शनिवार, 28 जनवरी 2023

कुनकुनी धूप



वक्त कब और कैसे आगे खिसकता जाता है कुछ पता नहीं चलता ....आज से ठीक 20 साल पहले बिलकुल ऐसी ही सर्द सुबह ....हर तरफ चांदनी सी बिखरी जिधर तक निगाह जाती बर्फ ही बर्फ .... पहाड़ों में ऐसा ही होता है सर्दियों में दिनभर ठीक ठाक मौसम और सुबह उठो तो बर्फ की सफेद चादर.... हल्की ठिठुरन तो थी ही.....पर सूरज अपनी ड्यूटी पर मुस्कुराता हुआ आ गया...
   सूरज की वो गुलाबी  पीली सोने जैसी किरने  उस बर्फ पर पड़ अलग ही तरह से चमक रही थी.... उस सर्दी में भी सुकून दे रही थी...
     मैं अपनी बालकनी में बैठी उस  सर्दीली सुबह में कुनकुनी धूप का आनंद ले रही थी.... बहुत सुकून भरा था वो पल.... जैसे मेरे मन और मौसम का सही तालमेल था.... आंखें बन्द किए सोचने लगी...काश सब कुछ इतना ही सुनहरा होता ....ये तपता सूरज यूं ही माध्यम होता... ताप तो देता पर सुकून भरा... 
       सच कहूं ... पर ऐसा होता कहां है ... जो हम सोचते हैं.... पर यदि कुछ मन चाहा मिल भी जाए तो ... हमें सब्र कहां होता है...हम भूल जाते हैं उसकी कीमत....
        यही तो हुआ था पूर्वी के साथ ... पूर्वी मेरे घर के पास ही रहती थी हम उम्र थे ....एक साथ खेलते एक साथ बतियाते...
 बचपन के स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ साथ पढ़े ....मेरी अच्छी दोस्त थी ... हर बात मुझसे साझा करना उसकी आदत में शुमार था... कॉलेज क्या घर में भी कुछ बात हो वो तुरंत ही मुझसे साझा करती....
 घर पर पहले मां और बाबूजी की खुसुर फुसुर..... फिर खुले आम हमारी शादी की चर्चा होने लगी...
 पर वक्त के साथ तो चलना ही पड़ता है... फिर मां और बाबू जी को अपनी जिम्मेदारी पूरी भी करनी थी....हमारे दोनो के लिए उचित जीवन साथी की तलाश होने लगी...मेरी शादी जैसे ही तय हुई पूर्वी खुश तो बहुत थी पर उदास भी थी...हमारा साथ जो छूटने वाला था...  
लेकिन पूर्वी के लिए अभी जीवन साथी की तलाश जारी थी...एक दिन मुझे पता चला कि... पूर्वी ने 
 अपने ही सहकर्मी विपुल  का परिचय अपने घर पर करवाया... 
उसके घर वालों के लिए ये बात बहुत चौंकाने वाली थी...
 ये मेरे लिए कुछ नया तो नहीं था पर अजीब जरूर था ...क्योंकि पूर्वी ने एक बार जब मै मायके आई थी तो विपुल से मिलवाया तो था .....पर कभी ये जिक्र नहीं किया कि वो उसको अपना जीवन साथी बनाएगी... 
उसके घर में नाराजगी का माहौल था पर पूर्वी थी कि अपनी जिद्द पर अड़ी रही कि शादी करेगी तो विपुल से.... आखिरकार बच्चों की जिद्द के आगे माता पिता को हारना ही पड़ता है.... वही हुआ अंकल आंटी ने पूर्वी की शादी विपुल से कर दी...
       उस वक्त मुझे बुरा लगा कि उसने इतनी बड़ी बात मुझसे छिपाई ....खैर उसकी जिंदगी का अहम फैसला था ...उसको ही लेना था.... पर अपने मन की कहूं तो मुझे विपुल जरा भी अच्छा नहीं लगा.... देखने भालने में स्मार्ट रंग गेहुआ सधी हुई कद काठी... सब कुछ अच्छा था ... फिर पता नहीं क्यों...वो मुझे सही नहीं लगा.... पर मैं क्या ही बोलती एक लड़की तो आकर्षिक करने के लिए विपुल में सब कुछ था....
     खैर पूर्वी की शादी हुई... मैं उसकी शादी में आ ना सकी....
वक्त बीतता गया ...  मैं भी अपनी  गृहस्थी में व्यस्त हो गई... और पूर्वी भी... जब भी मैं मायके जाती उसके घर जरूर जाती ...उसके समाचार मिल जाते....अब धीरे धीरे समय बीतता गया.... जिम्मेदारियां बढ़ती गईं ... और मेरा मायके जाना कम हो गया....
        पर एक बात मुझे हमेशा कचोटती कि पूर्वी जब भी बात करती उधर की ही बात करती ... घर परिवार की बात होती तो टालमटोल कर बात का रुख बदल देती.... धीरे धीरे मेरी और पूर्वी की बातचीत का सिलसिला भी कम हो चला... जब भी कभी हम मिलते तो मायके में ही मिलते .... और घर गृहस्थी में रमते हुए समय के साथ मायके आना ही कम हो गया... मायके में रुकना तो अब हो ही नही पाता....कभी बच्चों के एग्जाम कभी टेस्ट... बस यूं कहूं कि जिन्दगी अपने ढर्रे पर चल रही थी... बचपन की बातें बचपन के सपने सब सपने हो गए थे....अपने लिए तो वक्त अब चुराना पड़ता है... तब भी बमुश्किल वक्त मिलता है....
        इस बार भतीजे की शादी  गई तब पता चला पूर्वी भी आई है.... मैं उससे मिलने गई...
    उसने मुझे देखा झट से गले लगा लिया... और बहुत देर तक  यूं ही मुझसे चिपकी रही... मैने ही कहा..... अरे पूर्वी अब छोड़ तो...तुझे देख तो लूं... हम दोनों की आंखों में आसूं थे... अपने को संयत कर मै बोली पूर्वी ये क्या हाल बना रखा है...हमेशा टिपटॉप रहने वाली और मुझे भी टोकने वाली ... और अक्सर मेरी ड्रेस को ये कहकर बदलवाने वाली की तुझे तो कपड़ों की मैचिंग की भी अकल नहीं है.... फिर तूने अपना क्या हाल बना रखा है.... ना ठीक से बिंदी , ना हाथ में चूड़ी बस एक कड़ा डाल रखा है...
     उससे मिलने के बाद  मैं   अपने घर आ गई बेमनी सी...
पर मैं रातभर सो नहीं पाई....
      एक बात तो थी इस बार जब पूर्वी मिली  कुछ उखड़ी उखड़ी थी ... मेरे बहुत पूछने पर भी बात टाल दी.... विपुल के बारे में पूछने पर...धीरे से बोली ...ठीक हैं.... मुझे  अपने अंदर कुछ खटका तो पर मैंने नजरंदाज कर दिया....
        एक बार जब मै फिर करीब दो साल पहले  मायके गई तब उड़ती हुई खबर सुनी कि पूर्वी अब अकेली ही रहती है.... एक धक्का सा लगा...  आंखें नम हुईं ... सोचा पूर्वी को कॉल करूं...  पर पूछूंगी क्या.... आख़िर उसकी जिंदगी है.... फिर मन में सवाल उठा मेरी सहेली है पूछ सकती हूं.... इसी तरह स्वयं से ही तर्क वितर्क करते हुए.... एक दिन मैने पूर्वी को कॉल कर ही दिया....
      पूर्वी अपने को संयत करती रही... और बोलती रही... फिर मैंने ही विपुल की बात छेड़ी तो.... पहले वो टालमटोल करती रही..... पर मैंने भी ठान लिया था कि.... सच तो मुझे जानना ही है ......जो कभी मुझसे अपने घर की एक एक बात बताती थी वो आज कैसे कोई बात छुपा सकती है....मेरे कुछ कुरेदने पर आखिर उसके सब्र का बांध टूट ही गया...
 वो अपने को रोक नहीं पाई और फूट फूट कर रोने लगी.... 
      कुछ पल मै शांत रही ... सोचा पता नहीं कितने दिन का गुब्बार मन में दबाए बैठी है निकल जाने दो.... फिर कुछ देर बाद वो खुद ही अपने को संयमित करने के बाद बोली.... पीहू तू सच कहती थी  कि.... विपुल से शादी करने में जल्दी मत कर..... पर उस वक्त मैं तो दीवानी थी....किसी की नहीं सुनी... विपुल मेरी जिद्द था..
  शादी हुई  शुरू के कुछ महीने हंसी खुशी बीते ....कुछ समय सब कुछ सही चला...... फिर विपुल अपने रंग में आने लगे...  उनके लिए लड़कियां ही  जरूरी थी... मै तो सिर्फ़ घर और बच्चों की देखभाल के लिए ही.... मैने देखा विपुल को समझाया और कई बार उसकी हरकतों को अनदेखा किया..... पर... हर बार यही कहते अब नहीं करूंगा... और मै बेबकुफ हर बार विश्वास कर उनको माफ करती ... शायद अब सुधर जाए..... पर यही मेरी गलतफहमी थी.....आख़िर कहती भी तो किससे ...वो मेरी पसंद थे और मेरी ही जिद्द....           वक्त गुजरता ही गया....बच्चे बड़े हो रहे थे....कुछ समाज और कुछ बच्चों की खातिर सब चुपचाप सहती रही.... अब मैंने भी मान लिया था कि विपुल से कुछ कहना मतलब दीवार से सिर मारना... सब कुछ यंत्र वत चल रहा था... एक दिन विपुल अपनी एक सहकर्मी को ले आए और बोले ये कुछ दिन हमारे साथ रहेगी.... मै चुप थी एक ही बात मुझे विपुल से जोड़े हुए थी कि वो बच्चों का ध्यान रखते लेकिन मुझसे मतलब नहीं रखते...
मेरे लिए इतना ही काफी था आख़िर मेरे बच्चों को पिता का प्यार तो मिल ही रहा है..... परन्तु एक दिन मैंने विपुल को रंगे हाथों पकड़ लिया.... और उसी दिन अपना सामान बांध कर घर से आ गई...
    मायके तो जा नहीं सकती थी क्योंकि मां बाबू जी तो अब रहे नहीं...कुछ दिन अपनी मौसी के घर रही ... फिर एक स्कूल में बार्डन की जॉब का विज्ञापन देखा ...बस फार्म भर दिया... रहने की सुविधा थी मैं वहीं बच्चों को लेकर रहने लगी....
       मेरी रुकी हुई जिंदगी जैसे वक्त के साथ कदम ताल मिलाने लगी...एक बेटी की शादी की कर दी यहीं स्कूल में एक मेम हैं उनका बेटा इंजीनियर है उससे...दूसरी की भी हो ही जाएगी....
     फिर मैंने बातों ही बातों में पूछ लिया विपुल शादी में आए थे बोली.... हां केवल कन्यादान की रस्म निभाने....
    सच कहूं पीहू...विपुल को मैंने इतनी शिद्दत से चाहा था ...तभी उनकी माफ करने वाली और ना माफ करने वाली सारी गलतियां माफ़ की... पर वो शायद मेरे नसीब में नहीं थे... पीहू जिन्दगी बहुत डगमगाई पर... मै संभल गई.... जिन्दगी ने मुझे कदम दर कदम कठिन से कठिन इम्तेहान लिए .... पर मैं गिरी नहीं वल्कि मजबूत से मजबूत होती गई...
 आज मैं बहुत खुश हूं...सच कहूं आज तुझे बात कर मन का सारा गुब्बार निकल गया.... बहुत हल्का सा लग रहा है....
    मुझे भी पता नहीं चला उससे बातें करते हुए कब मेरी आंखे उसके साथ सरीक हो गईं....
 फिर पूर्वी ही बोली ...अच्छा पीहू कुछ बच्चे आए हैं उनको पढ़ा लूं ...मेरा खाली वक्त भी कट जाता है... फिर कॉल करूंगी....मैने बस इतना ही कहा पूर्वी अपना ध्यान रखना...
        आज मुझे लगा सच में सूरज की वो गुलाबी पीली सी सोने जैसी किरने.... उस बर्फ पर पड़ कर बिलकुल पहले की तरह चमक रही है....
जैसे ही मैंने आंखे खोली...मुझे लगा ठिठुरती ठंड में वो कुनकुनी धूप  मुझे सहला कर अपनी गर्माहट का सुकून भरा अहसास करा रही है.... मैं मंद मुस्कान के साथ आंखे खोल कर उठ जाती हूं...अपनी दिनचर्या की शुरुआत करने.....

# नीलम गुप्ता "नीरा"

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