बहुत दिनों से घर के कोने में रखा
वो शीशा
वक्त की गर्द से धुंधल सा
अचानक आज सामने आ गया
ढेरों सवालों के पुलिंदे लिए
और
मैं पहुंच गई स्मृतियों की घाटी में
जहां संगीत था निर्झर झरने में
तो सूखे पत्तों में भी
हर कण कण झूमता सा था
पर सब गुजरा जमाना हुआ
और ...आज
वहां हरी मखमली घास में
उगी हुई थी ढेरों शैवाल..
अनवरत कोशिश के बाद भी
रह ही जाते हैं शैवाल के निशां
हर मौसम में
पंछी कूंजते हैं सुनाते हैं धुन
और... मै
कभी सुना तो कभी अनसुना कर
बड़ जाती हूं बोझिल कदमों से आगे
शायद
आईने के सवालों से बचने के लिए
नहीं करना चाहती मै उन
अनसुलझे सवालों का सामना
मालूम है मुझे... कि
आईने की गर्द में दफन है...
एक इतिहास
अब मै नहीं दोहराना चाहती इतिहास
नहीं देखना चाहती आईने में तुम्हारा अक्श
जिसमें...
मेरा अंतर्मन भीग जाए
मुझे अब ना होगा
उस बरसात का सामना ...
अनकहे मन से कहती हूं
अब बरसात नही अच्छी लगती मुझे..
Dr नीलम गुप्ता " नीरा"
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