सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

एक पहेली

सूर्य की रक्तिम आभा..
अलसायी सी धूप..
चिड़ियों का मधुर कलरव..
भास करा रही थी एक..
नये उल्लास उमंग से भरे दिन का..
सब कुछ वही ..पर फिर भी नूतन सा...

मैं देखती हूँ एक दिवास्वप्न की तरह..
और रत हो जाती हूं नित्य कलाप में..
लगता है मेरी अंगुली थामें कोई ..
रोज मुझे ले जाता है मेरे गन्तव्य तक...

दिन चढ़ा...सूर्य तपा...
खो जाती हूं दिनभर कहीं ...
चक्रवत मैं ...
दिनभर अपने-आप को खोजती हूं इधर उधर...
और बनी रहती हूं अनबूझ पहेली सी मैं ....

फिर बुनकर ताना बाना सांझ को....
वापस लौट आती हूं मैं ...
सूर्य की लालिमा की तरह...
पक्षियों की तरह अपनी नीढ़  में ...
एक सुकून के साथ ...
चिर आनन्द के साथ ...
और करती हूं पुन: इन्तजार ...
सूर्य की उस रक्तिम आभा का...
जो फिर से एक नया सवेरा...
नया उल्लास लिए...
मेरी अंगुली थामने फिर आयेगा....

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