सोमवार, 23 जनवरी 2023

पुरूष



अकसर सुना जाता है .....और ....जाता रहा है..... और.... शायद सुना जाता रहेगा... कि वो पुरूष है कठोर तो होगा ही... सब कुछ संभाल लेगा... हर बडी से बड़ी और छोटी से छोटी जिम्मेदारियों से लाद दिया जाता है उसका कंधा... और बना दिया है सुकुमार से कठोर....
       सच कहूं तो पुरूष कठोर नहीं होता बल्कि उसे बना दिया जाता है.... अमूमन देखा जाए तो बचपन से किशोर और किशोर से युवा और प्रोढ़ावस्था तक उसे सिर्फ और सिर्फ दायित्व ही मिलता है...प्रेम तो मिलता ही नहीं... यदि प्रेम मिलता भी है तो दायित्व की चाशनी में लिपटा हुआ....
         जबकि पुरूष के दिल में भी होते हैं सुकोमल भाव सुमधुर अहसास... धड़कता है उसका भी दिल... टूटता और बिखरता है वो भी.... चाहता है वो भी एक सुकोमल कंधा जहां खो सके वो स्वयं को... जुड़ जाए वो एक अहसास से .... वो भी संजोता है सपने ...देखता है ख्वाब....
   पर सारे भाव खो से जाते हैं कहीं... विलीन हो जाते हैं अंतर्मन के उदगार... कभी दायित्वों का वास्ता देकर तो कभी जिम्मेदारियों को गिना कर ....और बना देते हैं पुरुष को गंभीर पुरूष... अश्रु विहीन आंखों का मालिक 
         पर एक बात अक्षरत: ये भी सच है पुरुष को समर्पित भाव से  प्रेम करने वाली स्त्री जानती है....
पुरूष अथाह प्यार सरलता कोमलता का कोष होता है...बिलकुल निर्मल जल का अथाह सागर सा....
ऐसी स्त्री के आगोश मे वह पिघलता है रो तक लेता है...
खोल देता है अपनी जिन्दगी की किताब के हर पन्ने को... 
        सच पुरूष कठोर नहीं होता वो भी जीना चाहता है उन्मुक्त प्रेम में गोते लगाना चाहता है...प्रेम के अथाह समुद्र में  डूबकर जीना चाहता है...

# नीलम गुप्ता "नीरा"

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