( ये उन पुरूषों की व्यथा है...जिनकी पत्नी किसी भी कारण से उनसे दूर है....वह सभी परिस्थितियों का निर्वाह कुशलतापूर्वक कर तो रहे है पर....उस रिक्त स्थान की कमी यथावत् बनी रहती है उनके जीवन में ......)
कुछ आधा -आधा...कुछ पूरा हूं मैं ...
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं ......
हो रहे हर काम वक्त पर....
बना भी रहा दाना - पानी भी.....
पर हर कदम पर कमी तेरी है सालती.....
जी भी रहा मैं ....जिया भी रहा मैं ....
छोड़ रहा ना कोई कोर कसर बाकी ....
पर क्या कहूं किसी से.....
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं ......
कर रहा परवरिश भी....
ढाप रहा तेरी कमी भी....
सुना रहा लोरी भी.....गीत रहा गुनगुना भी.....
पर फिर भी तुझ -सा कुशल चितेरा ना हूं......
तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .......
बात भी होती बेबाकी से...
छोड़ता ना कोई कोर-कसर मशवरे में ......
समझते सब हैं ...पर दिल रखने को...
मेरी भी कमी को करते जानबूझकर करते अनदेखा भी.....
मैं भी अनजान - सा....अनभिज्ञ -सा बना हूं.....
सच में तुझ बिन अधूरा - सा हूं मैं .....
दे रहा मात मैं हर परिस्थिति को....
पर ठहर - सा गया हूं तुझ बिन मैं ....
क्या कहूं नित होता द्वन्द मेरे अन्तर्मन में .....
तुझ बिन अधूरा- सा हूं मै.....
बात दिल की उकेर रहा मैं .....
साथ निभा रही कलमें मेरा.....
तेरे बिन दिल का एक कोना खाली-सा है....
कर लेता हूं अंधियारे में कुछ गुपचुप बातें तुझसे....
सच कहूं...तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं .....
कुछ आधा - आधा...पूरा हूं मैं ....
तुझ बिन अधूरा -सा हूं मैं ....अधूरा -सा हूं मैं ......
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