हर वक्त एक सा नहीं रहता....परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.... कभी तो नया भी पुराना होता है.... कलई तो उतरती ही है ना.....
          सच ही तो है वक्त कहां रुकता है .....और अच्छा वक्त तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है.... शादी को यही कोई सात - आठ  महीने ही बीते होंगे ......एक दिन घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे...…बातों ही बातों में उन्होंने मेरी सुघड़ता और सुंदरता के पुल बांधने शुरू कर कर दिए .....मेरे साथी के चेहरे पर अनेकों रंग आते जाते रहे..... बात आई गई हो गई उस वक्त तो.....
       पर रात को जैसे ही सारी कलई खुल गई...... लगा जैसे किसी परी के पंख काट कर उसे जमीन पर बेरहमी से पटक दिया हो .....तभी यथार्थ से सामना हुआ दरवाजा खोला तो देखा..... नशे में धुत मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा था वमुश्किल उसे अंदर कर दरवाजा बंद किया तो .....उन्होंने गाली और न जाने क्या-क्या बोलना शुरु कर दिया ......ये सब मेरे लिए इतना अप्रत्याशित था जैसे किसी ने मेरे कानों में तो जैसे गरम शीशा उड़ेल दिया हो..... कुछ भी समझ में नहीं आया..... मैने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी..... मैं कुछ समझ पाती या कुछ बोल पाती.... उससे पहले ही एक मजबूत हाथ मेरे गाल पर पड़ा.... मैंने अपने आप को गिरते गिरते बचाया.... मैं कुछ माजरा  समझ पाती उससे पहले ही वह बिस्तर पर गिर कर सो गए .....और मैं भी पता नहीं गीली आंखों से नींद में समा गई...।
     सुबह उठी तो सब कुछ सामान्य था अपने पास बुला कर बोले..... यार कल कुछ दोस्तों के साथ ज्यादा हो गई थी और पता नहीं तुम्हें क्या - क्या बोल दिया....सच में सॉरी यार सॉरी....
     आखिर मैं तो स्त्री ही हूं भूल गई रात की बात को .....कर लिया उनकी बात पर विश्वास ....।   पर यह क्या अब तो आए दिन यह क्रम सा बन गया .....रात को नशे में धुत और सुबह माफी का नाटक ....।             शादी को भी  साल भर से ज्यादा हो गया था..... कहो तो किससे कहूं ..... मायके में बुजुर्ग मां पिताजी और भाई की अपनी  गृहस्थी ... गरम खून 
मैं चुपचाप सब सहती रही .....पर समझ ही नहीं पाती कि .....जो आदमी दिन में इतना लाड़ प्यार जताता है ....रात में हैवानियत कहां से आती है....।
     बस  इसी चक्र के चलते मैं दो बेटों की मां बन गई .....शायद इसी उम्मीद से कि कभी तो यह सुधरेंगे ही..... हो सकता है बेटों का मुंह देख कर ही यह सुधर जाए.....पर हालात और भी बदतर होते गए..... मैं स्वयं से और यथार्थ से  लड़ती रही लगता था..... जितना उजला मेरा रंग था उतनी ही काली मेरी किस्मत....।
         धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं भी मशीन सी बन गई ...। एक लगाव था.... वह भी तार-तार हो गया .....मैंने अपना समय अपने बच्चों को देना शुरू कर दिया ....।
   पर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था.... एक दिन पता चला मेरे पति की दोनों किडनी की हालत नशे के कारण बहुत खराब है .....पर आखिर पत्नी ही हूं ना ....मन से ना सही बेमन से ही उनके जीवन की दुआ मांगने लगी और उनकी जी जान से सेवा करती ......बदले में दुत्कार और गालियों के सिवा कभी कुछ नहीं मिला ....।
          पर कुदरत का लिखा कौन टाल सकता है...। एक दिन वह दोनों बच्चों को और मुझे छोड़कर चले गए....!
      मैं टूट कर पहले ही बिखर गई थी...... पर जो भी थोड़ा बहुत मेरे अंदर था..... वह भी तार-तार हो गया...... पर ऐसे कब तक चलता मुझे बच्चों के मासूम चेहरे देखकर संभलना ही था..... कब तक यूं मातम बनाए  रखती....।
      मुझे वक्त लगा कुछ महीनों का .......संभालने में खुद को..... मजबूत किया खुद को......दिन भर स्वयं को कोसते हुए मरने की बातें सोचने वाली .....मैं .......फिर से नए आत्मवल से खड़ी होने के लिए स्वयं को संभालती रही .......आखिर जीत मेरी हुई....।    
           मैंने धीरे धीरे कारोबार संभाला और बच्चों को मां पिता दोनों की तरह परवरिश की....।            आज उसी का नतीजा है कि मेरे दोनों बेटे मुकाम हासिल कर करके अपने पैरों पर खड़े हैं....।
          दुनिया , समाज और स्वयं से लड़ते हुए आखिरकार ....मैं... हार कर भी जीत गई ......इस स्याह रात में जब सारी दुनिया सो रही है..... मुझसे नींद कोसों दूर है .....मैं बालकनी में खड़ी .....आसमान में बेफिक्र से तारे को  टिमटिमाते हुए  देखकर सोचती हूं ......जहां  जंग में खुद से हार कर....!!

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"

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