सुनो....
एक लंबे अंतराल बाद
घर का वो कोना देखा जिसमें दबी हुई थी बहुत सी यादों की कब्र... बहुत बार चाहा ... और सोचा भी ... पर कुछ जिम्मेदारी और कुछ बेफिक्री.... पर सच कहूं तो
ना तो चाहने से कुछ होता है और ना ही सोचने से.... पर वक्त तो वक्त है ना...चलता ही चला जाता है अपनी रफ्तार से... हमें ही लगता है कि कभी वक्त बहुत तेजी से गुजरता है तो कभी धीमी रफ्तार से....
पर एक बात तो है वक्त कैसे भी गुजरे पर बहुत कुछ सिखा जाता है कभी कभी तो हिम्मत और हौसले बुलंद कर जाता है.... बस वक्त के साथ चलते चलते कुछ पल जवान हुए तो कौतूहल वश घर के कोने में रखी गठरी खोल ही ली.... या यूं कहूं कि जब जिम्मेदारी का बोझ कम हुआ तो कुछ पल अपने लिए जीने का मन कर गया....इसी में
परत दर परत यादें रंगीन होने लगी बचपन की अठखेलियाँ लुका छिपी युवा मन की तरंगे मन में उठते अनेक सवाल जवाब .. अपनी नादानियां.. कुछ कोर नम हुए ... वो तुम्हारा स्नेहपत्र कांपते हाथों से जैसे ही उठाया ... एक पल लगा वक्त पीछे बहुत पीछे चला गया.... होठों पर एक स्निग्ध मुस्कान आई अपनी नादानियों पर और दो बूंद गालों पर बेफिक्र सी चल दीं .....इनको कहां जरूरत होती है किसी से इजाजत की
आज मैं सोचती हूं हमने कितना अच्छा वक्त गुजारा... निश्लता का वो दौर था स्नेह पत्रों का जिसे हम कभी भी खोल कर पढ़ लेते हैं जी लेते हैं गुजरे वक्त को और हँस लेते हैं अपनी ही नादानियों पर....
पर आज कहां है वो यादों के जीवंत रंगीन पन्ने .. आज तो बस मोबाइल है जरा सा हैंग हुआ और अब डिलीट....एक दुनिया सिमट गई जरा सी मशीन में.....
आज पुरानी किताबों में रखे वो गुलाब जवाँ नहीं होते.....
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