बहुत दिनों बाद
आज सोचा कुछ लिखूँ....
बाहर सर्द हवा ...
धुंध...
धूप का कहीं नामोनिशान नहीं...
फिर भी...
अलसायी सी उठी...
कड़क अदरक इलायची
और कालीमिर्च लौंग डालकर बनाई मसाला चाय
और बैठ गयी कुर्सी पर...
आहिस्ता से चाय की चुस्की ली...
बस फिर क्या....
मन को पँख लग गए ...
उड़ चला बेलगाम सा...
उम्र के उस नादान मोड़ पर
जहाँ
खुद की सोच से समझदार सोच कोई नही होती ....
बेताज बादशाह सा....
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कलम और पेन मेरे हाथ में...
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कुछ कोरे पन्ने बेतरतीब से मेज पर...
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खोई हुई खोजती सी आँखे..…
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आँखों के कोर नम हुए
और
दो बूँद पानी टपका
आँखों से ...
उस कोरे कागज पर...
बस
लिख दी अपनी
पूरी दास्ताँ....
अनकही कहानी के रूप में...
उन दो बूँदों ने...
.
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और मैं...
वहीं की वहीं
बैठी...
तय कर आई एक लम्बा सफर...
ठंडी होती हुई...
मसाला चाय के साथ...
.
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सच कहूँ...
वही सब मसाला चाय
पर..
अब "वो" स्वाद कहाँ....
मसाला चाय में...
शायद वक्त के साथ
मसाला बेरंग और
बेस्वाद हो गया...
# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
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