मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

रिश्ते ...

देखो...समझो... जानो
 कई बार हम कुछ रिश्तों को कस कर थाम लेते हैं... अच्छा ही है ना...जब तक रिश्ते थामे जाएं ...रिश्तों को बचाया जा सकता ह बचा लेना चाहिए... पर...एक सीमा तक... क्योंकि ...कई बार हम अकेले ही कोशिश करते हैं... रिश्तों को बचाने की...और हम टूटते जाते हैं... और फिर क्रम शुरू होता है टूटने से बिखरने तक का....हम बिखरते जाते हैं और इतना बिखरते हैं कि खुद को समेटना खुद के लिए मुश्किल हो जाता है... अंत में हमारा अस्तित्व ही नहीं बचता....

 बस यही है रिश्तों को समेटने और बिखरने की दास्ताँ... 
सच कहूँ तो बहुत जरुरी है रिश्तों को निभाना... और रिश्तों को बचाना भी ...कुछ हद तक रिश्तों को बचाने के लिए स्वयं का झुक जाना भी...पर जब रिश्ते चुभने लगे बहुत दर्द देने लगे टीसने लगे तो उनको छोड़ना ही बेहतर है.... दर्द तो होता है ... पर नासूर नहीं बनेगा...वक्त के साथ सब सिमट जाता है... खत्म तो नहीं होता कुछ भी...
अब पेड़ों से पतझड़ में जब पत्ते गिर जाते हैं ..निशां तो रह ही जाते हैं... एक बात और ये भी गौर करने वाली है कि ... उन जगहों पर फिर कोई दूसरा पत्ता नहीं उगता...

 यही प्रकृति का शाश्वत नियम है....जिसको जाना है वो जाएगा ही....जाने वाले को कौन रोक सका... 
रिश्ते लगाव तक ही रखिये घाव तक नहीं... घाव नासूर बन जाता है और लगाव मरहम.... 😊
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

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