मंगलवार, 20 सितंबर 2022

एक कप चाय

आज सुबह सुबह 
चाय का प्याला लेकर बालकनी में आई
 भोर वेला ....... सुहाना मौसम ...
एक आध पंछी चहक रहे थे ...
अब बची ही कहां है जगह उनके 
 नीड़ बनाने के लिए .... 
पेड़ तो बस नाम के ही रह गए हैं....
हर तरफ तो बहुमंजिल इमारतें....
आज गर्मी से कुछ राहत थी ....
कुछ कल  की बारिश की हल्की फुहार का असर था ....
और कुछ आज भी घटा सी थी...
कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था....
 और मै....मौसम का आनंद लेते हुए...
बालकनी में खड़ी देख रही थी ....आने जाने वालों को...
 वो शायद वक्त को मात देकर आगे जाना चाहते थे....
    पर मै... 
  हाथ में चाय का प्याला थामे वहीं की वहीं...
 मेरा मन  ऐसे में कहां रुकता...
उसे तो बस  हल्की सी आहट चाहिए....
  और ...
आंखें चुप चाप वहीं से लम्बा सफर तय कर लेती हैं....
             ....................

     चारों तरफ  हरी घास कुछ बड़े पेड़... रंगीन फूल
लगता था सबके जीवन में रंग भर देंगे....
     वहीं पर  तुम संग जीए वो पल
 बेतुकी सी बातें ... बिना बात हंसना... दीन दुनिया से बेखबर

सारी रस्मों तो ताक पर रख...अपनी एक अलग दुनिया....
      कभी नोक - झोंक तो कभी मान मनुहार...तेरा मेरा नहीं बस हमारा संसार....
       सब कुछ पॉपकॉर्न और सौंधी आंच पर भुने भुट्टे में ही पूरा हो जाता था....
  बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी अपनी...
जहां भविष्य  से कोई वास्ता नहीं...बस जो है वो आज ही है....
       पर वक्त के पंख होते हैं तब सुना था.... फिर देखा भी...
      सपनों की दीवार शायद वक्त से कुछ कच्ची थी...
 हल्की सी ठसक लगी और ढह गई... 
 फैली हुई बाहों को यूं इंतजार का ढाढस दे चले गए... 
    आंखों के सपने नमी में धुंधले हो गए....
  तब जाना कसमें वादे तो बने ही होते हैं ...टूटने के लिए
 आंखों का सारा काजल बह गया...
तब तो अपने ही हाथ पराए से हो गए....काजल की रेखा को साफ करने की हिम्मत ना जुटा पाए....
   पर वक्त कब किसका हुआ है....
सच वक्त के पंख होते हैं....

     ........................
 
       तभी अंदर से आवाज आई...
अरे भई आज कहां हो.....
  मै बालकनी में खड़े खड़े ही लौट आई... गालों पर लुढ़क आई बूंदों को फटाफट साफ किया 
कहीं इतने बरसों बाद चोरी ना पकड़ी जाए...
  सच यादें तो राख में दबी चिंगारी सी होती हैं...
जो कभी बुझती नहीं ...सुलगती रहती है धीरे धीरे...
  अच्छा अब ठंडी हुई चाय का प्याला मेज पर रख....
लगती हूं सुबह के कामों में....
मिलती हूं फिर....एक प्याला गरम चाय के साथ...

#  नीलम गुप्ता  "नीरा"

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