एक नारी, स्त्री, ललना.... ना जाने कितने ही नामों से जाने जानी वाली एक औरत का जब नाम आता है ...... तब एक खाका उभर कर सामने आता है.... दुबली पतली मांग को चटख सिन्दूर से सजाए , माथे पर लाल बिंदी लगाए , होठों पर मधुर मुस्कान लिए , कजरारी आंखों वाली , कानों को बालियों से सजाए , बालों को करीने से बांधे और एक लापरवाह सी लट गालों को चूमती , गले में मंगल सूत्र डाल कर इतराती .... ... ओर.....पैरो पर पायल - बिछुए और महावर से स्वयं को संवारती ... करीने से बंधी साड़ी में खुद को समेटे हुए.... यही तो है वो
स्त्री....
यही स्त्री जो सबकी आकर्षण का केंद्र है.... रूक जाती हैं चलते चलते निगाहें उसके उभारों पर... यही नहीं निगाह रखी जाती है उसके एक एक पल पर.... उसका उठना बैठना सभी तो दायरे तय कर दिए जाते हैं....जैसे कोई ठेकेदार हो उसका...
पर क्या सोचा है कभी... उसमें भी जान है एक दिल है जो धड़कता है...कुछ भावनाएं हैं, अहसास है ,उसका भी वजूद है.... शायद नहीं ना...अगर सोचा होता तो वो यूं मजबूर ना होती निगाहें झुका कर चलने को....
सच तो ये है ...कोई ये भी नहीं सोचता कि ये वही नारी है..... जो ना जाने अपने अंदर कितनी वेदना , दर्द और मान - अपमान , तिरस्कार का अथाह समुंदर समेटे हुए है अपने अंदर.... कितनी की अपनी इच्छाओं का गला घोटाती है ....परिवार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए.... हर रोज सौ दफा मरती है...एक परिवार को बचाने के लिए... हजार बार वो चुप होती है दूसरों को बोलने का मौका देने के लिए ... कभी स्वयं चुप होती है तो ....कभी जबरन चुप कराई जाती है...वो चीत्कार नहीं करती बस पी लेती है विष का घूंट मीरा की तरह.... वो सींचती है रिश्तों को अपने आंख के पानी से... तभी तो वो बनती है त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति....
ये स्त्री ही है..... जहां जाती है वहां महका देती है घर आंगन .... ईट मिट्टी गारे जैसी बेजान चीजों में जान डाल देती है..... ईट मिट्टी गारे से बने मकान को अपने शुभ कदम रखते ही घर और अपनी तपस्या से घर को मन्दिर बना देती है .... जिसके चहकने से किलकारी गूंजती हैं घर में....
सच में स्त्री तुम इस धरा का मान हो 💕
# नीलम "नीरा"
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