गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

सुकून

सुकून

स्त्री आखिर स्त्री है...वो अनजाने घर को अपनाती है... हर रिश्ते में खुद को बांध लेती है रेशम की डोर बन ...  समेट लेती है सबको  अपने आँचल में....बन जाती है सेतु    मायके और ससुराल का... 
सच कहूँ तो.. ईंट और सीमेंट से बनी छोटा मकान या बहु मंज़िली इमारत ... स्त्री के पावन कदम के पड़ते ही घर बन जाता है...उसकी पायल की झंकार से आशियाना बन जाता है.... ममता स्नेह दुलार का नेह बरसाती है वो नाजुक सी स्त्री .... उसकी चूड़ियों की खनक जब खनखनाती है तो मोह लेती है सबका दिल ... तभी  तो स्त्री को गृहलक्ष्मी कहते हैं...
 इतना सब ...

पर चाहती क्या है वो स्त्री..बस थोड़ा सा सुकून....
पर क्या है.. उसका सुकून  ??
चलिए बताती हूँ.... क्या है स्त्री का सुकून

जब पति हौले से आकर कानों में कहे ....
आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो..
बस इतना सा...सुकून

जब बेटा पेट भर खाना  खा लें..
वो ही है .उसका सुकून

और जब बेटी कहे माँ तुम बैठो...
आज खाना मैं बनाती हूँ...
बस यही थोड़ा सा...सुकून

जब देवर कहे प्यारी भाभी 
आज तो आप छा रही हो...
बस इतना सा.... सुकून 

जब ससुर कहे ..आज खाना खा कर
 मजा आ गया...
बस इतना सा.. सुकून

जब सास कहे...बस बहुत हो गया काम
अब थोड़ा आराम कर लो
बस इतना सा... सुकून

यही है स्त्री और यही है उसका सुकून 
बस थोड़ा सा सुकून 
और ...
दीवार बन जाती है ..घर
और ....
घर बन जाता है  स्वर्ग 
थोड़े से.....सुकून से 😊

डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

अभिलाषा

चाहत थी मेरी ...
या...कहूँ 
नादान सी बेबकूफी... मेरी...
या हटी सी जिद्द ...
जब भी देखती हूँ..
सूरज को...
मचल उठता है.... मेरा ये चंचल मन
आज भी...
और पहुँच जाता है...नासमझ उम्र के मोड़ पर 

तब भी और अब भी
सोचती हूँ....
आगोश में भर लूँ सूरज को...
उसके उजाले को और रोशन कर दूँ..
उन तमाम बस्तियों को ...
जहाँ सूरज तो भरपूर निकलता है...
पर उजियारा नहीं होता...
 बस..
इसी उहा पोह में उलझी मैं...
चल पड़ी...
अपनी जिद्द की जिद्द पूरी करने...
और...
सांझ होते होते...
आखिर ...
मैंने... थाम ही लिया अपने सूरज को
 फिर ...पूछ भी लिया...
उससे...
क्यों करते हो इतनी चिरौरी मेरे साथ
कुछ ठहर के
गुलाबी मुस्कान के साथ ...वो बोला
हूँ तो सदा ही तुम्हारा
पर...
कोशिश और उम्मीद से
  पूरा ही मिलूंगा..
आधे अधूरे का क्या ही काम 
और.... हाँ
अब तुम जाकर जगा देगा ....
उन सोये हुए मनो को...
जहाँ...
मैं तो हूँ ...पर
मेरा उजियारा नहीं....

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

रिश्ते ...

देखो...समझो... जानो
 कई बार हम कुछ रिश्तों को कस कर थाम लेते हैं... अच्छा ही है ना...जब तक रिश्ते थामे जाएं ...रिश्तों को बचाया जा सकता ह बचा लेना चाहिए... पर...एक सीमा तक... क्योंकि ...कई बार हम अकेले ही कोशिश करते हैं... रिश्तों को बचाने की...और हम टूटते जाते हैं... और फिर क्रम शुरू होता है टूटने से बिखरने तक का....हम बिखरते जाते हैं और इतना बिखरते हैं कि खुद को समेटना खुद के लिए मुश्किल हो जाता है... अंत में हमारा अस्तित्व ही नहीं बचता....

 बस यही है रिश्तों को समेटने और बिखरने की दास्ताँ... 
सच कहूँ तो बहुत जरुरी है रिश्तों को निभाना... और रिश्तों को बचाना भी ...कुछ हद तक रिश्तों को बचाने के लिए स्वयं का झुक जाना भी...पर जब रिश्ते चुभने लगे बहुत दर्द देने लगे टीसने लगे तो उनको छोड़ना ही बेहतर है.... दर्द तो होता है ... पर नासूर नहीं बनेगा...वक्त के साथ सब सिमट जाता है... खत्म तो नहीं होता कुछ भी...
अब पेड़ों से पतझड़ में जब पत्ते गिर जाते हैं ..निशां तो रह ही जाते हैं... एक बात और ये भी गौर करने वाली है कि ... उन जगहों पर फिर कोई दूसरा पत्ता नहीं उगता...

 यही प्रकृति का शाश्वत नियम है....जिसको जाना है वो जाएगा ही....जाने वाले को कौन रोक सका... 
रिश्ते लगाव तक ही रखिये घाव तक नहीं... घाव नासूर बन जाता है और लगाव मरहम.... 😊
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

शनिवार, 22 जनवरी 2022

तुम बिन अधूरा हूँ ....

( ये उन पुरूषों की व्यथा है...जिनकी पत्नी किसी भी कारण से उनसे दूर है....वह सभी परिस्थितियों का निर्वाह कुशलतापूर्वक कर तो रहे है पर....उस रिक्त स्थान की कमी यथावत् बनी रहती है उनके  जीवन में ......)

कुछ आधा -आधा...कुछ पूरा हूं मैं ...
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं ......
हो रहे हर काम वक्त पर....
बना भी रहा दाना - पानी भी.....
पर हर कदम पर कमी तेरी है सालती.....
जी भी रहा मैं ....जिया भी रहा मैं ....
छोड़ रहा ना कोई कोर कसर बाकी ....
पर क्या कहूं किसी  से.....
तुझ बिन अधूरा  - सा हूं मैं ......

कर रहा परवरिश भी....
ढाप रहा तेरी कमी भी....
सुना रहा लोरी भी.....गीत रहा गुनगुना  भी.....
पर फिर भी तुझ -सा कुशल चितेरा ना हूं......
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .......

बात भी होती बेबाकी से...
छोड़ता ना कोई कोर-कसर मशवरे में ......
समझते सब हैं ...पर दिल रखने को...
मेरी भी कमी को करते जानबूझकर करते अनदेखा भी.....
मैं भी अनजान - सा....अनभिज्ञ -सा बना हूं.....
सच में तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .....

दे रहा मात मैं हर परिस्थिति को....
पर ठहर - सा गया हूं तुझ बिन मैं ....
क्या कहूं नित होता द्वन्द मेरे अन्तर्मन में .....
तुझ बिन अधूरा- सा हूं मै.....

बात दिल की उकेर रहा मैं .....
साथ निभा रही कलमें मेरा.....
तेरे बिन दिल का एक कोना खाली-सा है....
कर लेता हूं अंधियारे में कुछ गुपचुप बातें तुझसे....
सच कहूं...तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं .....

कुछ आधा - आधा...पूरा हूं मैं ....
तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं ....अधूरा -सा हूं मैं ......

#  डॉ नीलम गुप्ता 'नीरा"

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

दो बूँद

बहुत दिनों बाद

आज सोचा कुछ लिखूँ....
बाहर सर्द हवा ...
धुंध... 
धूप का कहीं नामोनिशान नहीं...

फिर भी...
अलसायी सी उठी...
कड़क अदरक इलायची
और कालीमिर्च लौंग डालकर बनाई मसाला चाय
और बैठ गयी कुर्सी पर...
आहिस्ता से चाय की चुस्की ली... 

बस फिर क्या....
मन को पँख लग गए ...
 उड़ चला बेलगाम सा...
उम्र के उस नादान मोड़ पर
जहाँ
खुद की सोच से समझदार सोच कोई नही होती ....
बेताज बादशाह सा....
.
.
.
कलम और पेन मेरे हाथ में...
.
.
.
कुछ कोरे पन्ने बेतरतीब से मेज पर...
.
.
.
 खोई हुई खोजती सी आँखे..…
.
.
.
आँखों के कोर नम हुए 
और
दो बूँद पानी टपका 
आँखों से ...
उस कोरे कागज पर...
बस
लिख दी अपनी  
पूरी दास्ताँ....
अनकही कहानी के रूप में...
उन दो बूँदों ने...
.
.
.
और मैं...
वहीं की वहीं
बैठी...
तय कर आई एक लम्बा सफर...
ठंडी होती हुई...
मसाला चाय के साथ...
.
.
.
सच कहूँ...
वही सब मसाला चाय
पर..
अब "वो" स्वाद कहाँ....
मसाला चाय में...
शायद वक्त के साथ 
मसाला बेरंग और 
बेस्वाद हो गया...

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

निःशब्द

नि: शब्द से ....
बैठे वो दोनों .....
एक दूसरे के सामने ....
निःशब्द
पलकें उठी...
नजरें मिली .....
और
 बात हो गयी ....
शिकवा भी था....
शिकायत भी थी....
मान भी था....
मनुहार भी था....
हौले से....
थरथराये लव...
पर निःशब्द 
और.....
बात हो गयी .....
नि:शब्द से...

#  नीलम. " नीरा "

बुधवार, 19 जनवरी 2022

मैं और तुम

कहानी 
मैं और तुम की

एक अनजान सा ...मैं
अनायास  टकरा गया ...तुम से

बस यूँ ही 
सफर जारी रहा
कुछ सामान्य सी 
हल्की मुलाकात

समय बीता
 मुलाकात गहरी हुई
 मैं और तुम  कुछ करीब आये

बस वक्त ने करवट बदली
कुछ फिजा में खुमारी ,
कुछ हंसी लम्हे.... कुछ पल
बस 
पंख लग गए सपनों को

और
मैं और तुम 
हम बन गए
उड़ने लगा वक्त 
परियो के देश 
आसमाँ  मौसम दिन रात 
सब मचलने लगे...
आगोश में आने को....

वक्त बीता
मौसम बदले 
सावन आया ,बसन्त आया 
उमस और तपाने वाली गर्मी 
फिर सर्द हवाएं  
और हर तरफ जमने लगा हिम

एक अन्तराल  

 मौसम दर मौसम बदलते गए
कौन रोक पाए है बदलते मौसम को
खुलने लगे बाहुपाश में बंधे बन्धन 
सिमट गया आसमान ,सारा जहाँ
और
बिखर गया हम 
वक्त ने फिर से  अपना रंग बदला 
रंगीन तस्वीर के रंग फीके पड़ने लगे 
बन्धन को बंधना खलने लगा 
सारे सपने सपने से हो गए ....

इसको
वक्त कहूँ या मौसम 
आहिस्ता से 
"हम "
फिर से 
"मैं" और  "तुम"  हो गया
एक रास्ते में फिर से 
एक मोड़ आ गया 
राहें एक से दो हो गयीं.....
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"