चाहत थी मेरी ...
या...कहूँ
नादान सी बेबकूफी... मेरी...
या हटी सी जिद्द ...
जब भी देखती हूँ..
सूरज को...
मचल उठता है.... मेरा ये चंचल मन
आज भी...
और पहुँच जाता है...नासमझ उम्र के मोड़ पर
तब भी और अब भी
सोचती हूँ....
आगोश में भर लूँ सूरज को...
उसके उजाले को और रोशन कर दूँ..
उन तमाम बस्तियों को ...
जहाँ सूरज तो भरपूर निकलता है...
पर उजियारा नहीं होता...
बस..
इसी उहा पोह में उलझी मैं...
चल पड़ी...
अपनी जिद्द की जिद्द पूरी करने...
और...
सांझ होते होते...
आखिर ...
मैंने... थाम ही लिया अपने सूरज को
फिर ...पूछ भी लिया...
उससे...
क्यों करते हो इतनी चिरौरी मेरे साथ
कुछ ठहर के
गुलाबी मुस्कान के साथ ...वो बोला
हूँ तो सदा ही तुम्हारा
पर...
कोशिश और उम्मीद से
पूरा ही मिलूंगा..
आधे अधूरे का क्या ही काम
और.... हाँ
अब तुम जाकर जगा देगा ....
उन सोये हुए मनो को...
जहाँ...
मैं तो हूँ ...पर
मेरा उजियारा नहीं....
# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें