राही
राही
राह पर चलते एक राही से पूछा मैने..
क्यों चलते हो इस कंकरीले रास्ते पर
निरे कांटों से अटा पड़ा है ये रास्ता
हर तरफ़ विरानगी छाई हुई है...
दूर तलक कोई मंजिल भी दिखाई देती नहीं...
वो मुसाफिर कुछ ठिठका...मुस्कुराया
एक उड़ती सी नजर मुझ पर डाली
और सहज हो बोला...
माना कि ...तुम सही हो
पर ये तो बतलाओ...जरा सी ठोकर से
मंजिल की इन बाधाओं से...
घबराकर
क्यों बदलूं पथ अपना...
मै ना चलूंगा तो कोई तो चलेगा
कोई तो करेगा ...एक नई पहल
जो मिटा कर राह की वधाओ को
करेगा पथ प्रस्स्त ..
फिर मै क्यों नहीं....??
चुभेंगे नहीं कंकर पत्थर तो ..
आगे बड़ने की ललक कैसे जागे..
मिल गई जो मंजिल सहज
फिर वो मंजिल क्या....?
वो राह ही क्या ...जो नीरस हो
कुछ कह पाती मै....
उससे पहले वो ... राही
यूं बोल फिर चल दिया ...
अपनी मंजिल की ओर....
और.... मै
देखती रही ...उसे अपनी घुन में जाते हुए
एकटक.....
# Dr Neelam Gupta "नीरा"
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