सुकून
स्त्री आखिर स्त्री है...वो अनजाने घर को अपनाती है... हर रिश्ते में खुद को बांध लेती है रेशम की डोर बन ... समेट लेती है सबको अपने आँचल में....बन जाती है सेतु मायके और ससुराल का...
सच कहूँ तो.. ईंट और सीमेंट से बनी छोटा मकान या बहु मंज़िली इमारत ... स्त्री के पावन कदम के पड़ते ही घर बन जाता है...उसकी पायल की झंकार से आशियाना बन जाता है.... ममता स्नेह दुलार का नेह बरसाती है वो नाजुक सी स्त्री .... उसकी चूड़ियों की खनक जब खनखनाती है तो मोह लेती है सबका दिल ... तभी तो स्त्री को गृहलक्ष्मी कहते हैं...
इतना सब ...
पर चाहती क्या है वो स्त्री..बस थोड़ा सा सुकून....
पर क्या है.. उसका सुकून ??
चलिए बताती हूँ.... क्या है स्त्री का सुकून
जब पति हौले से आकर कानों में कहे ....
आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो..
बस इतना सा...सुकून
जब बेटा पेट भर खाना खा लें..
वो ही है .उसका सुकून
और जब बेटी कहे माँ तुम बैठो...
आज खाना मैं बनाती हूँ...
बस यही थोड़ा सा...सुकून
जब देवर कहे प्यारी भाभी
आज तो आप छा रही हो...
बस इतना सा.... सुकून
जब ससुर कहे ..आज खाना खा कर
मजा आ गया...
बस इतना सा.. सुकून
जब सास कहे...बस बहुत हो गया काम
अब थोड़ा आराम कर लो
बस इतना सा... सुकून
यही है स्त्री और यही है उसका सुकून
बस थोड़ा सा सुकून
और ...
दीवार बन जाती है ..घर
और ....
घर बन जाता है स्वर्ग
थोड़े से.....सुकून से 😊
डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"
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