गुरुवार, 28 जुलाई 2022

स्याह अंधेरों में जुगनुओं से कहाँ होती है रोशनी

 स्याह अंधेरों में जुगनुओं से कहाँ होती है रोशनी...!

एक नन्हा -सा चिराग जलाने की तमन्ना है...!!

तंग गलियों में जो पसरा हुआ सन्नाटा सा है...!

उसमें हल्की सी सुगबुगाहट लाने की तमन्ना है...!!

                         अधढके तन में जो घूम रहा नन्हा कल का भविष्य...!

                          उसके तन को ढापने की बड़ी तमन्ना है...!!

                          सोता है जो खाली पेट केवल पानी पीकर फुटपाथ पर...!

उसके लिए इक कौर निवाला मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!! 

मासूम से चेहरों पर जो लिपटी पड़ी है उदासी की चादर...!

उसको समेट मुस्कुराहट लाने की तमन्ना है...!!

ललचाई सी निगाहों से जो देख रहे टुकुर-टुकुर ...!

                                     उनको आंशियाँ मुहैय्या कराने की बड़ी तमन्ना है...!!

                              भोर सी चमक...रात सी चाँदनी रहे सबके चेहरों पर...!

ये ख्वाहिश भी है तहेदिल से मेरी ...बस यही इक " तमन्ना " पूरी करने की " तमन्ना " है मेरी ...!!# नीलम " नीरा "

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