रविवार, 19 फ़रवरी 2023

मैं तन्हा हूं

( मेरे परम् मित्रों... ये केवल एक पोस्ट है...
मैं  शब्द का संबोधन किसी व्यक्ति विशेष या मेरे अपने लिए नहीं है..... धन्यवाद )

 मैं...टूट रही हूँ.. बिखर रही हूँ.. 
आहिस्ता आहिस्ता 
डूब रही हूँ.. और..धीरे धीरे 
खुद ही खुद में विलीन हो रही हूँ..
पर...कहाँ.. और ..क्यों...??
शायद  मुझको भी पता नहीं..
असमंजस में हूं.....
ये ऊँचे ऊँचे मकान..जहाँ चार दीवारी और छत तो है..
पर...घर नहीं
लोग की भीड़ तो बहुत है...
पर....इंसान नहीं
रिश्ते और उनके नाम बहुत हैं...
पर...अपना कोई नहीं
औरत भी है आदमी भी हैं..
पर...माँ-पिता  नहीं 
खाना पानी..सब कुछ तो है..
पर...भोजन का स्वाद नहीं
सब कुछ तो है... ऐसो आराम का सामान..
हर चीज मुहैया है..
पर..फिर भी 
मैं...टूट रही हूँ... बिखर रही हूँ..
समेट नहीं पा रही खुद को..
पर क्यों...
शायद कोई बजह ...
वजह कोई नहीं .....
पर कोई तो वजह होगी...
मुझे भी पता नहीं..

#  नीलम " नीरा "

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