आज दिनभर के काम निबटा कर सोचा कुछ पल आराम करूं ... जैसे ही हल्की सी आंख लगी ही थी कि...बाहर से कुछ आवाजें आ रही थी जोर जोर से...पहले तो इग्नोर किया और करवट बदल कर फिर से सोने का प्रयास करने लगी परंतु आवाजें और भी तेज होने लगी.... मैं बेमन से उठकर बाहर गई ...तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गईं...नींद तो जैसे पता नहीं कहां चली गई....
मेरे घर के सामने वाले घर से लगे हुए घर पर एक ट्रक खड़ा था .. उस पर पटक पटक कर समान रखा जा रहा था .... वहीं पर आंटी खड़ी अपने आंचल से मुंह ढके रो रही थी और अंकल जी भी चुपचाप नम आंखों से ये नजारा देख रहे थे....
बात को समझते मुझे वक्त नहीं लगा....वही किस्से घर घर के...वही कहानी ....रोज पुरानी होती नई सी....
पर मैं सोचने पर विवश हो गई कि ....आखिर दोष किसका है...माता पिता का या फिर बच्चों का... क्यों हम अपने बच्चों को जरूर से ज्यादा सुविधा देते हैं...हमारी परवरिश में पैसे की बू क्यों आती है...क्यों नहीं हम बच्चों को ये सिखाते कि... सीमित संसाधनों में कैसे जीते हैं....शायद उस वक्त हमें अपने कमाए पैसे और अपने रुतबे का घमंड होता है... हम आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं...आगे कुछ भी नहीं सोचते कि...इसके परिणाम क्या होंगे...
आज उन्हीं सब का नतीजा अंकल और आंटी जी भुगत रहे हैं....अंकल जी कस्टम विभाग में आफिसर की पोस्ट पर कार्यरत थे घर और ऑफिस दोनों जगह रुतबा था कमाई भी अंधाधुंध थी...आंटी भी बड़ी अफसरी में रहती...दो बेटे थे... पूरी कालोनी में सबसे पहले उन बच्चों के पास ही कोई भी नई चीज आती...पहले खिलौने फिर साइकिल और फिर बाइक...
मेरा तो आंटी जी से केवल नमस्ते तक ही सीमित था ... पर कालोनी में बातें तो आ ही जाती हैं घूम फिर कर...
ऐसे ही एक दिन सुना अंकल जी के बेटे कॉलेज जाने वाले हैं तो अंकल जी ने उन्हें गाड़ी दिलवा दी...
बस इसी तरह वक्त बीतता गया .... दोनों बेटों को जॉब लगी..... आलीशान शादियां हुई .. आधुनिक बहुएं आईं...अंकल जी ने एक मकान और बनाया पुणे में ... उस मकान में बड़े बहू और बेटे रहने लगे... फिर अंकल जी रिटायर हो गए और अपने छोटे बेटे के पास लखनऊ में ही रहने लगे....
सब कुछ सामान्य सा चल रहा था...अंकल आंटी कभी कभार पुणे चले जाते ... पर धीरे धीरे उनका पुणे जाना भी कम और फिर बंद ही हो गया...
अंकल आंटी अब दिनभर घर पर ही रहते.. आंटी तो घर के कामों में और बच्चों को संभालने में व्यस्त रहती और अंकल जी बाहर के कामों में और छोटी बहू किट्टी पार्टी और पार्लर में....
एक दो दिन से अड़ोस पडौस से कुछ सुबुगाहट तो थी ... पर मैने ध्यान नहीं दिया और आज इतना सब कुछ देखकर...समझ ही नहीं आया ...
मै छत पर खड़ी ये सब देख ही रही थी कि मेरी पढ़ौसन ने बताया ....अंकल आंटी अपने गांव वाले घर जा रहे हैं....छोटी बहू ने अभी 15 दिन पहले ही जबरदस्ती ये मकान अपने नाम करा लिया ...अब उसका कहना है कि मेरे घर से जाओ...उनका बेटा मूक दर्शक बना मौन सहमति दे रहा था अपनी पत्नी को....
वैसे तो ये कोई नया किस्सा नहीं है ...घर घर की कहानी है कहीं कम तो कहीं ज्यादा.... पर मैं सोच रही थी कि हम एक उम्र में अंधाधुंध पैसा तो कमा लेते हैं आधुनिकता की दौड़ में आंख बन्द कर भागने के लिए.... तब हम ये नहीं सोचते कि जो पैसा हम गलत तरीके से अपने परिवार को सुख सुविधा देने के लिए कमा रहे हैं..... उसमें ना जाने कितनों की बददुआ और हाय लगी है.... हम ये भूल जाते हैं कि हमारे कर्मो को..... स्वयं हमें यहीं और इसी जन्म में भुगतना पड़ता है....सारा हिसाब यहीं चुकता करना पड़ता है.... और हम भूल जाते हैं कि इसके परिणाम क्या होंगे...
पर अंकल आंटी की दशा देख मेरी आंखें नम थीं.... मैं सोच रही थी हम क्यों करते हैं ये सब .... क्यों अनजान बने रहते हैं जन बूझ कर.... क्यों हम संतोष नहीं कर पाते...यही सोचते सोचते दो गर्म बूंद मेरे गालों पर से गुजर गई.....
और देखते ही देखते अंकल आंटी चल दिए अपने गांव एक बार फिर से अपना घरौंदा बनाने..अब शायद उनके पास कोई तथकथित कोई अपना नहीं होगा....बस होंगे तो एक दूसरे की लाठी बने झुर्रियों भरे दो जोड़ी मजबूत हाथ....
Dr Neelam Gupta "नीरा"
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