अनजाना सफर
तुमसे होकर गुजरी है हर बात मेरी ...
फिर भी महफिल में कुछ यूं मुस्कुराते हो...
जैसे जानते नहीं ....
हर कमी को मेरी यूं छिपा जाते हो....
जैसे देखा ही नहीं .....
हर नाकामी पर मेरी यूं ढांढस बंधाते हो....
जैसे कुछ हुआ ही नहीं .....
आँख के मेरी आँसू यूं इस तरह पोछते हो.....
जैसे तिनका-तिनका गिरा हो.....
बात जब भी किसी की चुभी हो मुझे .....
कुछ इस तरह युं समझाते हो....
जैसे हम उम्र सखी हो मेरी.....
उलझ जाती हूं जब भी किसी उलझन में .....
पास बैठ कुछ यूं बहलाते हो ....
जैसे माँ हो मेरी ....
जब भी महसूस करती हूं उदासियों को अपने करीब.....
तुम दूर होकर भी पास आ जाते हो...
बन प्रियतम स्नेह जताते हो....
कहाँ कहाँ ...क्या क्या कहूं तेरे बारे में ...
जब भी पड़ती हूं अकेली मैं...
संग मेरे खड़े हो एक और एक ग्यारह बन जाते हो...
सच कहूं....
थकती नहीं कलम मेरी ....अल्फाजों की खलती है कमी मुझको....
हर एक पन्ना कोरा है पर... उसमें लिखा भी तेरा नाम ही है
तू धड़कन है मेरे दिल की...सांसों की गरमी है.....
बसती है मेरे रग -रग में ...
नाता नहीं तेरा मुझसे ज्यादा पुराना...
पर लगता है बांधा है तूने मुझे जन्म जन्मान्तर से....
मानती हूं कोई नाम नहीं इस रिश्ते का...
पर बेनाम रिश्ते में रंगने लगी हूं खुद को....
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** कौन कहता है बरसों की पहचान बनाती है दोस्ती ....
दोस्ती तो जब दिल मिल जाएं तब हो जाती है...**
# नीलम " नीरा "
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