कुछ यादें...
रोज की तरह आज फिर खोल बैठी हूँ...
वो अल्मारी ...
जिसमें रखे हैं मेरी बेटी के...
कुछ कपड़े ....
पुरानी किताबें कापियां...
कुछ खास नहीं ...बस
कपड़े उलट पुलट किये ...
किताबों के पन्ने पलटे...
ऐसा नहीं उसमें कुछ नया था
पर शायद ये मेरी दिनचर्या में शुमार सा हो गया था...
मेरा बेटा चुपचाप कनखियों से मुझे देखता ...
और नजरें गड़ा लेता किताबों में ...
पर एक दिन बोल ही पड़ा ...
माँ आप क्या देखती हो.....
मैं चुप...आँखें सजल
अन्तर्मन मेरा...जार जार रो रहा था...
असमंजस कि क्या कहूँ....
हौले से कहा....बस यूँ ही..
पर उसे कैसे बताती ....
उसका सामान देखने भर से...
मुझे उसके...
घर में होने का एहसास हो जाता है...
माँ जो हूँ ना.....
लाख बेटी सुखी हो पर " माँ " को कैसे तसल्ली
..
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