* पेड़ की प्रेमकथा *
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देख रहे हो इस पेड़ को शान्त ..बिलकुल. शान्त..देखो बिलकुल हमारी तरह बनावट है इसकी ...
नीचे देखो एक साथ. ..ना तुम ...ना मैं ..."हम"...
कुछ समय साथ-साथ चलते रहे ...फिर अचानक से दो भागों में बंट गये ....एक "तुम"... एक "मैं "....
फिर समय ..परिस्थिति ...जिम्मेदारी में उलझ कर...कुछ फासले हुए...
अगर मैं ये कहूं बिलकुल इसी पेड़ की तरह ....तो अतिशयोक्ति ना होगी ...
एक अन्तराल बाद फिर कुछ पास आये...देखिए इस पेड़ को एक टहनी को... ना जाने कहाँ से आकर जोड़ रही है उन दोनों को....
एक डोर में दूरी बनाए हुए ...जुड़ से रहे हैं एक अनजान रिश्ते में .....और साथ-साथ चलने का सुखद एहसास...सीमा रेखाओं की परिधि में .....
पर कब तक...देखिए ना इस वृक्ष को... कुछ समय बाद .....समय ने पिर करवट ली.....नियति का फेर...
एक शाखा करीब आते आते दूर बहुत दूर हो गयी ...और.. फिर से ठूंठ बन गयी...
पर दूसरी अनवरत एकाकी सी.. मूक...किन्तु शान्त...अपनी धुन में आगे बढ़ती गयी ..बढ़ती गयी ...
अन्त में हरा भरा खुशनुमा..माहौल बना कर...दूर क्षितिज मे समा गयी ...छोड़ गयी अपने निशां ....
देखो ना ध्यान से देखो....
क्या मैं झूठ कह रही हूं...या ये मेरी कोरी कल्पना मात्र है...
ये सच है...
और हां एक बात और बता दूं...जिससे फिर ये ना कहो बताया नहीं तुमने .....
ये कटु सत्य है... पर यथार्थ है...इसे तो स्वीकारना ही पड़ेगा...
वो ठूंठ मै हूं... जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा सानिन्ध्य पाने के लिए बार-बार तुम्हारे करीब आ रही है...और अन्त में यूं ही खाली हाथ... अस्तित्व को समाप्त कर विलीन हो जाती है नीले आसमान में ...
और वृक्ष का दूसरी डाली ..तुम हो...अनेक झंझावतो को सहते...उसमें रमते ...शान्त...सीधे ...अपने कार्यों में लिप्त ...अपनी अमिट छाप ..अपने अस्तित्व की गरिमा को बनाए हुए ..विलीन हो जाते हो दूर क्षितिज में .....
कह रही हूं ना मैं सच ....अब तुम ही बताओ क्या ये मेरी कोरी कल्पना है....इसे तुमसे बेहतर कौन. जान सकता है...
ये यथार्थ है...कटु सत्य है...बस फिर ना कहना बताया नहीं ....
इसके आगे और कुछ बचा ही नहीं कहने को....और क्या कहूं... कुछ जुड़ाव सा... कुछ. लगाव सा हो गया है इस पेड़ से....जितनी बार देखती हूं...कुछ अपनत्व सा लगता है....
बस तुम देखो ना एक बार.....इस पेड़ को ध्यान से ...."मान लो ना मेरी बात"
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