रविवार, 28 अगस्त 2022

पुरुष



ईश्वर की अद्भुत अलौलिक संरचना बेजोड़ योग स्त्री पुरूष..... दोनों की एक दूसरे के स्वभाव के विपरीत पर एक दूसरे के पूरक ❤️ जहां एक स्त्री कोमल ममतामयी वहीं पुरुष यथार्थ के धरातल से जुड़ा कठोर भावनाओं को अपने अंदर समेटे हुए ...तभी तो स्त्री उन्मुक्त विचरती है और इस जगत के निर्माण में सक्षम है....एक दूसरे के बिना दोनो ही अपूर्ण है....

पुरुष यानी .........????? (एक अनसुलझा सवाल )
स्त्री.........??????  ( एक पहेली )

सच कहूं तो बहुत से व्याख्यान भरे पड़े हैं स्त्री की गाथा में ... स्त्री के नख शिख वर्णन हर जगह पढ़ने को मिल जायेगा ...
पर उसमें पुरूष कहाँ है...??  सच सब जानते हैं ..... और मानते भी हैं ... कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं... पर फिर भी...पुरुष को समझा कौन....?? यदा कदा की बात छोड़ दे तो .... कहां मिलता है पुरुष का वर्णन....
       पुरुष की प्रकृति धीर गम्भीर है... पर सीने में दिल धड़कता है... भावनाओं का समुन्दर उमड़ता हैं... हिलोरें लेती हैं उसके भी मन में कोमल भावनाएं ...वो पत्थर है पर.....पर कठोर नहीं.... क्योंकि प्रेम का झरना भी वहीं से फूटता है... ख्याब बुनना सपने संजोना..सजल होना ...सब तो है.. पुरुष में...हम स्त्रियों जैसा..

कभी भी कहीं भी पुरुष द्वारा  पुरुष के लिए कुछ लिखा  गया है.... परंतु एक स्त्री पुरुष को किस नजरिए से देखती है..... पुरुष के मनोभावों को समेटते है... 

एक स्त्री के नज़रिये से देखें तो....
वास्तविकता थोड़ी ज्यादा नज़दीक होती है.......

पुरुष यानि कि ...
पत्थर में अंकुरित  कोपल....

पुरुष  मतलब ...
लोहे के सीने के पीछे ...
धक धक करता कोमल ह्रदय ...

पुरुष यानि कि....
किसी कोयल की कूक  ढ़ूँढता एक मूक वृक्ष ....

पुरुष मतलब...
वो बट बृक्ष जो एक स्थान पर खड़ा
छाँव देता है....

पुरुष कहता  है कि...
" आज मूड नहीं  है,
 दिमाग़  ठिकाने नहीं  है...."
पर, शायद  ही कहेगा कि
आज मन उदास है......

सबको ढाढस बंधाता खुद टूट कर
अपनी  आंखों के बांध को कभी टूटने नहीं देता
वक्त आने पर बीबीएन जाता है
सुखा पोखर ....

स्त्री ....
पुरुष के कंधे पर सर रखकर रो लेती  है....
जब कि, पुरुष 
स्त्री की गोद में सर रखकर रो लेता है.......

जिस तरह दुनियाभर की स्त्रियों को...
अपने  पुरुष के शर्ट पे बटन लगाने में जो रोमांच  होता है....
वही  रोमांच उसी वक्त  स्त्री को 
गले लगाने में
पुरुष को होता है.......

जीतने के लिए पैदा हुआ पुरुष ...
प्यार के पास  हार जाता है....
और जब.....
वो प्यार  छोड़ जाता है ना
तब
वह जड़ समेत  उखड़ जाता है....

स्त्री की मजबूरी सह जाता है.... 
जैसे  तैसे भी....
मगर,
बेवफाई  सह नहीं  पाता.....
उसका.....  या खुद का..... 
दुश्मन बन जाता है.........

धंधे में लाखों का घाटा सह जाता है
भागीदारी में दगा नहीं सह पाता ....

समर्पण स्त्री का स्वभाव है.....
और पुरुष की हार्दिक कामना .......

स्त्री के आँसू  अंधेरे में भी 
दिखते है.....
पुरुष के  आँसू 
उसके तकिये को भी नहीं दिखते ...

कहते  है 
स्त्री को चाहते रहो,
समझने की ज़रूरत नही.......
मैं कहती  हूँ :  
पुरुषको  बस.. समझो....... 
अपने आप चाहने लगेगा  तुम्हें ....

जहां तक समझा है मैने...
स्त्री यदि गंगा जल है
तो पुरुष सहज भाव से समेटे हुए 
जल का दरिया 

स्त्री समर्पित है तो 
पुरुष समर्पण ...

सच कहूं तो
बस पुरुष तो पुरूष है...
एक कठोर आवरण पहने हुए ..
सशक्त प्रहरी ....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"

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